सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 107, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्रहों को अवस्थाएं' और चन्द्र क्रिया : ९१
मित्र से रहित हो । इससे मित्र स्थान में हो तो घनी मानी दानी हो 1 राज
= als सभा में बैठने वाला बुद्धिमान हो।
८ आगसत-जीवन भर लंगडा, पित्तज पीड़ा, कान के रोग हों, दुर्गुणी, नीच आचरण
पर न्यायी धनी हो । घमं कर्म रहित, रोग से दुःखी, बड़ा शूल रोग, कातर
बुद्धि, (डरपोक) दुष्ट संग, यदि दशम घर में हो तो उन्नति हो, धन हो, सब
प्रकार से अच्छा, माननीय हो, २ स्त्री और कई सन्तान हों!
९ भोजन -मांस खाने का इच्छुक, क्रोधी, सदा उग्र, घनी, ठिंगना शरीर, यदि बलवान
मङ्गल हो तो मिष्टान्न भोजी हो | निबंल हो ता नीच कर्म करने वाला और
मान होन हो। यह इस अवस्था या शयन अवस्था में अष्टम घर में हो तो
वह पशु से मारा जाये ।
१० नृत्यलिप्सा-घनो, दानी, अच्छा खाने का प्रेमी, सदा निराश, कई गौ से युक्त ।
राजा से लक्ष्मी प्राप्ति, सुवर्ण रत्न दुर्गो से सुशोभित, यदि लग्न दवितीय या
दशम या सप्तम घर में हो तो-सब प्रकार का सुख भोगे यदि अष्टम या
नवम घर में हो तो कई प्रकार का दु:ख भोगे, धर्म से, पतन, अचानक मृत्यु ।
११ कौतुक-विद्यावान पुत्र हो, धन, उन्नति हो, कोतुक करने वाला, भित्र, पुत्र आदि से
युक्त । उच्च का मंगळ हो तो राजा और गुणज्ञ जनों से पूजित हो बड़ा
पंडित हो, यदि ५,७ और ९ घर को छोड़ कर् अन्यत्र हो तो उपरोक्त फल
यदि ५,७ य। ९ घर में हो तो दोष युक्त अंग, कई प्रकार के रोग, पहिली
स्त्री पहिला पुत्र मरे ।
१२ निद्रा-बड़ा क्रोधी, बुद्धि और घन से होन, बड़ा धूतं, घर्म से होन, रोगों से पीडित ।
यदि लग्न, २,३,९ या ११ वें घर में हो तो वह अज्ञानी गरीब, क्रोधी
दुगुणी हो । यदि ५ या ७ घर में हो तो कई पुत्र हों और कई प्रकार से
सुखी हो । यदि मंगळ राहु युक्त हो तो ज्येष्ठ पुत्र की हानि हो कई प्रकार
से दुःखी हो, कई स्त्रो हों दानी ओर गुणवान हो, पाव रोगी हा ।
४. बुध को १२ अवस्थाओं का फल
१ शयन — में हो तो धनी हो, सदा भूखा, लंगडा, शरीर का कोई अंग काटा जावे,
लालनेत्र बाळा, असमथं । अन्य भाव में हो तो गरीब और आचरण होन
हो, गड़ा कामी और धूतं हो 1
२ उपवेशन-अच्छा ववता हो कवि हो शुद्ध व्योहार । लग्न में हो तो गुणों की राशि से
पूर्ण । पाप युक्त या पाप दृष्ट हो तो दुर्गुणी हो दरिद्री हो । भित्रक्षत्री या
उच्च का या मित से दुष्ट हो तो घनी और सुखी हो पदित्र आर घामिक हो
परन्तु नेत्र रोग से पीडित हो!