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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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नाभस आदि योग : ४३९

कोन ग्रह क्या प्रवज्या करते हैं

१-खूयं अधिक बली हो तो--तपस्वी दूध कंद मूल फल खाकर तप करे ( वृ० जा० ) । वानभ्रस्थ तपस्वी जो वन पर्बतों में रहता है ( जा० पारि० )। साधुओं का स्वामी या मुखिया जिसने दीक्षा ली हो ऐसा योगी ( फळ० ) । वैखानस संन्यासी, तपस्वी अग्नि होत्र करने वाला वन पव॑तों में नदी किनारे आश्रम बनाकर तपस्या करने वाला, सूर्य का आराधक ( जा० भ० )। २--वल्वान्‌ चन्द्र-कपाली-(संन्यासी हिसा से रहित भस्म से सफेद देह, कपालों को धारण करने वाला शिव जी की दीक्षा वाळा । सोम सिद्धान्त में तत्पर कपालो है ( जा० भ० ) । कापालिक व शैव कनफड़ा ( वृ० जा० ) । तीथं आदि में भटकते फिरने वाला यात्री ( फल० ) । गुरु ( राजश्रीयुक्त तपस्वी ) ( जा० पारि० ) । ३--वलवान्‌ मंगल--छिंगी संन्यासी, गेरुआ वस्त्र धारण करने वाला अपनी बुद्धि से देवताओं की उपासना करने वाला, शिखा रहित, पांडु वस्त्र पहिरने वाला, भीख माँगने वाला, लाल कपड़ा पहिरने वाला, इन्द्रियों को जीतने वाला सन्यासी होता है ( जा० भ० ) बौद्ध धर्म का साधू बनेगा और बुरा सलाहकार बनायेगा ( फलछ० ) । शाक्य ( दुराचारवान्‌, कुशील, वंचक ) साधू ( जा० पारि० ) । ४--वलवान्‌ बुध-दंडी संन्यासी (कपट करने वाला, गारुड़ी मन्त्र का आराधक मयुर तंत्र के मत में स्थित, मांस खाने वाला दंडी कहलाता है) ( जा० भ० ) । साधु जो भिन्न २ मत के विषय में कुछ नहीं जानता ( फल० ) । जीवक (उदर पुति करने वाला, भोजन में तत्पर, बहुत बोलने वाल') साधु ( जा० पारि० )। एक दंडी और यती ( वृ० जा० ) |

५--बलवान्‌ गुरु-यती, तपस्वी, एक दंड या ३ दंड का धारण करने वाला, गेरुवा कपड़े पहिरने वाला, वानप्रस्थ धमं सहित, ब्रह्मचर्यं को प्राप्त, तीथो में स्नान करने वाला ( जा० भ० )। वेदान्ती तत्ववेत्ता प्रसिद्ध साधु ( फल० ) । आजीविक

वैष्णव ( वृ० जा० ) । भिक्षु ( एक दंडी निरन्तर उपनिषद्‌ का तत्वज्ञ महात्मा ) । ६->-वलवान्‌ शुक्र-चक्र का धारण करने वाळा पशुपति पक्ष की दीक्षा में स्थित, सदा व्रत करने वाला ( जा० भ० ) । रोगी साधु बनेगा जो जीविका के लिए साधुवेश धारण करता है जाति वहिष्कृत ( फल० ) । चक्रांकित ( वृ० जा० ) । चरक ( नाना

देश प्रवासी श्रेष्ठ यति ) ( जा० पारि० ) ।

७--बली शनि-नंगा संन्यासी, पाखंड व्रत में स्थित,नग्न ब्रत धारण करने वाला

श्रावक मत में स्थित कठिन तपस्या करने वाला ( जा० भ० ) । जाति से वहिष्कृत

साधु ( फछ० )। विवास ( सदा नंगा रहने वाला, विना वस्त्र के रहे ) ।

१-एएक् स्थान में ४ बली ग्रह-नित्य वनवास करने वाला होता है चाहे वह राज

वंशी क्‍यों न हो ।

एक स्थान में ५ वली ग्रह--नित्य कंदमूल खाने वाला अति शान्त स्वभाव

जितेन्द्रिय हो ।

४४० : रविम ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

एक स्थान में ६ बली ग्रह—राज कुल का भी हो तो भी नित्य पर्वत में शिला तल बास कर तपस्या करने वाला होता है।

