भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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४३६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

अंगुल ७० वर्ष तक सिंधु और मालव देशों में सुख पूर्वक पालन करके स्वर्ग जाता है (वृ० पा०)।

पतले ओंठ, समान अंग, पतली कमर, लाल अंग, संधि रहित, चन्द्र समान कांति, ह्रस्ति समान लम्बी नाक, सुन्दर कपोल, उत्तम नेत्र, संग्राम में विख्यात पराक्रम, आजानु वाहु, ७० वर्ष तक राज्य करने वाला। १३ अंगुल लम्बा मुँह, दोनों कान का अन्तराल १० अंगुल चौड़ा। अपने अष्ट पुत्र के साथ लाट नामक देश, मालव देश, सिंध नाम देश, परियात्र पर्वत पर्यंत राज्य भोगने वाला (मान०)।

(५) शशक योग—छोटे-छोटे दांत और छोटा मुख किन्तु शरीर छोटा नहीं होता, शूरवीर पतली कमर, सुन्दर जांघ, बुद्धिमान, वन और पर्वत पर विहार करने वाला, शत्रुओं के छिद्र को जानने वाला सेना नायक, कुछ ऊँचे दांत वाला, चंचल, धातु वादी, स्थियों में आसक्त, दूसरे का धन पाने वाला, हाथ पैर में माला, वीणा मृदंग और शस्त्र के समान रेखा के चिह्न। पृथ्वी के अनेक भाग में ७० वर्ष तक सुख पूर्वक राज्य करके अंत में स्वर्ग को जाता है ( वृ० पा० )।

छोटे दांत और मुख, चिर काल तक किसी पहाड़ पर घूमने वाला, क्रोधी, शठ, शूरवीर, निर्जन वन में घूमने वाला वन पर्वत आदि स्थानों के तथा नदी तट पर रहने में प्रीति, अतिथि जनों में प्यार रखने वाला, सर्वत्र प्रसिद्ध, न अति लघु, न अति लम्बा हो अनेक प्रकार की सेना रखने वाला, उन्नत दंत, धातु वाद में कुछ चतुर चंचल नेत्र, स्थियों में आसक्त, दूसरों का धन हरने वाला, मातृ भक्त, उत्तम जांघ, पतली कमर उत्तम बुद्धि, पर छिद्र देखने वाला, हाथ पाँव में पलंग, शंख, शस्त्र मृदंग माला वीणा आदि रेखा हों। ७० वर्ष तक राज्य करने वाला यह शशक नाम का हो राजा होता है।

प्रवृज्या ( संन्यास या फकीरी योग )

प्रवृज्या योग—जिस योग के होने से जातक घर छोड़ कर दूसरे सम्प्रदाय में चला जाता है यह योग के अनुसार नाना प्रकार के साधु, भिक्षुक, संन्यासी आदि हो जाते हैं इस योग के प्रभाव से राजवंशी भी चरद्वार छोड़ कर वन वासी बन जाता है।

प्रवृज्या योग—एक राशि में ४ या अधिक ग्रह एकत्र होने से यह प्रवृज्या योग जाता है।

एक राशि का आशय—सब ग्रह समीप २ हों उन में कुछ ही अंशों का अन्तर हो। जैसे वृष राशि के १ अंशपर कोई ग्रह है दूसरा ग्रह वृष के २९ अंश पर है। इनमें अंशों का बहुत अन्तर पड़ जायगा। ग्रह चाहे दूसरी राशि में भी हो परन्तु बहुत अल्प अन्तर हो तो भी इस योग का प्रभाव होगा। जैसे कोई ग्रह वृष के २९॥ अंश है दूसरा ग्रह मिथुन के १ अंश पर है। यहाँ दोनों ग्रह समीप २ हैं अल्प अन्तर है यहाँ दूसरे भाव में ग्रह होने पर भी सामीप्य के कारण योग होगा। इस प्रकार ४ ग्रह अल्प अन्तर से समीप हों तो यह प्रवृज्या योग हो जाता है।