सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 71, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंमेत्रो, दृष्टि आदि : ५५
तात्कालिक मंत्री
मित्र-णजहां प्रह कुडलो में हैं उपसे २,३,४, ओर १०,११,१२ वां स्यान । अर्थात् ग्रह के आगे या पीछे ३-३ स्थान मित्र ।
शत्र, --शेष अर्थात् १,५,३,७,८,९ वां स्थान । अर्थात् ग्रह के साथ जो ग्रह हों और उपरोक्त स्थान छोड़कर इतर स्थानों में जो ग्रह हों वे शत्र हैं ।
पंचधा मेत्री
अधिमित्र--मित्र + मित्र | अर्थात् दोनों में मित्र हों तो अधिमित्र,दोनों अघिजत्रु- शत्रु + शत्रु में शत्रु हों तो अधिशत्रु, एक में मित्र मित्र--सम + मित्र दूसरे में शत्रु हो तो सम, एक में सम शत्रु--सम + शत्रु दूसरे मे मित्र हो तो मित्र यदि एक में सम--शत्रु + मित्र सम दूसरे में शत्रु हो तो पंचघा मैत्री में या मित्र + शत्रु "| वह शत्रु लिखा जायगा ।
नैसगिक और तात्कालिक मैत्री का मिश्रण पंचधा मैत्रो होती ë 1
तात्कालिक मैत्री पर विचार
जैसे कोई किसी का मित्र रहने पर भी तात्कालिक कारण वश ऊभी विरोध या समता भाव दिखाता है । इसी प्रकार शत्रू रहने पर भी तात्कालिक कार्य वश मित्र भाव दिखाता है यह तात्कालिक मैत्री है ।परन्तु नैसगिक और तात्कालिक मिल कर पंचधा मैत्री बनती हे । तात्कालिक मैत्री सामयिक है नैसगिक मैत्री स्थाई है । तात्कालिक को अपेक्षा नैसगिक मैत्री का अधिक प्रभाव है ।
मैत्री में अधिमित्र उत्तम मित्र है अच्छा फल देता ë । अधिश्त्र कार्य नाश करता है। नैसगिक शत्रु सदा नाशक्रारी है । तात्कालिक शत्रु समय अनुसार नाश करता š! पंचधा शत्रु बुरा फल देकर हानि करता है ।
नेसगिक मेत्री पर विचार
एक ग्रह की किरणों से दू सरे ग्रह की किरणों को कमीर सहायता पहुंचती है कभी
कभी विरोध प्रगट होता हे । कभी कभी न विरोध और न सहायता प्रगट होतो है अर्थात्
सम भाव प्रगट होता है न मित्र है और न शत्रु ।
सत्याचार्य के मत में मूल त्रिकोण से २-१२, ५-९, ४-८ भाव के स्वामियों को
बल मिलता है अर्थात् उस स्थान के स्वामियों की किरणों से उस मूल त्रिकोण वाले ग्रह
की किरणों को सहायता मिलती ë ।
उक्त बल पाने वाले ग्रह को यदि २ बार सहायता मिल जाती हैँ तो वह उस
मू छ त्रिकोण बाले ग्रह का स्वाभाविक मित्र हो जाता है । एके बार सहायता मिलने