सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंफलित में ग्रहों के फल का विचार : ३६३
चंद्र कुंडली का फल विचार
चन्द्र के स्थान से पृथक्-थपुक् स्थानों में ग्रह फल विचार । १--सूर्यं का फल
(चन्द्रमा से स्थान का विचार कर) ।
१-टसूर्य चन्द्र एक साथ-परदेश में रहने वाला, भोगी, कलह में मन।
२-द्वितीय में सूरय -अनेक भृत्य रखे, बड़ा यशस्वी, राजमान्य । ३--तृतीय स्थान में सूयं-सुवणं का चाहने वाला, पवित्र राजा के तुल्य, अधिक जनों का स्वामी ।
४-चतुर्थ में सूर्य॑-मातृहंता ओर उसकी भक्ति न करने वाला ।
w—q में सूर्य-कन्याओं के निमित्त दुःख पाने वाला, बहुत पुत्र ।
६--षष्ठ में सूर्य-शात्रुओं को जीतने वाला, शूरवीर, क्षत्रिय के कमं में निरत।
७--सप्तम में सूय॑-सुन्दर भार्या, सुशील आचरण, राजा से सत्कार, तपस्वी ।
८--अष्टम में सूयं-सदा बलेशकारी, अति रोगों से पीडित ।
९--नवम में सूयं-धमं करने वाला, सत्यभाषो, भाई बन्धुओं से द्वेष करने वाला ४
१०-दशम में सूर्य-द्वार पर बड़े घनवान् खड़े रहें ।
११-लाभ में सूर्य-राज गवं वाला, बहुज्ञ, सर्वत्र प्रसिद्ध, कुल का स्वामी ।
१२-च्यय में सूयं-काना हो । लग्न से १२ वें सूयं हो तो अंघा हो ।
(२) मंगल का फल
१ प्रथम स्थान में-लाळ नेत्र, रुधिर श्राव, विकार से युक्त, रक्त वर्ण 1
२--द्वितीय स्थान में भूमि स्वामी, पुत्र खेती करे ।
३--तृतीय स्थान में-चार भाई हों, बड़ा सुशील, सदा सुखी ।
४--चतुर्थ स्थान में-सुख से रहित, महा दरिद्री, उसकी स्त्री मर जाती ë 1
५--पंचम स्थान में-पुत्रहीन । स्त्री के भो ये ही योग हों तो संतान का अभाव रहे t
६--षष्ठ स्थान में-अधर्म में फंस कर मनुष्यों से शत्रुता, सदा रोगों से पीडित ।
७--सप्तम स्थान में-दुष्ट स्वभाव की स्त्री, दुर्वाक्य कहने वाली ।
८--अष्टम स्थान में-जीवों को मारने वाला, महापापी, जील और सत्य से रहित ॥
९--नवम स्थान में-घनी, वृद्धावस्था में पुत्र हो ।
१०-दशम स्थान में-द्वार पर हाथी घोड़े की भोड़ लगी रहे 1
११-लाभ स्थान में-राज द्वार में प्रसिद्ध, यश रूप से सम्पन्न 1
१२-व्यय स्थान में-माता को दुःखदायक , सदा कष्ट देने वाला ।
(३) चंद्र स्थान से बुध का फल
१--प्रथम में बुघ-सुख और रूप से हीन, दुष्टमाषी, मतिञ्चष्ट, स्थान भ्रष्ट ।
२--द्वितीय में बुघ-धनघान्य युक्त, बन्धु तथा घन की प्राप्ति, शीत के रोग से
मरण ।