सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
दाद आदि बॉय : ४३३
सुख स्थिर और अंत तक रहे । हाथी, घोड़ा आदि वाढून पर बात करे, राजा से
सम्मानित, ब्राह्मण ओर देव॑ के लिए भक्ति, सड़क पर कुओँ, दाळाव आदि बतवने में
उत्सुकता पूवंक अपने को लगावे ।
(५) छत्र-अच्छी स्त्री, ओर संतान प्राप्त, सुखी, बरी, प्रसिद्ध, दुन्दर भाषा,
“विद्वानू, राजा का मंत्री, तीक्ष्ण बुद्धि, आदरणीय 1
(६) अस्त्र-अपने बड़े बळी शत्रु को बलपूर्वक दमन करें, अपने बर्ताव में छूर ओर
अभिमानी, अंग में ब्रण के चिल्ल, शरीर बलिष्ठ, विवादकारी ( झगडा ) ।
(७) काम -दूसरे की स्त्री की ओर दृष्टि भी न डाले, अच्छी स्त्रो, संतान ओर
बंधु युक्त, अपने स्वतः के गुण से अने पिता से अधिक्र प्रकाशित ओर उच्च पद को
प्राप्त ।
(८) आसुर--दूसरे का काम विगाड़े, चुगल खोर, अपने स्वतः के कार्य में अपने
कार्य बनोने में लगा हुआ, दरिद्री परन्तु जिद्दी, नीच कोय कर्ता, अपने स्वत: उपद्रवी
काम करने में दुःखी रहें ।
(९) भाग्य--पालकी में चले,साथ अच्छे वाजे ब॒जते रहें ऊपर चौरी डोलती रहे,
कभी अंत न होने वाला द्रव्य प्राप्त, प्रसिद्ध पुरुषों से वंदित, धर्म मागं में स्थित, मित्र
देवताओं और ब्राह्मणों की पूजा कर उचित रीति से प्रसन्न करे, अपना आचार पालन
करे, सव कुल का छोकाचार पालन करे सुहूद न हो ।
(१०) ख्पाति--राजा हो छोगों से अनुमोदित आचरण करके अरनो प्रजा को
रक्षा करे, धन, संतान, स्त्री से भाग्यवान्, विशाल ख्याति प्राप्त करे, ओर उन्नति
शील हो ।
(११) पारिजात--नित्य मंगल कार्यों के वीच रहे, राजा हो, जमा किए हुए घव
का स्वामी हो, बहुत कुटुम्ब हो, सत्कथा श्रवण करे, विद्वान् हो, कुछ न कुछ शुभ कार्य
करता रहे ।
(१२) कुशल- बहुत कष्ट से उपाजित द्रव्य का स्वामी हो, अनादर हो उसका
धन स्थिर न रहे, अपना घन उचित कायं में बचें करे.। अपनी अन्त को दशा में कुछ
निश्चय पूर्वेक स्वर्ग प्राप्त हो, वह उजड्ड,अविच[रणीय, चंचल चित्त का हो 1
(१४८) अब आदि १२ योग
यदि १२ भावों के स्वामी लग्न से विचारने पर लग्न के आगे ६,५,१२ वें घर में
हों या यदि भाव पाप युक्त या पाप दृष्ट हो तो लग्न से १२ भाव तक विचारने से
१२ योग बनते हैँ
१--अब योग, २-निःस्व, ३ पृति, ४--कुह, ९ पामर, ६--दषं, ७--
दुष्कृति, ८--सरल, ९--निर्भाग्य, १ ०-दुर्योग, ११-३रिद्र योग, १ २-विप्रल योग ।
फल--
(१) अव योग- अप्रसिद्ध हो, अतिदरिद्री, अल्पजीवी, दुष्ट लोग उपे तुच्छ दृष्टि
से देखें, दुष्ट आचरण, कुरूप, स्वतः डमाडोल स्थिति ।
(] २-
४३४ ; सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(२) निःस्व योग--सुवचन शून्य हो, बन्ध्या स्त्री मिले, बुरे साथियों के बीच रहे,
बुरे दांत, आँख हों, बुद्धि से हीन, अल्प संतान, विद्या रहित, शक्ति रहित, उसके शत्रु
उसका धन लूट लेवें । j
(३) मृति योग--शत्रू उसे जीत लेवें, भाइयों से रहित, लज्जा रहित, धन और
शक्ति हीन, श्रम से जो अनुचित कार्यों के करने से उत्पन्न हो, थका हुआ, उत्तेजित
मनोवृत्ति का हो ।
(४) कुहृ--मातृ, वाहन, भित्र, सुख, भूषण, बंधु इनसे रहित, स्थिति शून्य, पूवं
प्राप्त स्थान भी खों देवे, नीच स्त्री से प्रेम ।
