भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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४२८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

सप्तम गृह मालिका- बहुत स्त्रियों का स्वामी और राजा ।

अष्टम गृह मालिका--दीर्घायु, दरिद्र, श्रेष्ठ और स्त्री से निश्चिन्त ।

घमं गृह मालिका--गुण निधान यज्ञ कर्ता तपस्वी समर्थ ।

कर्म गृह मालिका--राज्य स्त्री मणि का स्वामी सवं क्रिया में दक्ष ।

व्यय भाव मालिका--बहुत खचे करने वाला सर्वेत्र पुज्य ।

१२०. राजयोग--९ और १० भाव के स्वामी शुभ भाव में हों । फल-राजाो हो

हाथी घोड़े आदि भूषित भेरी शंख नाद युक्त छत्र धारण भाट मागध आदि से वंदित

प्रसिद्ध पुरुष कई प्रकार के उपहार से सेवित ।

१२१-शंख योग--केन्द्र या कोण के स्वामी शुभ भाव में हों। फल-कई सुन्दर

'स्त्रियो के साथ सब प्रकार का भोग भोगे सम्पत्ति से पूर्ण हो ।

अन्यमत-- (१) लग्नेश बली हो और पंचमेश और षष्ठेश परस्पर केन्द्र में हों

या भाग्येश बली हो । (२) या लग्नेश और दशमेश चर राशि में हों । फल“-दयालु,

पुण्यवान्‌, बुद्धिमान्‌, सुकर्मी, चिरजीवी । ( वु० पा० ) ।

अन्य० = (१) पंचमेश षष्ठेश परस्पर केन्द्र में हों लानेश बलवान्‌ हो ।

(२) लग्नेश दशमेश चर राशि में हों भाग्येश बली हो ।

, फल--योग शील, दयालु, स्त्रीवान्‌, पुत्रवान, क्षेत्रवान्‌, पुण्य कर्मी, शास्त्र ज्ञान

द्वारा आचार और साधु क्रिया करने वाला, ८० वषं आयु ( जा० पारि० ) ।

१२२-प्रतमाँश योग--सब ग्रह अस्त नीच और शत्रु के अंश में हों तो फल￾भय दुःख ओर मृत्यु कर्ता है ।

१२३-गरलांश योग- लगन में सूर्यं और चन्द्र हो, सूर्य ग्रहण का समय हो

अमावस्या का चन्द्र (कुहू) और अमावस्या की संधि में जन्मा हो, और जब विष घटी हो तो कंद, शोक, ज्ञात या अज्ञात रूप से पेचीदे रोग हों जीवन को भय हो। १२४-बुधादित्य योग--बुध ओर सूयं साथ हो, धर्मात्मा, पण्डित, धनवान्‌, बहु पुत्रबान्‌, भृत्यों सहित तथा जितेन्द्रिय । पिछले जो १. आकृति, २. संख्या ३. आश्रय और ४. दल योग बतलाये हैं उन्हीं नाम के और भी भिन्न योग है जो नीचे दिये हुँ १२५-गदा--(१) आकृति योग का १ योग से भिन्न । चन्द्र द्वितीय स्थान में “गुरु शुक्र से युक्त हो नवमेश से दृष्ट हो । फल- लोक प्रधान, गुणाढच, सुभट ५२ वर्ष तक सुख अनुभव करे ।

अन्य ०--सभी पाप ग्रह आठवें भाव में हों चन्द्रमा शुक्र केन्द्र में हों तो-वह मनुष्य पागल या बुद्धि भ्रंश या मृगी वाला हो संतप्त रहे ( स० चि० )1

१२६-शकट योग--( १ आकृति योग के दूसरे योग से भिन्न ) गुरु से चन्द्र बारहवं, आठवें और छठे घर में कहीं हो परन्तु लग्न से केन्द्र में चन्द्र हो तो शकट योग नहीं होता । फल-अभाग्पवान्‌ और जो एक बार हानि हो चुकी हो उसे फिर से प्राप्त करे पृथ्वी में साधारण और महत्त्वहीन हो अर्थात मानसिक दुःख प्राप्त हो तो “डालने योग्य न हो अत्यन्त दुःखी हो ( फल० )1