भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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ग्रह, उनके नाम और गुण-धमं : ३९

स्वामी है, देव. ब्रह्म, पश्चिम दिशा का स्वामी है, तमोगुणी हुँ, वायु के अधीन है ।

आलसी, काना, पिंगलनेत्र, ऊँचा, बड़े दाँत, कड़े बाल, वातप्रकृत्ति, शरीर पर शिरा,

लंगड़ा, निम्न लोचन, दुबळा, अति पिशुन, शरीर में मांस पेशियों पर इसका प्रभाव

ë । क्रूर, दया रहित, मुखं, स्थूल नख, तामसी, बहुत क्रोधी, वृद्धावस्था को प्राप्त,

कृष्ण वस्त्रघारो, दीर्घ जीवन दाता, बरबाद घर, उपजीविका कृषि, धूतं, दुष्ट बुद्धि,

दुबंछ-मन, मंद बुद्धि, मनमाना कारवार, आत्म प्रशंसा और प्रतिष्ठा प्रिय, उद्योग

रहित, नीच काम, - विश्वास घात में आनन्द. मानने वाला, कलह प्रिय, बन्धु विरोधी

विरोधात्मक आंदोलन का कर्ता, मर्म भेदी बात करने वाला, असन्तुष्ट, उद्योग में अप￾यश, उद्योग शत्रु, व्यसनी, दुराचरणी समाज के हित के काम में, बाघा डालने वाला,

Saa परदोष देखने में निपुण अविचारी, पर द्रव्य हरण में प्रवीण, द्रव्य तृष्णा

अघिक ।

यह सप्तम स्थान में बली है । यह नपुंसक ग्रह है । वक्री तथा चंद्र के साथ

होने से चेष्टावलो होता है । लग्न ' में जिस ग्रहके' त्रिशांश में हो उसी सरीखा

गुण हो ।

इस का स्वभाव परपोड़ा, घात, क्रूरता, निलंज्जपना, चोरी, ठगी, मिथ्या भाषण,

मायावो, अमंगळ, दंभ, मत्सर आदि है । वात प्रधान रोग उत्पन्न करता हैं । दरिद्रपन

और आयु नाशक भी है।

मिथुन, तुला, कुम्भ राशि में इसका विशेष महत्व हैँ । यदि शनि बलवान्‌ होतो

उसके समान दाता कोई नहीं है, अगणित सम्पत्ति देता है। १-४-५-८-९ रादि में

अनिष्ट फल देता है । यह जिस राशि में हो उसके आगे पीछे की राशि को पीड़ा देता

है । यह विशेष कर चंद्र को पीड़ा करता हृ । इसे साढ़ेसाती कहते हैं । चंद्र की साढ़े-

साती का परिणाम शरीर और कुटुम्बी मनुष्यों पर पड़ता है । किन्तु रवि की साढे-

साती का परिणाम पिता, स्वघंघा व राजकीय कार्य में पड़ता है । जन्म काल में

यदि एक राशि पर चंद्र हो उससे आगे शनिहोव उसके आगे राशि पर सूयं हो

तो जन्म काल में दोनों की साढ़ेसाती समझना यह बहुत बुरा होता है । १, ४, ५,

८, ९ राशि पर सूर्य और चंद्र एकत्र रहे तव साढ़ेसाती का परिणाम विशेष रूप

से होता है । :

शनि, सूर्य व मंगल का योग सदा घातक होता है । इस प्रमाण से चंद्र शनि का

परिणाम कुछ कम घातक होता है । इसमें मृत्यु, अपघात, भयंकर रोग, बन्धन (कैद),

भारी संकट, या विपत्ति और आयु के अंत का समय दुःखमय होता है । शनि रोहिणी

नक्षत्र का भेदन करे अर्थात्‌ वहाँ पहुँच जाये, (रोहिणी का आकार गाड़ी सदृश है)

इसे शकट भेदन कहते हैं यह लोकसंहार कारक होता है ।

यह पुत्र चिन्ता उत्पन्न करता है। समय से बहुत बिलम्ब से प्रसूत होना भी शनि

का घर्म है। १-५-० स्थान में शनि इस प्रकार प्रभाव करता है । शनि-प्रधान मनुष्य

अवस्य दुगुंगी होता हैं ।