भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

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कालांग विचार : २६३

२--द्वुसरा द्रेष्काण हो तो कंठ, कंधा, बाहु, पाएवं, वक्षस्थल, पेट, नामि आदि का विचार होता है ।

र--तीसरे द्रेष्काण में बस्ति गुप्तांग अंडकोष उर जांघ आदि का विचार होता है।

प्रथम द्रेष्काण

भा.क्र. अंग

मस्तक

दाहिनी आँख

दाहिना कान

दाहिना नकपुड़ा

दाहिनी गाल

दाहिनी ठोड़ी

मुख

बाइँ ठोड़ी

बायाँ गाळ

१० बायाँ नाक

११ वायां कान

२ बायीं झाल

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द्वितीय द्रेष्काण

भा.क्र. अंग

१ कंठ

२ दाहिना कंघा

३ दाहिना हाथ (भुजा)

४ दाहिनी कांख

५ दाहिना हृदय

६ दाहिना पेट

७ नाभि

८ बायाँ पेट

९ बायाँ हृदय

१० बायीं कांख

११ बायों भुजा

११ बायाँ कंघा

तृतीय द्रेष्काण

भा.क्र. अंग

नाभि से शिएन तक

गुदा दिन

दाहिनी गुदा

दाहिना अंडकोष

दाहिनो उर

दाहिनो जांघ

दोनों पैर

बाइ जाँघ

बाई उरु

बायाँ अंडकोष

बायों गुदा

बायाँ शिशन