(५) पामर-दुःखी जीवन, .अविचारणीय, झूठ बोलने वाला, वंचक, (दगाबाज)
संतान हानि हो, या संतान ही न हो, नीच जनों का प्रयोग करे, नास्तिक, अधिक
खान-पान करने वाला ।
(६) हर्ष योग-सुख, भोग, भाग्य, दृढ़ अंग युक्त, शत्रू ओं से जीते, पाप कर्म से
डरे, उसका मित्र हो वह प्रसिद्ध मुखिया हो, द्युति मित्र, कीति और संतान प्राप्त हो।
(७) दुष्कृति योग-स्त्री की हानि हो, पर स्त्री रत, बिना विचारे, आवारा,
विचरता रहे, प्रमेह आदि गुह्य रोग हों, राज से पीड़ा, बंघुजनों से परित्यक्त उसके £
कारण दुःख भोगे ।
(८) सरल योग-दीर्घायू, दृढ़ मति, निभंय, श्रीमान् विद्या सुत धन युक्त, आरंभ
में ही व्यापार में सफलता प्राप्त करे, शत्रुओं को दमन करे, निर्मल ख्याति हो ।
(९) निर्भाग्य योग-अपनी पैत्रिकी सम्पत्ति जमीन आदि सब नष्ट करे, साधु और
गुरुजनों का निदक, अघामिक, पुराने और पहिने हुए कपड़े पहिने, अभागी, बहुत दुःख
का पात्र हो । ५
(१०) दुर्योग-कोई कायं अपने शरीर की महानता से करे तो असफलता हो,
मनुष्यों की दृष्टि में लघु, दूसरों का द्रोही, अति स्वार्थी, केवल अपने पेट के पांलन की
चिन्ता करे, अपने घर से सदा गैर हाजिर रहे, और बाहर देशों में रहे 1
(११) दरिद्र योग-कर्ज से लदा, क्रूर, दरिद्र शरोमणि, कर्ण रोगी, सौभ्रात्र हीन, (अच्छे भाई से रहित) पाप या अपराध के कायं में चित्त, चालाकी से वात करें, दूसरों
से नीचता का व्यौहार करे ।
(१२) विमल योग-कम खर्च करे अधिक बचावे, प्रत्येक के साथ अच्छा सुखी, स्वतन्त्र और आदर का पात्र, अपने अच्छे गुणों के कारण प्रसिद्ध । दुर्योग पर विचार-यदि ६,८ यः १२ घर के स्वामी बली होकर केन्द्र या कोण में हों और १,१०,४ ओर ९वें घर का स्वामी बल हीन हो या अस्त हो और ६,८, १२वें घर में हो तब अशुभ फल होता है ।
परन्तु उपरोक्त के विपरीत हो अर्थात् ६,5,१२वं घर का स्वामी वलवान् होकर
केन्द्र या कोण में न हो और १,४,९ या १०वें घर का स्वामी ६,८,१२बे घर में न हो
और बली हो ओर अस्तंगत न हो तो शुभ फल होगा-वह भाग्यवान् होगो, धनवान्,
नाथस आदि योग : ४३५
गुणी राजा, सुखी और धार्मिक हो ।
पंच महापुरुष योग—
सूर्य और चन्द्र को छोड़कर शेष ५ ग्रह स्वगृही या उच्च होकर केन्द्र में पड़ तो ५ प्रकार के पञ्च महापुरुष योग होते हैं । यदि सूर्य या चन्द्र के साथ ये योग पड़ें तो फल घट जाता है । अर्थात् सूर्य चन्द्रमा सहित मंगल आदि कोई ग्रह उक्त प्रकार से हो तो राजा नहीं करते केवल अपनी दशा में शुभ फल देते हैं ।
कुछ का मत है कि लम्ब से केन्द्र का इन योगों में विचार होता है चन्द्रमा से भी केन्द्र में इन योगों का विचार करना ।
(१) रुचक योग—मंगल स्वगृही या उच्च का होकर केन्द्र में हो ।
(२) भद्र योग—बुध स्वगृही या उच्च का होकर केन्द्र में हो ।
(३) हंस योग—गुरु स्वगृही या उच्च का होकर केन्द्र में हो ।
४३६ : सच्चिद्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(४) मालेय—शुक्र स्वगृही या उच्च का होकर केन्द्र में हो ।
(५) शासक योग—शनि स्वगृही या उच्च का होकर केन्द्र में हो ।
अथ मत्त से स्वगृही, उच्च के अतिरिक्त मूल त्रिकोण का भी विचार करना ।
पाँचों योगों का फल संक्षिप्त में
