भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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३४८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

१९ छन द्रेष्काण के विभाग में सिर स्थान में काष्ठ अग्नि व शस्त्र से चोट लगने का भय हो ।

१७-छन से प्रथम ओर नवम स्थान भो धन संज्ञक हैं । १८-यदि लान में कोई ग्रह न हो तो उसके द्रेष्काण पर से भी फल विचारना । (२) धन भाव का विचार

१-दवितीय स्थान वाक्‌ स्थान भी है वाक्‌ सम्बन्धी विचार भी इससे करना । २-छरन से प्रथम और नवम स्थान से भी धन का विचार होता है । रै-धन भाव में शुभग्रह घन प्रद है और पाप ग्रह धन नाशक है । ४-सब पाप ग्रह दूसरे घर में हों तो यह मुख होता है पर धनी भी होता है । (पर्खन भाव में लग्नेश सहित सब ग्रह बलवान्‌ हों तो शुभफल होता है । ६-धन भाव में शुभग्रह द्वितीयेश और लग्नेश से युक्त हों तो घन आदि सस्बन्वी अच्छा फल देते हैं ।

७-घन भाव में शुभग्रह हो तो मधुर भाषी प्रिय भोजन करने वाला होता है यदि पाप ग्रह हो तो कटु भाषी ओर बुरे अन्न का भोजी होता ë! ८-अनभाव में घन कारक ग्रह (बुध, चंद्र, मंगळ) व्यय स्थान में पढे तो व्यय की वृद्धि होने से घन की हानि होती है । ` *-धन भाव में शनि सुर्य मंगल हों या इनको दृष्टि हो तो घन नाश हो, यदि क्षीष चंद्र को दृष्टि हो तो विशेष कर घन क्षीण ( नाश ) हो । १०-घन भाव में मंगल चन्द्र दोनों हों तो त्वचा रोग और दरिद्रता हो । ११-वन भाव में सूर्य और बुध हों तो सेवा में तत्पर रहे । घन स्थिर न रहे । १२-राज योग होने से घन आदिका मुख होता है यंदि दरिद्र योग न हो! दरिद्र योग, रेफा योग आदि में घन सुख आदि सम्बन्धी कष्ट होता है । १३-द्ितीयेश केन्द्र में, उच्च में, मित्र गृही या अपने वर्ग में हो या हितीयेश जिस घर में हो उसका स्वामी गोपुरांश में हो तो बहुत धन होता है । š १४-द्वितीय में गुरु शुक्र हो तो बाक्पटुता आती है । चन्द्र हो तो--कुटुम्ब सौरुय, बुध हो तो घन समृद्धि प्राप्त होती है । १५-घन का विचार करने को, द्वितीय भाव से--धन का सुख । लग्नेश से सौभाग्य । चतुथं से-सुख और पैतृक घन । पंचम से-राज्य द्वारा लाभ, अकल्पित धन सट्टा लाटरी आदि द्वारा । सप्तम से-वाणिज्य द्वारा । नवम से-भाग्योदय द्वारा । दशम से-च्योपार द्वारा लाभ । एकादश से-छाभ और धन संग्रह प्रगट होता ë गुरु ग्रह सेव्य संचय । शुक्र से-सांसारिक घन विषयक सुख। इन सभी योगों की या इनमें से अधिक योगों की शुभता से धन का सुख होता है अन्यथा कष्ट होता है ।

और

१६-दूसरे भाव का विचार करने को उसका स्वामी कहाँ है यह देखो । बली ë सब वर्ग में उसकी स्थिति अच्छी है या नहों है । ग्रहों का योग दृष्टि आदि सब बातों