सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 136, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ें१२० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(२३) शुभ वर्गोत्तम में जिसका जन्म हो और बारहवे स्थान में शुभ ग्रह और अशून्य
कारक ग्रह हो तो--
सूय केन्द्र में होने से-राजा का सेवक ।
चन्द्रमा केन्द्र में होने से-वेल्य वृत्ति करने वाला ।
मंगल केन्द्र में होने से-वीर और शस्त्र की वृत्ति करने वाला ।
बुघ केन्द्र में होने से-पढ्ने वाला ।
गुरु केन्द्र में होने से-अपने अनुष्ठान में रत अच्छी बुद्धि वाला ।
शूक्र केन्द्र में होने से-विद्या और द्रव्य युक्त ।
शनि केन्द्र में होने से-नीच की सेवा करने वाला ।
पद लग्न या आरूढ़ लग्न निकालना
जिस कुण्डली में पद लग्न जानना हो तो देखो लग्न स्वामी कौन है और कहाँ पर
हैं । लग्न से जितने स्थान पर लग्ने होगा उस स्थान अर्थात् लग्नेश के स्थान से उतना
ही स्थान और गिनने पर जो राशि वहाँ ही वहो पदलग्न होगी । जैसे यहाँ पर लग्नेश
बुध ९ स्थान कुंभ में है। तो बुघ से स्लम
९ स्थान आगे और गिना तो तुला
आया । लग्न से पांचवें घर में है तो
यहाँ तुला पदलरन हुआ ।
यदि लग्नेश सप्तमम हो तो सप्तम
स्थान से गिनने पर वही सप्तम स्थान
आया जहाँ लग्न है । ऐसी परिस्थिति
में लग्न की राशि ही पदलग्न हुआ। जैमिनि ने पदलग्न का प्रयोग किया है इसे ही
लरनाख्ढ़ कहा है । इसे पद कहते हैं । पद शब्द Q ऊग्नपद ग्रहण करना ।
इसमें स्वस्थान या सप्तम राशि पर पद नही होता । यह भी कहा हैं कि जब
सप्तम स्थान पर पद होता हो तो चतुथं भाव को पद समझना ।
यदि स्वस्थान पर पद होता हो तो दशम भाव को पद समझना ।
जैसे जब चतुर्थ में लग्नेश हो तो उससे चतुर्थ गिनने पर सप्तम भाव में पद आता
है ऐसी परिस्थिति में चतुथं भाव को ही पद समझना ।
जब लग्नेश सप्तम में हो तो उससे सप्तम स्थान गिनने पर वह लग्न स्थान आ
जाता है तब दशम भाव को पद समझना बताया गया है । i
यह पदलरन महत्त्व का होता है । इसको भी लग्न मानकर फल या विचार
होता है । '
भाव पद
लर्न का पद qaq प्रत्येक भाव का पद निकाळ कर उससे फल का विचार होता
है । उस भाव का स्वामी जितने स्थान पर है उस भावेश के स्थान से उतना ही आगे