२—संन्यास योग में राहु युक्त हो या कूर्पाश्वक में गुल्फिक युक्त हो तो संन्यास में विफलता होने है। अर्थात् संन्यास त्याग दे।

३—प्रवज्या कारक ग्रहों में २,३ ग्रह बली हों तो पहिले एक प्रकार की फकीरी लेगा फिर दूसरे प्रकार की, पश्चात् तीसरे प्रकार की। प्रथम जिस ग्रह की अंतर्देशा होगी तब उस ग्रह के अनुसार प्रवज्या होगी दूसरे की अंतर्देशा आने पर पहिली दीक्षा त्याग कर वर्तमान ग्रह की दीक्षा लेगा। इसी प्रकार ग्रहों के प्रभाव से एक छोड़ कर दूसरी ग्रहण करता रहेगा।

४—प्रवज्या कारक बली ग्रह अस्तंगत हो तो अदीक्षित अर्थात् बिना गुरु मंत्रों-पदेश के संन्यास या फकीरी लेगा परन्तु उस सम्प्रदाय में उसकी भक्ति या प्रेम होगा। या मुँह से कहे या विचार करे कि मैं दीक्षा लूँगा परन्तु उसमें प्रेम होते हुए भी दीक्षा न लेवे यदि ग्रह निर्बल हो ( उच्चादि बलहीन हो ) और सूर्य के साथ अस्त हो तो सूर्य जन्म प्रवज्या होगी अर्थात् वह तपस्वी होगा।

५—युद्ध में पराजित ग्रह को—मंगल आदि ग्रहों में एक ही अंश पर ग्रह रहने से ग्रह युद्ध समस्या जाता है। इसमें शुक्र उत्तर या दक्षिण में हो दोनों में विजयी समस्या जाता है अन्य ४ ग्रह बुध गुरु मंगल और शनि में जो उत्तर में रहता है वह जयी समस्या जाता है और दक्षिण वाला पराजित समस्या जाता है इस प्रकार जो ग्रह युद्ध में पराजित हो उसकी प्रवज्या में जातक उस प्रवज्या को ग्रहण कर छोड़ देता है। यदि न पराजित हुआ हो तो बलीग्रह की अंतर्देशा में दीक्षा पावे।

६—राजयोग प्रवज्या योग दोनों बलवान् हों तो वह विरुद्ध फल योग पर साधु होकर भी राजा हो।

७—फर्क ग्रहों में जिसका बल अधिक होगा उसकी दीक्षा पहिले होगी पश्चात् दूसरों की होगी।

८—यदि ग्रह बलवान् हो तो उसकी दीक्षा मरने तक रहे।

यदि ग्रह निर्बल हो तो उसकी दीक्षा लेकर छोड़ देवे।

सब ग्रह बली हों—तो नित्य भोजन त्याग कर नंगा-रह कर योग मार्ग में तत्पर हों।

९—एक स्थान में ५,६ ग्रह हों तो वह दरिद्रों और मूर्ख भी होता है।

१०—अन्यमत है कि प्रवज्या कारक ग्रहों में दशमेक्ष भी होंवे, दशमेक्ष के वर्ग का साधु होगा।

अन्य प्रकार से प्रवज्या योग

१—जन्म समय चन्द्रमा जिस राशि पर रहता है उसका स्वामी जन्मेश कहलाता है। जन्म समय जन्मेश पर किसी ग्रह की दृष्टि न हो और चन्द्रमा शनि को देखे तो प्रवज्या योग होता है इसमें भी शनि चन्द्र में से जो बली हो उसकी अंतर्देशा में प्रवज्या होगी ( बु० जा० )।

