भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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ग्रह, उनके नाम और गृण-धमं : २९

ग्रहों के गुण-धमं का उपयोग

ये सब नष्ट-जातक चोर-विचार आदि के काम आते हुँ । जो ग्रह अति बलवान्‌ हो उसी का सा रंग मनुष्य या वस्तु आदि का होता है इससे प्रश्न या जन्म में बतानें को

वर्ण स्वामी कहते हैं ।

प्रश्‍न या जन्म में बली ग्रह के अनुसार रूप आदि विचारना प्रश्न, यात्रा, युद्ध,

लाभ, गर्माघान, कार्यं सिद्धि, प्रवासी का आगमन निर्गमन आदि के विचारने में समय

का भी विचार होता है । जैसे लग्न में जो नवांश है उसका स्वामी उसी नवांश से जितने

नवांश पर हो उतने संज्ञक भयन आदि काल ग्रह के वश से उसी कार्य की सिद्धि अपनी

बुद्धि से विचारना । इन्हीं सब विचार से नष्ट कुडंली भो बनती है ।

संज्ञा आदि जो कही गई है फल विचारने में भी काम आती है। पुरुष ग्रह॒ पुरुष

राशि में बलवान्‌ होते हूँ । स्त्रो ग्रह स्त्री राशि में बलवान्‌ होते हैं । राशि की दिशा

देश काल आदि से प्रयोजन है कि यात्रा में दिशा जानना या उक्त ग्रह के प्रभाव से

उक्त दिशा में लाभ हानि आदि होनी या खोई हुई बस्नु की दिशा देश काल आदि लग्न

की राशि से जानना । राशियों के जल आदि होने से जल के आखेट में काम आता है ।

आठवें भाव में अग्नि राशि हो तो अग्नि का भय हो ।

कोई मूक प्रश्‍न करे कि इस वर्ष लाभ होगा या नहीं तो लाम स्थान में जो लग्न हो

उसके समान वर्ण से उसके क्रूर या सौम्य प्रकृति वाले पुरुष के द्वारा उसी राशि के

समान रंग वाली वस्तु का लाभ विचारना ।

लग्न में शुभ ग्रह हो या शुभ ग्रह का वर्ग हो या शीर्षोदय राशि हो तो कार्य सिद्ध

हो इसके विपरीत हो तो कायं सिद्ध न हो । मिश्रित हो तो कष्ट से सिद्ध हो ।

लग्न में जैसी क्रूर आदि राशि हो मनुष्य का वैसा स्वभाव होगा | मनुष्य का रंग

जानने को ग्रहों के रंग, रोगादि के लिए ग्रहों की घातु कही है ।

ग्रहों के बल अबल से आत्मा आदि के बल अबल का विचार होता है । ये राजा

आदि ग्रह वलवान्‌ हों तो जातक को अपने समान बलवान्‌ बना देते हैं परन्तु शनि का

विचार विपरीत है ।

आधान काल में जो ग्रह बलवान्‌ हो उसी सरीखी आंखें होंगी । लग्न में यदि ग्रह

नहीं है तो द्रेष्काण पर से फल का विचार करना । समय का विचार प्रश्न नष्ट कुण्डली

आदि में जानने का है। राशि के पूर्वार्ध में उत्तरायण, उत्तरां में दक्षिणायन आदि सूर्य से

व चन्द्र से मुहूतं आदि समय प्रगट होता है । ग्रह अपनो अवस्था सदृश आयु में फल देते

Ë । इसी प्रकार सब गुणों का आवश्यकता पड़ने पर विचार होता है।

ग्रहों के गुण घमं स्वभाव में स्वार्थी परोपकार को इच्छा आदि इस प्रकार के विरोधी

भाव युक्त गुणों के वर्णन हों वहाँ ग्रह के उच्च नोच या शुभाशुभ स्थिति पर अवलंबित

है। शुभ ग्रहों को नोच स्थिति का अशुभ फल मिळता है । उसी तरह अशुभ ग्रह की

उच्च स्थिति आदि का शुभ, नीच स्थिति क' अशुभ फल मिलता हू 1