सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 280, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ें२६४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड
मतांतर-तुतोय द्रेष्काण--ऊपर द्रेष्काण के
अनुसार जो अंग बताये हैं उनमें केघल तीसरे
द्रेष्काण. में कुछ भिन्नता है जैसा यहाँ चक्र में
बताया है ।
१ लग्न--बस्ति, २ भाव--दाहिना शिएन
व गुदा, ३ भाव--दाहिना अंडकोष, ४ भाव--
वट उर दाहिना, ५ भाव--जानु दाहिना, ६ भाव--
घुटना दाहिना, ७ भाव-दोनों पैर, ८-बांया घुटना, ९-ायी जच, १०-बाँया उरु, ११-
बाँया वृषण, १२- बाँया शिईन w गुदा (वृहज्जातक, शंभु होरा० में इसे ही माना है) ।
ग्रहों का कालांग
१ सूयं-सिर से मुख तक, २ चंद्र--गले से हृदय तक, ३ मंगल--पेट से पीठ तक,
४ बुध--हाथ ओर पैर, ५ गुरु--कमर से जंघा, ६ शुक्र--णिदन से वृषण, ७ शनि
घुटने से पिंडली । : s
ग्रहों की शुभाशुभ स्थिति के अनुसार अनुष्य के इन अंगों पर से ग्रह प्रभाव डालते 8 ।
ग्रहों के शुभाशुभत्व उच्च नीच या अंश के फल पर योग दृष्टि अनुसार फल: होता ë ।
अन्य मत से-- षष्ठेश पाप युक्तं होकर लग्न या रूख से अष्टम में हो तो इस प्रकार
अंगों में घाव फरते हैं ।
(१) सूयं--सिर में (२) चन्द्र--मुख में (३) मेंगल--कंठ में, (४) बुध-हृदय (५)
गुरु--नाभि के नीचे (६) शुक्र--नेत्र या पीठ (७) शनि-पैर में (८) राहु केतु-ओठ में ।
द्रेष्काण के अनुसार शरीर का अंग विचारने में इस प्रकार भी विचार करते हैं कि
लग्न एवं अन्य भाव में कोन-कौन द्रेष्काण है । इसके विचार से अंग विभाग के ३ खंड
हो जाते ( इसमें राशियों का विचार नहीं है ) भाव के स्पष्ट पर से उनका द्रेष्काण निकालना
यदि प्रथम द्रेष्काण में जन्म हो तो प्रथम खंड के बाद द्वितीय अंग खंड, फिर उसके बाद तृतीय अंग खंड का विचार करना ।
दूसरे द्रेष्काण में जन्म हो तो पहिले द्वितीय खंड के बाद तृतीय खंड पश्चात् इसके प्रथम खड से अंग विचारना ।
यदि तृतीय द्रेष्काण में जन्म हो तो पहिले तृतीय अंग खंड फिर प्रथम अंग खंड अन्त में द्वितीय अंग खंड के अनुसार अंग विचारना । ट्
अर्थात् प्रथम द्रेष्काण में जन्म हो तो प्रथम भाव के प्रथम खंड में प्रथम खंड के अंगों
का क्रमश: जन्म द्रेष्काण से आरम्भ कर लेवे । एवं लग्न के द्वितीय द्रेष्काण से आरम्भकर
प्रत्येक भाव के द्वितीय द्रेष्काण में द्वितीय खंड के अंगों का क्रमशः एवं लग्न के तृतीय द्रेष्काण में तृतोय खंड के अगों का क्रमशः विचार करना । परन्तु यदि जन्म लग्न द्वितोय , द्रेष्काण में.हो तो प्रथम भाव के द्वितीय द्रेष्काण से आरम्भ कर क्रमशः सभी भावों के.द्वितीय द्रेष्काण में द्वितीय खंड के अंगों को लेना . फिर लग्न के द्वितीय ब्रेष्काण से. आरम्य कर क्रमशः समो भावों के प्रति द्रेष्काय में तुतोय