जिसके १, २, ३, ४ या पाँचों योग हों उसका फल ।
(१) जिसके उपरोक्त १ ही योग हो—माध्यवान् हो । (२) इनमें २ योग हों तो—राजा तुल्य हो । (३) तीन योग हों तो—राजा हो । (४) चार योग हों तो—राजेश्वर हो । (५) जिसके पाँचों उपरोक्त योग हों तो राजेश्वर से भी श्रेष्ठ हो ।
पंचमहापुरुष योग का फल
(१) रुचक योग—मुँह लम्बा, परम उत्साही, निर्मल कांति, वलवान्, सुन्दर भ्रुकुटी कृष्ण केश, सब वस्तुओं में रुचि, संग्राम प्रिय, रक्तश्याम वर्ण, शत्रु को जीतने वाला, विवेकी, चोरों का पोषक (सरदार) क्रूर स्वभाव, दुर्बल जंघा, ब्राह्मणों का भक्त, हाथ में वीणा, वज्र. धनुष, पाश, वृष चिह्न और चक्र रेखा से युक्त, युक्त विचार तथा अभिचार (मारण मोहन आदि) में चतुर, लम्बाई में १०० अंगुल मुख की लम्बाई में, तुल्य कटि प्रदेश वाला, तौल में एक हजार तुला तुल्य, विन्ध्य और सन्नांचल प्रदेश का शासक होकर ७० वर्ष की आयु, शस्त्र या अग्नि के आघात से स्वर्ग जाता है । (वृ० पा०) । दीर्घायु, स्वच्छ कांति, सधिर और बल से पूर्ण, साहसी, प्रत्येक कार्य में सफलता उत्तम भ्रुकुटी, नील केश, सम हाथ, पैर, मंत्रश्र, कीर्ति पवित्र, अरुणता युक्त श्याम वर्ण, शूरवीर शत्रुनाशक, शंख समान कंठ, बड़ा पराक्रमी, क्रूर स्नेही, ब्राह्मण गुरु से विनय युक्त घुटना पिडली जंघा से दुबला, जिसके हाथ पैर में खटवांग, पाश, वृष, धनुष, शर, चक्र, वीणा विद्या इनके चिह्न होते हैं, सीधी अंगुली वाला, सलाह लेने में कुशल, अकेला ही हजारों के तुल्य, मध्यम कटि, सह्य, विन्ध्य पर्वत उज्जयनी देश का राजा, आयु ७० वर्ष के लगभग शस्त्र और अग्नि से चिह्नित, देव मंदिर के समीप देह त्याग करने वाला (मान०) ।
(२) शत्रु योग—सिंह समान प्रतिभावान्, उच्च वक्षःस्थल, हाथी सदृश गमन, स्थूल
नाभस अदि योग: ४३७
और लम्बी भुजा, पंडित, चतुरस्त्र योग क्रिया जानते वाळा, सत्य गुणी, सुन्दर पर,
सुन्दर दाड़ी मूछ, भोगी, शंख, चक्र, गदा शर हाथी ध्वजा हल, इन रेखाओं से चिह्नित
हाथ ओर पेर वाला सुन्दर नासिका, शास्त्र ज्ञाता, काले ओर घुंघराले केश, सब कार्यों
में स्वतंत्र, अपने परिवार को पालने वाला, मित्रादि जन भी उसके धन का उपयोग
करते हूँ । वह तौल में पूर्ण और २० तुला होता है । स्त्री पुत्रादि से युक्त सकुशल,
वह मध्यदेश का पालक होकर १०० वषं जीता है (वृ० पा०)।
तौल का अनुमान-वतंमान रुपया-१ क्षं । ४ कर्ष=१ पळ ।
३०० पल>१ तुला, २० तुला=१ भार. ।
१२०२ तोला=१ तुला (१५ सेर) (व्० पा०) ।
सिह समान चेहरे वाला, मत्त हाथी की चाल, पुष्ट उन्नत वक्षस्थल, सुन्दर मोटी
सुडौल भुजा, कामी, ऊँचा, कोमल, सूक्ष्म रोओं से युक्त कपोल, विद्वात्, कमल से
कोमल हाथ पैर, सत्वाधिक्य युक्त, योग मार्ग का ज्ञाता हाथ पैर में शंख, खड्ग, हस्ती
गदा, पुष्प वाण ध्वजा चक्र कमल हल आदि के चिह्न यात्रा मागं में मत्त हाथियों के
जल से भूमि गीली करने वाला, उत्तम केशर के समान गंध युक्त अङ्ग बाला, मनोहर
शब्द युक्त, उत्तम दोनों भौंह, अति बुद्धिमान्, शास्त्र का जानने वाला मान ओर भाग्य
से युक्त जिसके रहस्य कार्य छिपे हुए हों, उत्तम जिसका पेट, धमं मार्गे में निरत,
उत्तम ललाट से युक्त, वड़ धीर, काले घुंघराले केश । काम करने में स्वतंत्र, स्वजनों