नाभस आदि योग $ ४४१

२-जन्मेश निबंछ हो उस पर बलवान्‌ शनि की दृष्टि हो ( बृ० जा० ) |

३-शनि चन्द्र के द्रेष्काण में हो या शनि व मंगल के नवांश में हो केवल शनि की दृष्टि हो ओर कोई ग्रह की दृष्टि न हो तो शनि युक्त प्रवज्या होगी (वृ० जा०)।

४-चन्द्र निबंछ हो उस पर पाप ग्रह की दृष्टि हो विशेष कर शनि की पूर्ण दृष्टि हो तो भाग्य हीन हो ( वु० जा० )।

५-गुर नवम स्थान में हो, गुरु चन्द्र ओर लग्न इन तीनों को शनि देखता हो । इसमें यदि पूथं कथित राजयोग का लक्षण भी हो तो भी जातक राजा होकर तीथकर हो अर्थात्‌ बुध आदि के समान स्वयं सम्प्रदाय चलाने वाला हो या शास्त्र कहने वाला होगा ( वु० जा० ) ।

६-शनि नवम हो और उसे कोई ग्रह न देखे । यदि उसे राजयोग भो पड़ा हो

तो वह राजा होने पर भी फकीरी दीक्षा पायेगा, ऐसे योग में कोई राजयोग न हो तो

इस प्रवज्या का फल होगा ( वृ० जा० ) ।

७-९, १२ या ४ राशि लग्न में हो, उस पर शनि की दृष्टि हो ओर गुर नवम

स्थान में हो तो अपना राज्य छोड़कर देश-देशान्तर घूमे भ्रमिष्ट हो (प्रा० यो०) । ८-लग्नेश या केवल शनि की दृष्टि हो अन्य की दृष्टि न हो या शनि को लगेज

देखे लग्नेश को शनि देखे बलरहित हो तो प्रवज्या योग हो | ( स० चिं० ) |

९-चन्द्रमा शनि के द्रेष्काण में हो उसपर शनि की दृष्टि हो ( स० चिं० )।

१०-चन्द्रमा यह शनि के व मंगल के अंशक. में हो शनि से दृष्ट हो या चन्द्रमा

शनि सहित हो तो संन्यास योग हो ( स० चि० ) ।

११-छग्नेश पर और ग्रहों की दृष्टि न हो, लग्नेश की दृष्टि शनि पर न हो

और शनि भी बलहीन लग्नेश को न देखे तो दीक्षा लेकर संन्यासी होता है (जा.भ-)।

१२-लग्नेश शनि के द्रेष्काण में हो, मङ्गल व शनि के नवांश में हो उसपर शनि

की दृष्टि हो तो वह कुटिल दुष्ट शील पाखंड का मंडन करने वाला तपस्वी होता है ( जा० भ ) ।

१३-नवम पंचम भाव में शुभ ग्रह हो और कोई ग्रह न देखता हो तो संन्यासी हो ( जा० भ० ) ।

१४-चन्द्रमा शनि के द्रेष्काण में हो उसपर मङ्गल और शनि की दृष्टि हो तो वह साधु हो ( फल० ) ।

१५-चन्द्रमा मङ्गल के नवांश में हो अर्थात्‌ नवांश स्वामी मंगल हो और शनि

की दृष्टि हो तो मंगल से जो वे प्रगट हो उसी वर्ग का साधु हो ( फल० )।

१६-जन्म राशीश पर किसी ग्रह की दृष्टि न हो केवल शनि की दृष्टि हो तो वह साधु हो (फल) ।

१७-दशम में बलवान्‌ ३ ग्रह स्वोच्चादि वर्ग स्थित हों दशमेश अधिक बली हो तो वह यती या उसके समान शीलवाला हो ।

१८-दशमेश बलहीन सप्तम में हो तो वह दुराचारी हो ।

१९-प्रब्रज्या कारक ग्रहों के बीच द्वितीयेश ओर सप्तमेश हो तो वह काम बुडि

४४२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

होता है । (जा. पारि.)

