सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
मूक प्रश्न में राशि या ग्रहों के धातु मूल जीव आदि संज्ञा दी है उस का अर्थ है कि
किसी घातु सम्बन्धो या मूल जड़ आदि पदार्थ सम्बन्धी या किसी जीव के सम्बन्ध में
प्रश्न पूछना चाहता है ।
इसी प्रकार वहाँ दिये गुण-घर्म का उपयोग फ़ल विचारने में बहुत काम देता है ।
2.4 यह काल पुरुष को आत्मा है । रंग ललाई लिए गोरा है । यह पितृ कारक है पिता
सम्बन्धी बातें इससे विचारते ë 1 यह शुष्क ग्रह हे । आत्मा, स्वभाव, आरोग्यता, राज्य
देवालय का सूचक है ।
नेत्र यकृत मेरुदंड स्नायु आदि पर इसका प्रभाव होता है । यह ददाम स्थान में
बलवान् होता है । मकर से ६ राशि तक इसे चेष्टाबल प्राप्त होता है । यह राजा है
जन्म में बलवान् हो और उपचय में हो तो महत्वपूर्ण पद राजा के समान देता है उपचय में न हो और निर्बल हो तो हानि भी करता ë 1
सूर्यं जन्म में या लग्न के नवांश का स्वामी हो और सब ग्रहों में बली हो तो जातक
का स्वरूप वर्ण और अन्य वाते सूर्य की संज्ञा के अनुसार होती ë ।
सूर्य की जाति याने पेशा क्षत्रिय, सतगुणी, पुरुष और पापग्रह सदा क्रूर पूवंदिशा
का स्वामी है, इस का देव अग्नि है, लाल वस्तु का स्वामी है, हड्डी बहुत, वस्त्र मोटा,
घातु तांबा, रस तीखा, देव स्थान, केश थोड़ा, पित्त प्रकृति, वर्ण छाल जिसमें कुछ काला
मिला हुआ अर्थात् सांवला है, आँख पीली, थोड़ा काला, स्वच्छ शरीर, नसें उठी हुई,
सामान्य मूति अर्थात् न विशेष ऊँचा न ठिंगना, चालाक, चौड़े कंधे, शुरवीर, स्वतः पर
भरोसा करने वाला आदरणीय, . बात रोग से पीडित, बुद्धिमान्, जिद्दी, राजसी, मन से
अलग गति वाला देह आत्मा है, स्पष्ट वक्ता, गंभीर हृदय, वैद्य विद्या की रुचि, गंभीर
चेहरा, लोगों पर प्रभाव डालने वाला, यशस्वी, समाज के अनुकूल, स्वार्थ को अपेक्षा
परोपकार बुद्धि की प्रबलता, शत्रु और विरोधी को अपने बुद्धि बल से परास्त करने
बाला, द्रठप तृष्णा अल्प, उदार विचार, कठोर वचन परन्तु परिणाम में हितकर, स्त्रार्थ
त्यागी, सर्वज्ञ, स्थिर स्वभाव, काल्पनिक, दूरदर्शी, स्पष्ट व्यौहार, कठोर किन्तु सत्यभाषी, वर्ताव शुद्ध अनुकरणीय, सुधार प्रिय ।
यह मनुष्य की आत्मा है बलवान् हो और राज्य कारक हो राज्यपद अधिकार,
मान देता है, घन्चे में जय देता है । यह १-४-५-९ राशियों में विशेष बली होता है ।
लग्न या दशम में इसका विशेष महत्त्व हे । इससे कुछ कम महत्त्व नवम पञ्चम में है ।
२, ४, ६, ८, १२ स्थान में राशि बली हो तब मी निरर्थक है ।
यह घन स्थान में कर्जा ही बढ़ाता है कुटुम्ब सुख नहों देता, व्यय स्थानमें घनका
बहुत व्यापार में खर्च कराता है, चतुर्थ में चिन्ता उत्पन्न कराता है । षष्ठ में शत्रु से
पीडा उत्पन्न कराता है, अष्टम में शरीर कष्ट देता है जिससे घन नाश होता है । शनि
के प्रभाव से यह बिगड़ता दै 1 शनि का योग होने से घंधे का नाश होता है, राज्य