पर भी क्षमा न करने वाला और उसके विभव को दूसरे ही अथिजन भोगते हैं, प्रयत्न
से तुळा में सोने चाँदी के भार को तोलने वाळा अथवा रुपया मोहरों की गिन्ती की
तो कहे कौन तराजू से भी तौलने से वड़ी कठिनाई से आवे जिसके लाखों मन सोना
चाँदी यों ही पड़ा रहे । स्त्री पुरुषों के सुख से युक्त ८० वर्ष तककान्यकुब्ज देश का
राज्य भोगने वाला (मान०) ।
(३) हंस योग--हंस के समान शब्द, सुन्दर मुख, उन्नत नासिका, कफ प्रकृति,
मधु समान पिंगल वणं नेत्र, लाल नख, तीक्ष्ण बुद्धिः पुष्ट कपोळ, गोल मस्तक, सुन्दर
पैर वाला राजा होता है । उसके हाथ पैर में मत्स्य, अंकुश, धनुष, शंख कमळ, खटिया
सदृश रेखाओं के चिह्न होते हैं । कामी होता है स्त्रियों से तृप्ति नहीं होती, लम्बाई
में ९,६ अंगुल, जल क्रीड़ा का प्रेमी, सुख पूर्वक गङ्गा और यमुना के मध्यवर्ती देश का
पालक होकर १०० वर्ष तक जीवित रहकर वन में शरीर त्याग करता है (वृ०पा०)।
अरुण मुख, उन्नत नासिका, सुन्दर चरण, सुन्दर अङ्ग, गौरांग, पुष्ट कपाळ, रक्त
नख, हंस कैसा शब्द, श्लेष्म प्रकृति, शंख, कमळ, अंकुश, मत्स्य, माळा युग्म, खट्वांग
घट इन चिल्लो से युक्त पांव, मधुर नेत्र, गोल सिर, जलाशयों में प्रीति, अति कामी,
` स्त्रियों से कभी तृप्ति न हो ६० अंगुल ऊँची देह ६० वर्ष की आयु (मान०) ।
(४) माळव्य योग-सुन्दर ओंठ, कृश कटि, चन्द्र के समान सुन्दर कांति, शरीर
में सुगन्ध वाला, सामान्य रक्त वर्ण मझोला कद, सुन्दर और स्वच्छ दांत हाथी के
समान स्वर, घुटने तक लम्बी बाहु वाळा, मुख लम्बाई में १३ ओर विस्तार में १०
४३६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
अंगुल ७० वर्ष तक सिंधु और मालव देशों में सुख पूर्वक पालन करके स्वर्ग जाता है (वृ० पा०)।
पतले ओंठ, समान अंग, पतली कमर, लाल अंग, संधि रहित, चन्द्र समान कांति, ह्रस्ति समान लम्बी नाक, सुन्दर कपोल, उत्तम नेत्र, संग्राम में विख्यात पराक्रम, आजानु वाहु, ७० वर्ष तक राज्य करने वाला। १३ अंगुल लम्बा मुँह, दोनों कान का अन्तराल १० अंगुल चौड़ा। अपने अष्ट पुत्र के साथ लाट नामक देश, मालव देश, सिंध नाम देश, परियात्र पर्वत पर्यंत राज्य भोगने वाला (मान०)।
(५) शशक योग—छोटे-छोटे दांत और छोटा मुख किन्तु शरीर छोटा नहीं होता, शूरवीर पतली कमर, सुन्दर जांघ, बुद्धिमान, वन और पर्वत पर विहार करने वाला, शत्रुओं के छिद्र को जानने वाला सेना नायक, कुछ ऊँचे दांत वाला, चंचल, धातु वादी, स्थियों में आसक्त, दूसरे का धन पाने वाला, हाथ पैर में माला, वीणा मृदंग और शस्त्र के समान रेखा के चिह्न। पृथ्वी के अनेक भाग में ७० वर्ष तक सुख पूर्वक राज्य करके अंत में स्वर्ग को जाता है ( वृ० पा० )।
छोटे दांत और मुख, चिर काल तक किसी पहाड़ पर घूमने वाला, क्रोधी, शठ, शूरवीर, निर्जन वन में घूमने वाला वन पर्वत आदि स्थानों के तथा नदी तट पर रहने में प्रीति, अतिथि जनों में प्यार रखने वाला, सर्वत्र प्रसिद्ध, न अति लघु, न अति लम्बा हो अनेक प्रकार की सेना रखने वाला, उन्नत दंत, धातु वाद में कुछ चतुर चंचल नेत्र, स्थियों में आसक्त, दूसरों का धन हरने वाला, मातृ भक्त, उत्तम जांघ, पतली कमर उत्तम बुद्धि, पर छिद्र देखने वाला, हाथ पाँव में पलंग, शंख, शस्त्र मृदंग माला वीणा आदि रेखा हों। ७० वर्ष तक राज्य करने वाला यह शशक नाम का हो राजा होता है।