२०-प्रवज्या प्रद ग्रह सूये शनि मंगल से युक्त हो तो धन पुत्र स्त्री से रहित सन्यासी हो ।

२१-शुभ नवांश में सूये हो और वह उच्च के अन्त भाग में स्थित ग्रह को देखता

हो तो वह युवा या बालावस्था में संन्यासी हो । (जा. पारि.)

२२-शुक्र और बुध बलहीन होकर लग्न को देखें तो दरिद्र हो । (जा. पारि.)

२३-कोई ग्रह उच्च राश्यंश में युक्त होकर चन्द्र को देखता हो तो भिक्षुक (संन्यासी) हो । ८

२४-बहुत ग्रह एक स्थान में होकर लग्न को देखें तो दीक्षित हो।

२५-जहाँ चन्द्र हो उस राशि के स्वामी को शनि या लग्नेश देखते हों तो दीक्षित

हो (प्रवज्या हों) ।

२६-यदि चन्द्रमा मंगल की राशि में हो शनि के द्रेष्काण में हो शनि उसे देखता . हो तो सन्यासी हो । :

२७-तवम भाव में चन्द्र हो उसे कोई ग्रह न देखता हो तो राजयोग में उत्पन्न

होने पर भी दीक्षित राजा हो (जा० पारि०) 1 अन्य विचार

२८-एक राशि में इस प्रकार ग्रह हो ।

सुर्य, चन्द्र, गुरु, बुध ) तो बल्कल धारी फल भोजी सन्यासी हो । या मगल, बुध, शुक्र शनि ? या चन्द्र गुरु शुक्र शनि ]

२९-चन्द्र क्षीण हो प्रवज्या योग हो लग्नेश चन्द्र को देखे तो जातक दुःखी तपस्वी, शोक तप्त, धन जन रहित, कष्ट से भोजन पाने वाला हो ।

३०-प्रवज्या योग में राजयोग होवे तो बुरा प्रभाव घट जायगा वह दीक्षित साधु शील राजा बना रहेगा जिसे सव नमन करेंगे । ३१-यदि ४ ग्रह जिनमें एक दशमेश भी हो केन्द्र या त्रिकोण में हो या ३ बल- चान्‌ ग्रह अच्छे घर में पड़ें हो तो वह सिद्ध सन्यासी होगा । ३२-भ्रवज्या कारक ग्रहों में अधिक शुभ ग्रह हों और अच्छे घर में हों तो उसका सव लोग मान करेगे। यदि ऐसा न हो तो उसका कोई मान न करेंगे । ३३-जव दशमेश ४ और ग्रहों के साथ केन्द्र या त्रिकोण में हो तो वह मुक्ति प्राप्त करेगा ।

३४-यदि राशि का अन्त उदय हो रहा हो और उसका स्वामी शुभ ग्रह हो गुरु कैन्द्र या त्रिकोण में हो तो भी मुक्ति प्राप्त करेगा । ३५-अवज्या योगों में शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट न हो तो संन्यास लेने पर भंगहो जावे। ३६-अवज्या योग में ग्रह युद्ध में पराजित ग्रह की भी प्रवज्या भंग हो जायगी अर्थात्‌ वह फकीरी लेकर उसे छोड देगा । जितने ग्रह पराजित हैं उन सब की प्रवज्या छुटती जायगी केत्रल जीते हुए की प्रवज्या रहेगी ।

र छ

This image shows a blank, aged, cream-colored page, likely an endpaper or flyleaf from an old book. The paper has a slightly textured appearance with some minor discoloration and small brown spots, characteristic of old paper. A small, bright yellow circular mark is visible on the right edge, near the top. The left edge of the page shows some wear and discoloration, suggesting it was part of a bound volume.

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