सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 440, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ेंRiess ses ear
४३० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
अन्य ०-शुभ माला-सव ग्रह॒ प्रचरित क्रम से ५, ६, ७ घर में हों तो जनाधिकारी
( गवनंर डायरेक्टर आदि ), राजा से सम्मानित, योगी, दाता, दूसरे के कार्य करने
में सहायक, अपने सम्बन्धियों से प्रेम, अच्छी स्त्री और पुत्र हो, धीर हो ( फल० ) ।
अशुभ माला-सब ग्रह प्रचलित क्रमसे ८, ६या १२ घर में हों तो कुमार्गी,
दुःखी, दूसरों को त्रास देने वाला, कृतघ्न, डरपोक, ब्राह्मणों का अभक्त, लोक से
शापित, कलह प्रिय होता है ( फल० ) 1
१३८-खड्भ योग-नवमेश धन भाव में हो, धनेश नवम में हो, लग्नेश केन्द्र या कोण
में हो तो खग या खड्ग योग होता है। फल-वेद के अर्थ झो जानने वाला, सभी
"शास्त्र तथा ज्योतिष और तंत्रों के तत्व को जानने वाला, बुद्धि प्रताप बल पराक्रम से
सुखी रहे । मत्सरता विरहित, अपने पराक्रम में श्रेष्ठ, कार्य कुशल, कृतज्ञ ।
१३९-वंशावतार-शुक्र और गुरु केन्द्र में हों, शनि उच्च का होकर केन्द्र में हो,
चर लग्न में जन्म हो । फल-पुण्य चरित्र वाला, तीर्थ सेवी, कलाविद, काम में आसक्त,
सामयिक, जितेन्द्रिय, वेद तत्त्व ज्ञाता, वेद शास्त्र का अधिकारी, राज्य श्री वाला ।
१४०-कूमं योग-शुभ ग्रह ५, ६, ७, भाव में और पाप ग्रह ३, ११, १ भाव में
अपने उच्च में हों । फल-राजा, धीर, धर्मात्मा, गुणी, यशस्वी, उपकारी, नेता,
सुखी ( वृ० पा० ) ।
अन्य०-शुभ ग्रह स्वगृही उच्च या मित्रांशक का ५, ६, ७ घर में हो और पाप
ग्रह लाभ या लग्न में मित्र गृही या उच्च का हो तो कूर्म योग होता है (जा० पा०)।
फल-विख्यात कीति, राज सुख भोगी, धर्मात्मा, सुत गुणी, धैयंवान्, सुखी, वक्ता
परोपकारी, मनुष्यों का नायक ( राजा ) ( जा० पा० )।
१४१-कुसुम योग ( ३३ कुसुम योग से भिन्न ) स्थिर राशि लग्न में हो, शुक्र केन्द्र मै और चन्द्रमा त्रिकोण में शुभ ग्रह युत हो और शनि दशम में हो । फल-राजा या राजा के तुल्य, दाता, भोगी, सुखी, कुल में श्रेष्ठ, गुणी विद्वान् ( वृ० पा० ) | अन्य० स्थिर लग्न हो शुक्र केन्द्र में हो चन्द्रमा शुभ युक्त त्रिकोण या पांचवे भाव में हो और शनि दशम में हो ।
फल-दानी, राजा से पूजित, भोगी, उत्तम कुल में उत्पन्न राजाओं में मुख्य, समस्त लोको में यशस्वी प्रतापी राजा ( जा० पा० )।
१४२-कल्पद्रुम-लग्नेश तथा लग्नेश जिस राशि में हो उसका स्वामी फिर वह जिस राशि में हो उसका स्वामी और उसका नवांशपति ये सब यदि केन्द्र त्रिकोण में या अपने २ उच्च में हों । फल-पब सम्पत्ति से युक्त राजा, धर्मात्मा, बली, युद्ध-प्रिय और दयालु ।
१४३-बुध योग-छग्न में गुरु, गुरु से केन्द्र में चन्द्र, चन्द्र से दूसरे राहु हो, पराक्रम से तीसरे स्थान में सूर्य और मंगल हो तो बुध योग होता है। फछ-राज श्री से युक्त, विशेष वली, बड़ा नामी, शास्त्र ज्ञाता, व्यापार में चतुर, वृद्धिमान, शत्रु रहित । १४४-लग्च अघियोग-छग्न से ६, ७ और ५ स्थान में शुभ ग्रह हो पाप ग्रह से