प्रवृज्या ( संन्यास या फकीरी योग )
प्रवृज्या योग—जिस योग के होने से जातक घर छोड़ कर दूसरे सम्प्रदाय में चला जाता है यह योग के अनुसार नाना प्रकार के साधु, भिक्षुक, संन्यासी आदि हो जाते हैं इस योग के प्रभाव से राजवंशी भी चरद्वार छोड़ कर वन वासी बन जाता है।
प्रवृज्या योग—एक राशि में ४ या अधिक ग्रह एकत्र होने से यह प्रवृज्या योग जाता है।
एक राशि का आशय—सब ग्रह समीप २ हों उन में कुछ ही अंशों का अन्तर हो। जैसे वृष राशि के १ अंशपर कोई ग्रह है दूसरा ग्रह वृष के २९ अंश पर है। इनमें अंशों का बहुत अन्तर पड़ जायगा। ग्रह चाहे दूसरी राशि में भी हो परन्तु बहुत अल्प अन्तर हो तो भी इस योग का प्रभाव होगा। जैसे कोई ग्रह वृष के २९॥ अंश है दूसरा ग्रह मिथुन के १ अंश पर है। यहाँ दोनों ग्रह समीप २ हैं अल्प अन्तर है यहाँ दूसरे भाव में ग्रह होने पर भी सामीप्य के कारण योग होगा। इस प्रकार ४ ग्रह अल्प अन्तर से समीप हों तो यह प्रवृज्या योग हो जाता है।
=
नाभस आदि योग : ४३९
कोन ग्रह क्या प्रवज्या करते हैं
१-खूयं अधिक बली हो तो--तपस्वी दूध कंद मूल फल खाकर तप करे ( वृ० जा० ) । वानभ्रस्थ तपस्वी जो वन पर्बतों में रहता है ( जा० पारि० )। साधुओं का स्वामी या मुखिया जिसने दीक्षा ली हो ऐसा योगी ( फळ० ) । वैखानस संन्यासी, तपस्वी अग्नि होत्र करने वाला वन पव॑तों में नदी किनारे आश्रम बनाकर तपस्या करने वाला, सूर्य का आराधक ( जा० भ० )। २--वल्वान् चन्द्र-कपाली-(संन्यासी हिसा से रहित भस्म से सफेद देह, कपालों को धारण करने वाला शिव जी की दीक्षा वाळा । सोम सिद्धान्त में तत्पर कपालो है ( जा० भ० ) । कापालिक व शैव कनफड़ा ( वृ० जा० ) । तीथं आदि में भटकते फिरने वाला यात्री ( फल० ) । गुरु ( राजश्रीयुक्त तपस्वी ) ( जा० पारि० ) । ३--वलवान् मंगल--छिंगी संन्यासी, गेरुआ वस्त्र धारण करने वाला अपनी बुद्धि से देवताओं की उपासना करने वाला, शिखा रहित, पांडु वस्त्र पहिरने वाला, भीख माँगने वाला, लाल कपड़ा पहिरने वाला, इन्द्रियों को जीतने वाला सन्यासी होता है ( जा० भ० ) बौद्ध धर्म का साधू बनेगा और बुरा सलाहकार बनायेगा ( फलछ० ) । शाक्य ( दुराचारवान्, कुशील, वंचक ) साधू ( जा० पारि० ) । ४--वलवान् बुध-दंडी संन्यासी (कपट करने वाला, गारुड़ी मन्त्र का आराधक मयुर तंत्र के मत में स्थित, मांस खाने वाला दंडी कहलाता है) ( जा० भ० ) । साधु जो भिन्न २ मत के विषय में कुछ नहीं जानता ( फल० ) । जीवक (उदर पुति करने वाला, भोजन में तत्पर, बहुत बोलने वाल') साधु ( जा० पारि० )। एक दंडी और यती ( वृ० जा० ) |
५--बलवान् गुरु-यती, तपस्वी, एक दंड या ३ दंड का धारण करने वाला, गेरुवा कपड़े पहिरने वाला, वानप्रस्थ धमं सहित, ब्रह्मचर्यं को प्राप्त, तीथो में स्नान करने वाला ( जा० भ० )। वेदान्ती तत्ववेत्ता प्रसिद्ध साधु ( फल० ) । आजीविक
