सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 105, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्रहो की अवस्थाए ओर चन्द्र क्रिया : ८९
५ ग्रभनेज्छा--विदेश वास, क्रूर कार्य करने वाला, मस्तक पीड़ा, दंत पीड़ा, गरीब,
कृष्ण पक्ष में विशेष रूप से क्रूर, नेत्र रोग से पीडित, पाप में निरत, शुक्ल
पक्ष में भयभीत ।
६ गणशव--बड़ा अमिमानी, पांवों ५ रोग, गुप्त पाप में निरत, बड़ा दीन, वृद्धि सन्तोष
से रहित ।
७ सभावसति--सदा दानी, धर्म या गुण की ओर प्रेम, राजा या राजकीय पुरुष का
पुत्र हो । उच्च पुरुष हो । पूर्ण चन्द्र--सब मनुष्यों में उत्तम, सत्यवक्ता,
राजाओं से मान पाने वाला, कामदेव के समान सुन्दर, कामिनी स्त्रियों को
शांत करने वाला उत्तम रीत व प्रीत जानने वाला, वडा गुणज्ञ ।
८ आगसब--वातूनी, शांत, दो स्त्री हों, गुणी कुछ निद्रालु, रोगी सरीखा, बहुत दुःखी
और एक पुत्र हो । पूर्ण चंद्र-बहुत वाचाल, धर्म से पुर्ण । कृष्णपक्ष ( क्षीण
चंद्र )--२ पलीवाला, रोगी, दुष्ट, हठी ।
९ भोजन--बहुत लालची, धनी, क्रूर, दुर्बल देह, दानी, विदेश वासो, सदा रोगी, हाथी
पांव का रोग ।
शुक्लपक्ष (पूर्ण चंद्र) लोक में आदर, पारिवारिक सुख, स्त्री पुत्रों का सुख ।
कृष्णपक्ष ( क्षीण चंद्र ) यह फल नहीं होता विपरीत होता š ।
१० नृत्यलिप्सा--धन देवे, कई प्रकार के गुण, दान देने को ओर झुकाव, कई पुत्र, चंद्र
बलवान हो ( शुक्लपक्ष में )--ब ड़ा बलवान, संगीतज्ञ, रसज्ञ ।
कृष्णपक्ष मे--पाप करने वाला ।
११ फौतुक--लरन से ९ या १० घर मे इस अवस्था में चंद्र हो तो वह विद्वान हो सब
प्रकार का सुख भांगे, कभी गरीव न हो । साधारण फल-राजा या पूर्ण
धनवान हो, काम कला में कुशल, वेश्या से प्रम ।
१२ चिद्रा--चन्द्र की यह स्थिति बहुत अलाभजनक है । दन्त पीडा, कामी, अशान्ति,
आपत्तिवान, रोगी, सदा भ्रमण शीळ, अपने पुत्र की हानि का दुःख भोगे ।
इस अवस्था में चन्द्र गुरु के साथ किभी घर में हो तो प्रत्येक बात सूळभ होती
है। प्रतिष्ठा प्राप्त हो । यदि गुरु से युक्त न हो क्षीण हो तो स्त्री और
संचित धन का नाण होता है उसके घर में गाली रोती है । यदि राहु युक्त
हो तो सबाप्रकार का नाश हो । कई प्रकार के अवगुणो से युक्त हो ।
३. मंगल की १२ अवस्थाओं का फल
१ शयन--वुरे आचरण का, कृपण, अति क्रोधी, अधिक योग्यता, आनंद और विद्या,
ब्रण, खुजली, दाद से अति पीडित । शयन में मंगळ पंचम में हो तो पहली
संतान की मृत्यु, सप्तम हो तो पहिलो स्त्री को मृत्यु, यदि षष्ठ में हो और
शत्र ग्रह से दृष्ट हो तो कामदेव के निमित्त इसका हाथ और कान काटे जाने
लायक हो । यदि राहुं युक्त मंगल लग्न में हो तो नेत्र रोग, शरीर में घाव