सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 441, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ेंनाभस भादि योग : ४३१
युक्त या दृष्ट न हो, चतुर्थ में भी पाप ग्रह न हो तो लग्नाधि योग होता है। फल- बहुत शास्त्रों का रचने वाला, विद्या से विनीत, बहुत बल का अधिकारी, मुख्य,
निष्कपट, महात्मा, लोक में यश वित्त गुण से युक्त ( जा० पा० )।
अन्य०-लग्न से ७, ८ भाव में शुभ ग्रह हो उस पर पापग्रह की दृष्टि या योग न
हो तो लग्नाधियोग होता है । फल-बड़ा ही विद्वान्, महात्मा ओर सुखी (वृ० पा०) |
१४५-(१) हरि योग-छग्नेश से २, ८, १२ घर में शुभ ग्रह हों ( जा० पा० )।
अन्य-द्वितीयेश से २, ८, १२ घर में शुभ ग्रह हो ( जा० पा० ) ।
(२) हर योग-प्तमेश से ४, ९, ८ घर में शुभ ग्रह हो ( वृ० पा० ) |
अन्य०-सप्तमेश से ४, ९, ८ घर में यथा संभव गुरु चन्द्र वुध हो (जा० पा०)।
(३) ब्रह्म योग-लाभेश से ४, १०, ११ घर में शुभ ग्रह हो (वृ- पा०) ।
अन्य०-छग्नेश से ४, १०, ११ घर में सूर्य शुक्र मंगल हो ( जा० पा० )।
तो इन तीनों योगों में उत्पन्न सुखी विद्वान्, धन पुत्रादि से युक्त हो (वृ० पा०) ।
अन्य-सभी शास्त्रों का ज्ञाता सत्यवादी, सफल, सुख भोगी, प्रिय वादी, काम
शील, शत्रुजित्, उपकार कर्ता, पुण्य कर्मी ( जा० पा० ) ।
१४६-दन्य, खल और महायोग-छग्न से आरम्भ होकर १२ भाव तक भावेशों
की जोड़ी से होने वाले ६,६ योग बनते हैँ ।
१-दन्य योग-इसमें ६,८,१२ भाव के स्वामियों से ३० योग बनते हैं ।
१-वारहवें भाव का स्वामी शेष किसी भी ११ भावों में हो परन्तु द्वादशेश
जहाँ हो उस भाव का स्वामी १२ वें भाव में हो । ११ भेद
२--षष्ठेश शेप १० किसी भाव में (१,२,३,४,५,७,८,९,१० या ११) भाव
में हो और उसका स्वामी छठे भाव में हो । १० भेद
३--अष्टमेश शेष ९ भावों में से किसी में हो (१,२,३,४,५,७,९,१०,११)
भाव में से किसी में हो और उस भाव का स्वामी ८ बें भाव में हो। ९ भेद
योग ३०
२--खल योग
१--तीसरे भाव का स्वामी शेष १,२,४,५,७,९,१० ओर ११ इन ८ भाव
में से कहीं हों और उस भाव का स्वामी तीसरे भाव में हो । ८ भेद
योग ८
३-महायोग
१--लग्तेश शेष २,४,५,७,९,१० या ११ इन ७ भाव में कहीं हो ओर
उस भाव का स्वामी लग्न में हो । ७ भेद
२--दूसरे भाव का स्वामी शेष ६ घर ( ४,५,७,९,१० या १) भाव) में
हो और उसका स्वामी दूसरे भाव में हो । ६ भेद
३--चतुर्थेश शेष ५ घर ( ५,७,९,१० या ११ भाव ) में से किसी में हो
और उसका स्वामी चतुर्थं में हो । ५ भेद