वैष्णव ( वृ० जा० ) । भिक्षु ( एक दंडी निरन्तर उपनिषद् का तत्वज्ञ महात्मा ) । ६->-वलवान् शुक्र-चक्र का धारण करने वाळा पशुपति पक्ष की दीक्षा में स्थित, सदा व्रत करने वाला ( जा० भ० ) । रोगी साधु बनेगा जो जीविका के लिए साधुवेश धारण करता है जाति वहिष्कृत ( फल० ) । चक्रांकित ( वृ० जा० ) । चरक ( नाना
देश प्रवासी श्रेष्ठ यति ) ( जा० पारि० ) ।
७--बली शनि-नंगा संन्यासी, पाखंड व्रत में स्थित,नग्न ब्रत धारण करने वाला
श्रावक मत में स्थित कठिन तपस्या करने वाला ( जा० भ० ) । जाति से वहिष्कृत
साधु ( फछ० )। विवास ( सदा नंगा रहने वाला, विना वस्त्र के रहे ) ।
१-एएक् स्थान में ४ बली ग्रह-नित्य वनवास करने वाला होता है चाहे वह राज
वंशी क्यों न हो ।
एक स्थान में ५ वली ग्रह--नित्य कंदमूल खाने वाला अति शान्त स्वभाव
जितेन्द्रिय हो ।
४४० : रविम ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
एक स्थान में ६ बली ग्रह—राज कुल का भी हो तो भी नित्य पर्वत में शिला तल बास कर तपस्या करने वाला होता है।
२—संन्यास योग में राहु युक्त हो या कूर्पाश्वक में गुल्फिक युक्त हो तो संन्यास में विफलता होने है। अर्थात् संन्यास त्याग दे।
३—प्रवज्या कारक ग्रहों में २,३ ग्रह बली हों तो पहिले एक प्रकार की फकीरी लेगा फिर दूसरे प्रकार की, पश्चात् तीसरे प्रकार की। प्रथम जिस ग्रह की अंतर्देशा होगी तब उस ग्रह के अनुसार प्रवज्या होगी दूसरे की अंतर्देशा आने पर पहिली दीक्षा त्याग कर वर्तमान ग्रह की दीक्षा लेगा। इसी प्रकार ग्रहों के प्रभाव से एक छोड़ कर दूसरी ग्रहण करता रहेगा।
४—प्रवज्या कारक बली ग्रह अस्तंगत हो तो अदीक्षित अर्थात् बिना गुरु मंत्रों-पदेश के संन्यास या फकीरी लेगा परन्तु उस सम्प्रदाय में उसकी भक्ति या प्रेम होगा। या मुँह से कहे या विचार करे कि मैं दीक्षा लूँगा परन्तु उसमें प्रेम होते हुए भी दीक्षा न लेवे यदि ग्रह निर्बल हो ( उच्चादि बलहीन हो ) और सूर्य के साथ अस्त हो तो सूर्य जन्म प्रवज्या होगी अर्थात् वह तपस्वी होगा।
५—युद्ध में पराजित ग्रह को—मंगल आदि ग्रहों में एक ही अंश पर ग्रह रहने से ग्रह युद्ध समस्या जाता है। इसमें शुक्र उत्तर या दक्षिण में हो दोनों में विजयी समस्या जाता है अन्य ४ ग्रह बुध गुरु मंगल और शनि में जो उत्तर में रहता है वह जयी समस्या जाता है और दक्षिण वाला पराजित समस्या जाता है इस प्रकार जो ग्रह युद्ध में पराजित हो उसकी प्रवज्या में जातक उस प्रवज्या को ग्रहण कर छोड़ देता है। यदि न पराजित हुआ हो तो बलीग्रह की अंतर्देशा में दीक्षा पावे।
६—राजयोग प्रवज्या योग दोनों बलवान् हों तो वह विरुद्ध फल योग पर साधु होकर भी राजा हो।
७—फर्क ग्रहों में जिसका बल अधिक होगा उसकी दीक्षा पहिले होगी पश्चात् दूसरों की होगी।
८—यदि ग्रह बलवान् हो तो उसकी दीक्षा मरने तक रहे।
यदि ग्रह निर्बल हो तो उसकी दीक्षा लेकर छोड़ देवे।
सब ग्रह बली हों—तो नित्य भोजन त्याग कर नंगा-रह कर योग मार्ग में तत्पर हों।
९—एक स्थान में ५,६ ग्रह हों तो वह दरिद्रों और मूर्ख भी होता है।
१०—अन्यमत है कि प्रवज्या कारक ग्रहों में दशमेक्ष भी होंवे, दशमेक्ष के वर्ग का साधु होगा।
अन्य प्रकार से प्रवज्या योग
