भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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ग्रहों की अवस्थाएँ ओर चन्द्र क्रियां: ९. |

३ नेत्रपाणि-नेत्र रोग हो, दुष्टों से व शत्रू, सर्प और राजा से भय । 3

४ प्रकादान-घनघान्य पूर्ण, राजा से मान, यश लाभ, उत्साही, मल प्रकृति, Í T

या परदेश में जाने से सुख ।

५ गसनेच्छा पुत्र और सम्पत्ति युक्त, बड़ा पंडित, राजा से मान पाने वाला

गुणी, दानी, पुरुषों में श्रेष्ठ । 0002.

६ गमन -अनेक रोग, घन रहित, दंत रोग, पिशुन, परनिंदक, दुष्ट बुद्धि, अति कार्य,

धर्म हीन, क्रोधी ।

७ सभावसति-चड़ा गित, वाचाल, कृपण, बड़ा कामी, धूर्त मनुष्यों की विद्या में

प्रवीण ।

८ आगभन-पापियों का सरदार, बंधुजनों से विवाद करने वाला, अतिदुष्ट, शत्रु और रोग

से पीड़ित ।

९ भोजन -भूख से पीड़ित, अति दरिद्र, रोगी होकर भूमि में भ्रमण करता है ।

१० नृत्यलिप्सा-रोग से पीड़ित, आंख में फूछो वाला, किसी के बश में नहीं होने वाला,

बड़ा qd, और अनर्थ करने वाला ।

११ फौतुक-वेश्याओं से प्रेम, स्थान हानि, दुराचारी, दरिद्र, भ्रमण शील ।

२ निद्रा-घन धान्य से सुखी, अनेक गुणों के विनोद से अपना समय व्यतोत करने

वाला ।

चंद्र की विशेष १२ अवस्थाएँ

१ आत्मस्थानात्‌ प्रवासी = अपने स्थान से अनुपस्थिति ।

२ महितनृपहितो = हितैषी राजा का प्रिय ।

३ दासता प्राणहानिः = सेवा के कारण अपना जीवन खोने का भय |

४ भूपालस्व = पृथ्वी का शासक होने की योग्यता प्राप्त होना ।

५ स्ववंश उचित गुण = अपने कुटुम्ब के योग्य गुण और योग्यता होने की प्रसन्नता ।

६ रोगी 5 बीमार ।

७ आस्थानत्वम्‌ = सभा में नायक या नेता बनने की इच्छा !

८ भीति = भय ।

९ क्षुद्व्याधित्वं = क्षुघा की पीड़ा से दुःख।

` १० युवतिपरिणयो = युवती स्त्री से विवाह ।

११ रभ्यणग्यानुषकितः = रमणक शय्या प्राप्त करने को इच्छा । -

१२ मिष्टाशित्वं = स्वादिष्ट भोजन करना 1

अवस्था.निकालने की रीति

जन्म नक्षत्र के भुक्त घड़ी पल के पल बनाकर ३०० का भाग देना-छन्धि

चंद्र कौ अवस्था होगी । यदि शेष बचता है तो उसके आगे को अवस्था जानना