सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 74, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ें५८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड
- पाचक फा स्वाभाविक गुण--भाग्योदय करता है, राज पूज्यत्व, विद्या आनन्द सहित,
सभा में प्रवेश करना । परन्तु मित्र होने से उक्त फल देता है । शत्रु होने से
. इसके विपरीत फल करता है । बली हो तो विपरीत तो नहीं करता परन्तु
उक्त फलं कम करता है।
(२) बोघक सिन्न--दया तप से प्राप्त अविचारित भाग्प करता š । मित्र होने से
उपरोक्त फल, पूर्ण शत्रु होने से विपरीत फल करता हूँ ।
( ३ ) कारक सित्र--क्रभी भाग्य वृद्धि, कभी भाग्य हानि, कभी स्त्री घन पुत्रों को रोग
- पीड़ा, चोर भय, अग्नि पीड़ा, लोगों में कलह ।
शत्रु-विपरीत फल औरों की तरह नहीं करता विशेषतः चोर भय, अग्नि भय,
बन्धु भय, राजाओं से अति दुःख और पद की च्युति करता ë ।
( ४ ) बोधक सित्र--विदेश गमन, घन नाश करता है ।
शान्रु—उपरोक्त फल अन्यथा करता है ।
पाकेदा मैत्री
फल देने वाला ग्रह पाकेश से ६-८-१२ स्थान में शत्रु । सप्तम में अशुभ होता है ।
१, २, ३, ४, ५, ओर ९-१०-११ स्थानों में मित्र होता हं ।
दृष्टि विचार
सूर्य चंद्र बुघ शुक्र की जो साघारण दृष्टि होती है उसके अतिरिक्त शनि गुरु मंगल
की विशेष दृष्टि होती है ।
. साघारण दृष्टि विशेष दृष्टि ग्रह १ चरण दृष्टि (पाव) ३-१० | पूर्ण दृष्टि सूर्य चन्द्र बुघ शुक्र | २ चरण दृष्टि (अद्ध) | - ५-९ | शनि ३-१०-७ ३ चरण दृष्टि (पौन) ४-८ | मंगल ४-८-७ ४ चरण दृष्टि (पूर्ण) ७ | गुरु ५-९-७
अर्थात् ग्रह अपने स्थान से गिनने पर ३-१० स्थान पर एक पाद दृष्टि से देखता
है । सप्तम स्थान को पूर्ण दृष्टि से देखता ६ इत्यादि ।
१, २, ६, ११, ओर १२ वें स्थान पर ग्रहों की दृष्टि नहीं होती है। एक चरण दृष्टि का ५ विश्वा बल होता है, पूर्ण दृष्टिम २० विश्वा बल होता है । पूर्ण दृष्टि ६०” कला की मानी जाती है ।
MR नतान्तर FE SHR UN I PIS Me: ग्रह पाद दृष्टि | अद्ध दृष्टि | पोन दृष्टि | पुर्ण दृष्टि | यह मत सूयं चन्द्र बुघ ३-१० ५-९ ४-८ ७ जातकाभरण दानि ५-९ ४-८ ७ ३-१० | मान सागरी मंगल ७ ३-१० ५-९ ४-८ आदि का है — गुरु i Luya ४-८ a s SOS ७ CS पु...