१—जन्म समय चन्द्रमा जिस राशि पर रहता है उसका स्वामी जन्मेश कहलाता है। जन्म समय जन्मेश पर किसी ग्रह की दृष्टि न हो और चन्द्रमा शनि को देखे तो प्रवज्या योग होता है इसमें भी शनि चन्द्र में से जो बली हो उसकी अंतर्देशा में प्रवज्या होगी ( बु० जा० )।
नाभस आदि योग $ ४४१
२-जन्मेश निबंछ हो उस पर बलवान् शनि की दृष्टि हो ( बृ० जा० ) |
३-शनि चन्द्र के द्रेष्काण में हो या शनि व मंगल के नवांश में हो केवल शनि की दृष्टि हो ओर कोई ग्रह की दृष्टि न हो तो शनि युक्त प्रवज्या होगी (वृ० जा०)।
४-चन्द्र निबंछ हो उस पर पाप ग्रह की दृष्टि हो विशेष कर शनि की पूर्ण दृष्टि हो तो भाग्य हीन हो ( वु० जा० )।
५-गुर नवम स्थान में हो, गुरु चन्द्र ओर लग्न इन तीनों को शनि देखता हो । इसमें यदि पूथं कथित राजयोग का लक्षण भी हो तो भी जातक राजा होकर तीथकर हो अर्थात् बुध आदि के समान स्वयं सम्प्रदाय चलाने वाला हो या शास्त्र कहने वाला होगा ( वु० जा० ) ।
६-शनि नवम हो और उसे कोई ग्रह न देखे । यदि उसे राजयोग भो पड़ा हो
तो वह राजा होने पर भी फकीरी दीक्षा पायेगा, ऐसे योग में कोई राजयोग न हो तो
इस प्रवज्या का फल होगा ( वृ० जा० ) ।
७-९, १२ या ४ राशि लग्न में हो, उस पर शनि की दृष्टि हो ओर गुर नवम
स्थान में हो तो अपना राज्य छोड़कर देश-देशान्तर घूमे भ्रमिष्ट हो (प्रा० यो०) । ८-लग्नेश या केवल शनि की दृष्टि हो अन्य की दृष्टि न हो या शनि को लगेज
देखे लग्नेश को शनि देखे बलरहित हो तो प्रवज्या योग हो | ( स० चिं० ) |
९-चन्द्रमा शनि के द्रेष्काण में हो उसपर शनि की दृष्टि हो ( स० चिं० )।
१०-चन्द्रमा यह शनि के व मंगल के अंशक. में हो शनि से दृष्ट हो या चन्द्रमा
शनि सहित हो तो संन्यास योग हो ( स० चि० ) ।
११-छग्नेश पर और ग्रहों की दृष्टि न हो, लग्नेश की दृष्टि शनि पर न हो
और शनि भी बलहीन लग्नेश को न देखे तो दीक्षा लेकर संन्यासी होता है (जा.भ-)।
१२-लग्नेश शनि के द्रेष्काण में हो, मङ्गल व शनि के नवांश में हो उसपर शनि
की दृष्टि हो तो वह कुटिल दुष्ट शील पाखंड का मंडन करने वाला तपस्वी होता है ( जा० भ ) ।
१३-नवम पंचम भाव में शुभ ग्रह हो और कोई ग्रह न देखता हो तो संन्यासी हो ( जा० भ० ) ।
१४-चन्द्रमा शनि के द्रेष्काण में हो उसपर मङ्गल और शनि की दृष्टि हो तो वह साधु हो ( फल० ) ।
१५-चन्द्रमा मङ्गल के नवांश में हो अर्थात् नवांश स्वामी मंगल हो और शनि
की दृष्टि हो तो मंगल से जो वे प्रगट हो उसी वर्ग का साधु हो ( फल० )।
१६-जन्म राशीश पर किसी ग्रह की दृष्टि न हो केवल शनि की दृष्टि हो तो वह साधु हो (फल) ।
१७-दशम में बलवान् ३ ग्रह स्वोच्चादि वर्ग स्थित हों दशमेश अधिक बली हो तो वह यती या उसके समान शीलवाला हो ।
१८-दशमेश बलहीन सप्तम में हो तो वह दुराचारी हो ।
१९-प्रब्रज्या कारक ग्रहों के बीच द्वितीयेश ओर सप्तमेश हो तो वह काम बुडि
४४२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
होता है । (जा. पारि.)
२०-प्रवज्या प्रद ग्रह सूये शनि मंगल से युक्त हो तो धन पुत्र स्त्री से रहित सन्यासी हो ।
२१-शुभ नवांश में सूये हो और वह उच्च के अन्त भाग में स्थित ग्रह को देखता
हो तो वह युवा या बालावस्था में संन्यासी हो । (जा. पारि.)
२२-शुक्र और बुध बलहीन होकर लग्न को देखें तो दरिद्र हो । (जा. पारि.)
