भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 380, कुल 418 में से

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पृष्ठ 380

३६४ : ज्योतिष-शिक्षा, तुतोय फलित खण्ड

३-- तृतोय में बुघ--अथं सम्पत्ति का कर्ता, राज्य तथा सत्संग का लाभ ।

४--चतुथ्थ॑ में बुघ-सुखी, मातृ पक्ष से महालाभ, सुखी जोवन ।

w— में बुघ--बुद्धिमान्‌, चतुर, रूपवान, कामी, कुवादय वाची ।

६--षष्ठ में बुघ-कुपण, कायर, विवाद से डरने वाला, शरीर के रोंगटे खडे ।

७--सप्ठम में बुघ-स्त्रियों के वश रहें, बड़ा कृपण, घनाढ्य, दोर्घायु ।

८--अष्टम में बुध-शोत प्रकृति, राजाओं में प्रसिद्ध, शत्रु को भयदायक ।

९--नवम में बुघ-घर्म का विरोधी, अन्य. घमं में निरत, पुरुषों का विरोधी,

अहादारुण ।

१०--दशम में बुघ-राज योग वाला, अपने कुटुम् का स्वामी ।

११--छाभ में बुध-क्षण-क्षण में लाभ, ग्यारहवें वर्ष में विवाह ।

१२--व्यय में बुघ-कृपण, पुत्र को कमी, जीत नहीं होती, सदा पराजय ।

(४) चन्द्र स्थान से गुरु का फल

१--प्रथम में गुरु जीने योग्य, व्याधि रहित, बड़ा शूर, सदा घन सम्पन्न 1

२-द्वितीय में गुरु-राजा से मान प्राप्त, उग्र प्रतापी, धर्मात्मा, पाप रहित, बायु

१०० वषं ।

३--तुतीय में गुरु-स्त्रियों का प्रिय, उसके पिता के घर में १७ वर्ष में घन वृद्धि ।

४--चतुर्थ में गुरु_पुख रहित, मातृपक्ष से महाकष्ट, अन्य का भृत्य ।

५-पंचम में गुरु-दिव्य दृष्टि, तेजस्वी, पुत्रवती स्त्री, घनवान्‌, स्वयं महाउग्न ।

६-षष्ठ में गुरु-उदासीन, घर से हीन, देशान्तर में भ्रमण, अधिक खच, भिक्षुक,

व्यवस्था हीन । )

७--सप्तम में गुरु--दीघेजोवी, कम खर्च, पुष्ट देह, नपुंसक, पांडु रोगी, अनेक

चर का स्वामी ।

८-अष्टम में गुरु-रोगी, अच्छा पिता, महाक्लेश, स्वप्न में भी सुख नहीं ।

६--नवम में गुरु-घर्मात्मा, घन से पूर्ण, सुमागंगामी, गुरु और देव का भक्‍त । १०-दशम में गुरु-पुत्र हीन, तपस्वी, स्त्रो का त्याग करने वाला ।

११-लाभ में गुरु-पूत्र राजा के समान, घोड़ों पर बैठने वाला ।

१२- व्यय में गुरु-कुटुम्ब का विरोधी ।

९५) चन्द्रमा से शुक्र का फल

१-प्रथम स्थान में शुक्र-जल में डूबकर मृत्यु, सन्निपात रोग, हिंसा से मृत्यु । २-द्वितीय स्थान में शुक्र महा धनवान्‌, ज्ञानो, राजा के तुल्य । ३- तृतीय स्थात में शुक्रे-बड़ा धर्मात्मा, बुद्धिमान्‌, म्लेच्छ द्वारा घन लाम । ४ चतुय स्थान में शुक्र-कफ अधिक, अति दुबंल अग, वृद्धापन में घनहीन । ५--पंचम स्थान में शुक्र-कन्या संतान हो, घनाढय , यशहीन ।

६-षष्ठ स्थान में शुक्र--खोटे खर्च से मय करने वाळा, संग्राम में हारने वाला ।

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