सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 65, कुल 454 में से
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योग विचार : ५७
शुरु का उच्चादि स्थिति का फल
गुरु उच्च का-उच्च आचरण, शुभ कमं, सुन्दर स्वरूप, मांडलीक राजां, सदा प्रसन्न, अनेक भृत्य, राजाओं का मन्त्री ( मान० ) पृथ्वी मण्डल का स्वामी, उदार बुद्धि दाता, ब्रह्म या आत्म वोध में निर्मल, बहुत पुत्र पोत्रों से युक्त, तीर्थ जाने में हृदय में
ग्रेम, पुष्ट देह के बंध वाला, मनुष्यों का स्वामी, उदार और धनी (छ० चन्द्रि ०) वंश
'कर्त्ता, सुशील चतुर, विद्वान्, राजा का प्रिय ( जा० पारि० ) । गुरु नीच का-दिव्य स्त्री, सुवणं पुष्प फल आदि प्रशंसनीय वस्तुओं के समूह से
परिपूर्ण, आनन्द देने वाला, सवंत्र पूजनीय, बहुत से जीवों का पोषक, देशान्तर में
रहने वाला ( मान० ), दुःखी, पापी ( छ० चं० ), अपवादी तथा खल (जा० पारि०) । गुरु मूल त्रिकोण का-ग्राम, पुर, मठ का स्वामी, बड़ा विद्वान् ( मान० ), { छ० चं० ), भोगी राजप्रिय ( जा० पारि० ) । गुरु स्वक्षेत्री-घनी, काव्य तथा वेदों का ज्ञाता, सदा कुलॉनुसार चेष्टा करने चाला ( मान० ), नाना कलाओं का ज्ञाता, पंडित घनी ( छ० च॑० ) । गुरु मित्र क्षेत्री-सज्जनों से पूजित, सत्कमे करने वाला ( मान० ), पूज्य अच्छे कर्म करने वाला ( छ० चं० ), अच्छे लोगों का प्रेमी सुखी ( जा ०पारि० ) । गुरु शत्रु क्षेत्री-नपुंसक, आजीविका रहित, अति बुभुक्षित (मान० ), ( ७० चं० ),
अच्छे कायं में रत ( जा० पारि० ) । (६) शुक्र का उच्चादि स्थिति का फल
शुक्र उच्च का-देव ज्ञान में कुशल, तंत्र तथा मंत्रों का ज्ञाता, गान विद्या में
प्रवीण, बड़ा कवि, लक्ष्मीवान्, भाग्यशाली ( मान० ), देशों का स्वामी, पुष्ट बुद्धि,
सुन्दर देह, सुन्दर मंत्री, योद्धा सम्पूणं मनुष्यों के पालने में लब्ध-यश, चोर आदि दुष्ट
जनों के दण्ड देने में तत्पर, अच्छा कवि, सुबुद्धिमान्, कुळ का स्वामी, बहुत प्रसन्न ।
विलासी बहुत हसने वाला, गान विद्या का प्रेमी ( ल० च० ) |
शुक्र नीच का-वड़ा कौतुकी, विनोद करने वॉला, सभा में उत्तम वाचक, सदा
बुद्धि से युक्त, राज कला और मणि से भूषित ( मान० ), स्त्री नष्ट हो जावे, स्वनेत्र.
और शीळ से वजित ( छ० चं० ), दुःखी ( जा० पारि० ) ।
शुक्र फल त्रिकोण का-चड़ा पंडित, सुख से युक्त, भूमि का स्वामी ( मान० ),
अच्छा जानने वाला, सुखी और वड़ा उत्तम ( ल० चं० ), ग्राम पुर का स्वामी
( जा० पारि० ) ।
शुक्र स्वक्षे्री-दिव्य मूर्ति, खेती करने वाला ( मात० ) । धनाढ्य और खेती करने
वाला ( छ० चं० ) । मनस्वी, घनी ( जा० पारि० ) ।
शुक्र मित्रक्षेत्री-धनवान्, बन्धुओं को प्रिय ( मान०) ( ल० चं० ) । पुत्र सुखी, भोगी ( जा० पारि० ) ।
शुक्र शत्र् क्षेत्री-भृत्य, कुबुद्धि युक्त, सदा दुःखी ( मान०) ( छ० चं०) ।
दास ( जा० पारि०) 1