भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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१०० 1 ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

घ० प०

उवाहरण--जन्म नक्षत्र घनिष्ठा भुक्त ३७-३ = २२२३. पल

पल

३००) २२२३ (७गत यहां लब्धि ७ होने से ७ अवस्था गत हो गई दोष १२३ बचा

२१०० वह ८ वीं अवस्था का दै इस कारण आगे ८ वीं अवस्था

प्र

'ंद्र क्रिया जानना

चंद्र क्रिया ६० हैं जो नीचे दी हैं ।

१ स्थान भ्रष्ट

२ तपस्वी ( तपस्या करने वाला )

३ परयुवतीरत

४ दूत कृत

५ हस्ति मुख आरूढ

६ सिंहासनस्थ

७ नरपति ( मनुष्यों का नेता )

< अरिहंता (शत्र नाशक )

९ दंडनेता ( जज )

१० गुणी

११ निष्प्राण (मृत या बिलकुल थका)

` १२ छिन्न मूर्धा (मस्तक कटना)

१३ क्षतकरचरण (हाथ पैर जख्मी)

१४ बंघनस्थ (बन्दी)

१५ विनष्ट = (गुमा हुआ या नष्ट)

१६ राजा

१७ वेदानघीते (वेद अध्ययन)

१८ स्वपित (निद्रित)

१९ सुचरितः संस्मृतो (अच्छे चरित्र

का) स्मरण

२० घर्मकर्ता (घमं करने वाला)

२१ सदूवंशीयो (अच्छे वंश में उत्पन्न)

२२ निघिसंगताः (निधि संग लेकर आया)

२३ श्रुतकुलो (प्रसिद्ध कुल का)

''भीति.' आई जिसका फल अवस्थानुसार :अर्थात्‌ भय है ।

२४ व्यापारपरः (प्रदर्शन में चतुर)

२५ चत्रुहा (शत्रु नाशक)

२६ रोगी

२७ शत्र जितः (शत्र, द्वारा पराजित)

२८ स्वदेश चलनो (स्वदेश को प्रस्थान)

२९ भृत्य (नौकर)

३० विनष्टार्थकः (थोड़ा माल है वह

भी) नष्ट कर दिया

३१ आस्थानी (सभा में सदैव उपस्थित)

३२ सुमंत्रक (अच्छा सलाहकार)

३३ परमहीभर्ता (दूसरे क्री भूमि का

संरक्षक)

३४ सभार्या (अपनी स्त्री के साथ रहना)

३५ गजत्रस्तः (हाथी से भयभीत)

३६ संयुग भीतिमान (झगड़े में डरपोक)

३७ अतिभयो (वहुघा अधिक डरपोक)

३८ लीन (छिपे तौर पर रहना)

३९ अन्न दाता (दूसरों को भोजन देने

वाला)

४० अग्तिगः (अग्नि में या अग्निसमीप)

४१ क्षुद्बाघासहित ( भूख से व्याकुल )

४२ अन्नमत्ति (पके चावल खाता है)

४३ विचरना (घुमना)

४४ माँस अशनो (मांस भोजन)