२३-कोई ग्रह उच्च राश्यंश में युक्त होकर चन्द्र को देखता हो तो भिक्षुक (संन्यासी) हो । ८
२४-बहुत ग्रह एक स्थान में होकर लग्न को देखें तो दीक्षित हो।
२५-जहाँ चन्द्र हो उस राशि के स्वामी को शनि या लग्नेश देखते हों तो दीक्षित
हो (प्रवज्या हों) ।
२६-यदि चन्द्रमा मंगल की राशि में हो शनि के द्रेष्काण में हो शनि उसे देखता . हो तो सन्यासी हो । :
२७-तवम भाव में चन्द्र हो उसे कोई ग्रह न देखता हो तो राजयोग में उत्पन्न
होने पर भी दीक्षित राजा हो (जा० पारि०) 1 अन्य विचार
२८-एक राशि में इस प्रकार ग्रह हो ।
सुर्य, चन्द्र, गुरु, बुध ) तो बल्कल धारी फल भोजी सन्यासी हो । या मगल, बुध, शुक्र शनि ? या चन्द्र गुरु शुक्र शनि ]
२९-चन्द्र क्षीण हो प्रवज्या योग हो लग्नेश चन्द्र को देखे तो जातक दुःखी तपस्वी, शोक तप्त, धन जन रहित, कष्ट से भोजन पाने वाला हो ।
३०-प्रवज्या योग में राजयोग होवे तो बुरा प्रभाव घट जायगा वह दीक्षित साधु शील राजा बना रहेगा जिसे सव नमन करेंगे । ३१-यदि ४ ग्रह जिनमें एक दशमेश भी हो केन्द्र या त्रिकोण में हो या ३ बल- चान् ग्रह अच्छे घर में पड़ें हो तो वह सिद्ध सन्यासी होगा । ३२-भ्रवज्या कारक ग्रहों में अधिक शुभ ग्रह हों और अच्छे घर में हों तो उसका सव लोग मान करेगे। यदि ऐसा न हो तो उसका कोई मान न करेंगे । ३३-जव दशमेश ४ और ग्रहों के साथ केन्द्र या त्रिकोण में हो तो वह मुक्ति प्राप्त करेगा ।
३४-यदि राशि का अन्त उदय हो रहा हो और उसका स्वामी शुभ ग्रह हो गुरु कैन्द्र या त्रिकोण में हो तो भी मुक्ति प्राप्त करेगा । ३५-अवज्या योगों में शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट न हो तो संन्यास लेने पर भंगहो जावे। ३६-अवज्या योग में ग्रह युद्ध में पराजित ग्रह की भी प्रवज्या भंग हो जायगी अर्थात् वह फकीरी लेकर उसे छोड देगा । जितने ग्रह पराजित हैं उन सब की प्रवज्या छुटती जायगी केत्रल जीते हुए की प्रवज्या रहेगी ।
र छ
This image shows a blank, aged, cream-colored page, likely an endpaper or flyleaf from an old book. The paper has a slightly textured appearance with some minor discoloration and small brown spots, characteristic of old paper. A small, bright yellow circular mark is visible on the right edge, near the top. The left edge of the page shows some wear and discoloration, suggesting it was part of a bound volume.
'गोपेश कुमार ओझा
अंकविद्या /
जातकादेशमाग (चन्द्रिका)
जातकपारिजात (हिन्दी व्याख्या)
प्रथम एवं द्वितीय भाग
त्रिफला (ज्योतिष)
'फलदीपिका (हि० अनु० सहित)
भारतीय लग्नसारणी
सुगम ज्योतिष प्रवेशिका
हस्तरेखा विज्ञान
'बी० एल० ठाकुर :
सचित्र ज्योतिष शिक्षा:
प्रारंभिक ज्ञान खण्ड
गणित खण्ड : प्रथम भाग
गणित खण्ड : द्वितीय भाग
फलित खण्ड : प्रथम भाग
'फलित खण्ड ; द्वितीय भाग
'फलित खण्ड ; तृतीय भाग
वर्षफल खण्ड, प्रश्न खण्ड मुहूर्त खण्ड, संहिता खण्ड
दीवान रामचन्द्र कपूर:
` कालचक्र (फलित ज्योतिष)
` रमले प्रश्नोत्तरी
चन्त्रदत्त पंत :
RR चन्द्र-हस्त विज्ञान
मोतीलाल
दिल्ली
5556
वाराणसी पटना
बनारसीदास
शित
बंगलौर
इसारा
मद्रास
सामुरिक शिक्ष _
2
|
ज्योतिष की अन्य पुस्तकें
प्रश्न चन्द्र प्रकाश
लग्न चन्द्र प्रकाश
मुरलीधर चतुर्वेदी बृहद् दैवज्ञरञ्जन (मू० व हि०
प्रथम एवं द्वितीय भाग .
सारावली
होरारलम् प्र.भा.
द्वितीय भाग
केदारदत्त जोशी : ५
ग्रहलाघव
ज्योतिषशास्त्र में स्वरविशान
ताजिक नीलकण्ठी (भा० टी०)
मुहूर्तचन्तामणि-पीयूष धरा हिन्दी
टीका सहित
बृहदवकहड़ाचक्र-(हि० घया० सहित)
ब्रजबिहारी लाल शर्मा : .
चमत्कार चिन्तामणि-भट्टनागयण कृत (हिन्दी
व्याख्या) :
दुर्गादत्त शर्मा :
ज्योतिष-जगत्
पं० लक्ष्मीकान्त कन्याल : .
ज्योतिष तत्व प्रकाश
जगजीवनदास गुप्त :
दशाफलविचार
ज्योतिष रहस्य (प्रथम एवं द्वितीय भाग)
रामचन्द्र पाण्डेय
ज्योतिर्विदाभरण (कालिदासकृत)
(मू० व हि० टोका) ` एन० पी० ठाकुर
सचित्र हस्तरेखा सामुद्रिक शिक्षा