भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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पृष्ठ 365

फलित में ग्रहों के फल का विचार : ३४९,

का विचार कर फल कहना इसमें कारक का भी विचार करना होगा ।

दुसरा घर आँख मुख घन वाणी कुटुम्ब आदि बताता है । दूसरा घर दाहिना नेत्र है परन्तु इनका प्रथम विचार करने को इनके कारक पर विचार करना होगा । इनके कारक भी भिन्न-भिन्न हैं जैसे वाणी का कारक गुरु है । वाणी सम्बन्धी विचार करने को गुरु की स्थिति पर ओर द्वितीय भावस्थ ग्रह एवं भावेश पर विचार कर फल निर्णय करना होगा । इसी प्रकार नेत्र का कारक शानि है । कुटुम्ब का कारक शुक्र है । इनके बल आदि पर और कारक की स्थिति आदि पर भी विचार कर किसी विदोष बात के सम्बन्ध में फल का अनुमान कर सकते हो ।

१७-एकादश भाव प्रबल हो और घन भाव निर्बल हो तो घन लाभ में सुगमता तो होगी परन्तु घन का संग्रह न हो सकेगा ।

१८-लाभेश दुर्बल या निक या किसी अशुभ योग में हो तो घन प्रभाव प्रबल: शग पर भी लाभ कष्ट साध्य होता है जिसमें घन संग्रह तो होगा परन्तु अनेक कष्ट साथ ।

१९-लग्नेश, लाभेश परस्पर एक दूसरे के स्थान में होंया लाभेदा लाभमें या

घनेश, लाभेश केन्द्र या त्रिकोण में हो तो घनवान्‌ और प्रसिद्ध हो ।

२०-यह पहिले बता चुके ë कि द्वितीय भाव में मंगल अशुभ अर्थात्‌ प्रायः निष्फळ

होता है । चन्द्र भी द्वितीय माव में मंगल के साथ निष्फल होता है ।

२१-दूसरा स्थान कारक स्थान है इसका स्वामी मारकेश कहलाता है इसका

वर्णन प्रथम दिया है 1 ( घन सम्बन्धी योग प्रथम दिये हैं ) ।

(२) तृतीय भाव का फल विचार

१-तृतीय भाव-शुभग्रह युक्त या दृष्ट हो, तो सहोदर युक्त ओर पराक्रमो हो ।

२-तृतीय भाव-में शुभ राशि हो शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो तो उस भाव सम्बन्धी

सभी बातों में शुभ फल होता है ।

३-भ्रातु भाव स्थित राशि व ग्रह, भ्रातृ स्थानेश और अआतृकारक ग्रह इन चारों

में शुभ ग्रहों का योग या दृष्टि हो तो भ्राता होंगे, शुभ ग्रहों का योग दृष्टि न हो तो सहो-

दर की हानि होगी । इसमें भी इन चारों में या इनमें से एक में गुभता हो तो उस

प्रमाण से सहोदर होंगे । पाप ग्रहों के योग या दृष्टि से हानि होगी ।

४-शुभग्रह भी स्वभाव से अशुम स्थान के स्वामी हो जायें तो अशुभ फल देंगे ।

जैसे मेष लग्न से तीसरे और छठे स्थान का स्वामी बुघ है दोनों अशुभ स्थान का यहाँ

स्वामी हो जाने से बुघ अणुम हो गया या तुला लग्न हो तब तीसरे ओर छठे स्थान का

स्वामी गुरु हो जाने से दो अशुभ स्थानों का स्वामी हो गया इससे गुरु मो यहाँ अशुभ

गया ।

; ५-प्रह ३-६-८ स्थान के स्वामी होने से पाप फछ देते हैं जैसे वृश्चिक लग्न में मंगल छग्नेश और षष्ठेश भी है । वृष लस्तमें शुक्र लग्नेश भी है ओर षष्ठे भी है।'