सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 443, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ेंदाद आदि बॉय : ४३३
सुख स्थिर और अंत तक रहे । हाथी, घोड़ा आदि वाढून पर बात करे, राजा से
सम्मानित, ब्राह्मण ओर देव॑ के लिए भक्ति, सड़क पर कुओँ, दाळाव आदि बतवने में
उत्सुकता पूवंक अपने को लगावे ।
(५) छत्र-अच्छी स्त्री, ओर संतान प्राप्त, सुखी, बरी, प्रसिद्ध, दुन्दर भाषा,
“विद्वानू, राजा का मंत्री, तीक्ष्ण बुद्धि, आदरणीय 1
(६) अस्त्र-अपने बड़े बळी शत्रु को बलपूर्वक दमन करें, अपने बर्ताव में छूर ओर
अभिमानी, अंग में ब्रण के चिल्ल, शरीर बलिष्ठ, विवादकारी ( झगडा ) ।
(७) काम -दूसरे की स्त्री की ओर दृष्टि भी न डाले, अच्छी स्त्रो, संतान ओर
बंधु युक्त, अपने स्वतः के गुण से अने पिता से अधिक्र प्रकाशित ओर उच्च पद को
प्राप्त ।
(८) आसुर--दूसरे का काम विगाड़े, चुगल खोर, अपने स्वतः के कार्य में अपने
कार्य बनोने में लगा हुआ, दरिद्री परन्तु जिद्दी, नीच कोय कर्ता, अपने स्वत: उपद्रवी
काम करने में दुःखी रहें ।
(९) भाग्य--पालकी में चले,साथ अच्छे वाजे ब॒जते रहें ऊपर चौरी डोलती रहे,
कभी अंत न होने वाला द्रव्य प्राप्त, प्रसिद्ध पुरुषों से वंदित, धर्म मागं में स्थित, मित्र
देवताओं और ब्राह्मणों की पूजा कर उचित रीति से प्रसन्न करे, अपना आचार पालन
करे, सव कुल का छोकाचार पालन करे सुहूद न हो ।
(१०) ख्पाति--राजा हो छोगों से अनुमोदित आचरण करके अरनो प्रजा को
रक्षा करे, धन, संतान, स्त्री से भाग्यवान्, विशाल ख्याति प्राप्त करे, ओर उन्नति
शील हो ।
(११) पारिजात--नित्य मंगल कार्यों के वीच रहे, राजा हो, जमा किए हुए घव
का स्वामी हो, बहुत कुटुम्ब हो, सत्कथा श्रवण करे, विद्वान् हो, कुछ न कुछ शुभ कार्य
करता रहे ।
(१२) कुशल- बहुत कष्ट से उपाजित द्रव्य का स्वामी हो, अनादर हो उसका
धन स्थिर न रहे, अपना घन उचित कायं में बचें करे.। अपनी अन्त को दशा में कुछ
निश्चय पूर्वेक स्वर्ग प्राप्त हो, वह उजड्ड,अविच[रणीय, चंचल चित्त का हो 1
(१४८) अब आदि १२ योग
यदि १२ भावों के स्वामी लग्न से विचारने पर लग्न के आगे ६,५,१२ वें घर में
हों या यदि भाव पाप युक्त या पाप दृष्ट हो तो लग्न से १२ भाव तक विचारने से
१२ योग बनते हैँ
१--अब योग, २-निःस्व, ३ पृति, ४--कुह, ९ पामर, ६--दषं, ७--
दुष्कृति, ८--सरल, ९--निर्भाग्य, १ ०-दुर्योग, ११-३रिद्र योग, १ २-विप्रल योग ।
फल--
(१) अव योग- अप्रसिद्ध हो, अतिदरिद्री, अल्पजीवी, दुष्ट लोग उपे तुच्छ दृष्टि
से देखें, दुष्ट आचरण, कुरूप, स्वतः डमाडोल स्थिति ।
(] २-