भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 444

४३४ ; सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

(२) निःस्व योग--सुवचन शून्य हो, बन्ध्या स्त्री मिले, बुरे साथियों के बीच रहे,

बुरे दांत, आँख हों, बुद्धि से हीन, अल्प संतान, विद्या रहित, शक्ति रहित, उसके शत्रु

उसका धन लूट लेवें । j

(३) मृति योग--शत्रू उसे जीत लेवें, भाइयों से रहित, लज्जा रहित, धन और

शक्ति हीन, श्रम से जो अनुचित कार्यों के करने से उत्पन्न हो, थका हुआ, उत्तेजित

मनोवृत्ति का हो ।

(४) कुहृ--मातृ, वाहन, भित्र, सुख, भूषण, बंधु इनसे रहित, स्थिति शून्य, पूवं

प्राप्त स्थान भी खों देवे, नीच स्त्री से प्रेम ।

(५) पामर-दुःखी जीवन, .अविचारणीय, झूठ बोलने वाला, वंचक, (दगाबाज)

संतान हानि हो, या संतान ही न हो, नीच जनों का प्रयोग करे, नास्तिक, अधिक

खान-पान करने वाला ।

(६) हर्ष योग-सुख, भोग, भाग्य, दृढ़ अंग युक्त, शत्रू ओं से जीते, पाप कर्म से

डरे, उसका मित्र हो वह प्रसिद्ध मुखिया हो, द्युति मित्र, कीति और संतान प्राप्त हो।

(७) दुष्कृति योग-स्त्री की हानि हो, पर स्त्री रत, बिना विचारे, आवारा,

विचरता रहे, प्रमेह आदि गुह्य रोग हों, राज से पीड़ा, बंघुजनों से परित्यक्त उसके £

कारण दुःख भोगे ।

(८) सरल योग-दीर्घायू, दृढ़ मति, निभंय, श्रीमान्‌ विद्या सुत धन युक्त, आरंभ

में ही व्यापार में सफलता प्राप्त करे, शत्रुओं को दमन करे, निर्मल ख्याति हो ।

(९) निर्भाग्य योग-अपनी पैत्रिकी सम्पत्ति जमीन आदि सब नष्ट करे, साधु और

गुरुजनों का निदक, अघामिक, पुराने और पहिने हुए कपड़े पहिने, अभागी, बहुत दुःख

का पात्र हो । ५

(१०) दुर्योग-कोई कायं अपने शरीर की महानता से करे तो असफलता हो,

मनुष्यों की दृष्टि में लघु, दूसरों का द्रोही, अति स्वार्थी, केवल अपने पेट के पांलन की

चिन्ता करे, अपने घर से सदा गैर हाजिर रहे, और बाहर देशों में रहे 1

(११) दरिद्र योग-कर्ज से लदा, क्रूर, दरिद्र शरोमणि, कर्ण रोगी, सौभ्रात्र हीन, (अच्छे भाई से रहित) पाप या अपराध के कायं में चित्त, चालाकी से वात करें, दूसरों

से नीचता का व्यौहार करे ।

(१२) विमल योग-कम खर्च करे अधिक बचावे, प्रत्येक के साथ अच्छा सुखी, स्वतन्त्र और आदर का पात्र, अपने अच्छे गुणों के कारण प्रसिद्ध । दुर्योग पर विचार-यदि ६,८ यः १२ घर के स्वामी बली होकर केन्द्र या कोण में हों और १,१०,४ ओर ९वें घर का स्वामी बल हीन हो या अस्त हो और ६,८, १२वें घर में हो तब अशुभ फल होता है ।

परन्तु उपरोक्त के विपरीत हो अर्थात्‌ ६,5,१२वं घर का स्वामी वलवान्‌ होकर

केन्द्र या कोण में न हो और १,४,९ या १०वें घर का स्वामी ६,८,१२बे घर में न हो

और बली हो ओर अस्तंगत न हो तो शुभ फल होगा-वह भाग्यवान्‌ होगो, धनवान्‌,