भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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२६२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

अध्याय १२

कालांग विचार

१२ राशिका जो एक चक्र है वह पुरा कालपुरुष समझा जाता है। और प्रत्येक राशि

चलेगा से विचार होता है कि वह राशि काळपुरुष का कौन सा अंग है। राशि से पता कि किस अंग पर उस ग्रह का प्रभाव पड़ेगा । राशि अंग š (१) मेष--सिर, मरतक अर्थात्‌ कपाल, आँखें और मुंह के उपर का भाग । (२) वृष--मुख, चेहरा, पुरा गला, और कंठ भी इससे लेते हैं । (३) मिथुन--छाती, कठ से छाती तक का भाग, स्तन मध्य इसमें बाहु गौर कंधा भी लेते हैं । (४) कर्क--हृदय, वक्ष-स्थल, चित्त ।

(६)

(५) सिंह--उदर (पेट) इससे हृदय, रक्ताशय, कलेजा, पीठ, पसली भो लेते हैं १ कन्या--कटि (कमर) कुक्षि, जठर, अँतडी भी लेते हैं | (७) तुला--वस्ति, नाभि के नीचे का भाग, मूत्र पिंड ( गुरदा ), नाभि, qz हाथ का पंजा । (८) वृश्चिक--गुप्तांग जननेन्द्रिय, गुदा आदि, गुह्चेन्द्रिय । (९) घन--जाँघ दोनों, तथा पैर की संधि, वृषण । (१०) मकर--घुटने दोनों । (११) कुंम--दोनों पिडलो । (१२) भीन--दोनों पैर (चरण) पर की अंगुली आदि । जिस राशि पर कोई पाप अह हो उस राशि के अंग में चिल्ल करता है इसका विचार आगे दिया है। जति

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भाव के अनुसार मी इसी प्रकार विचार होता है जैसे छन सिर व्यय भाव

व्याधि करता है। या कोई

दाहिना बायाँ अंग--किसी राशि के १ से १५ अंश तक दाहिना अंग १५ से ३० अंश तक बायाँ अंग ë एवं लग्न से ६ पर कालपुरुष का दाहिना अंग है और सप्तम से ६ घर आगे पुरुष का बायाँ अंग है । द्रेष्काण के अनुसार कालांग

१- शरीर के ३ भाग करना प्रथम द्रेष्काण का उदय हो तो उससे सिर, आँख, कान, नाक, गला, ठोड़ी, मुख यहां बताये अनुसार अंग का विचार होता है।