भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

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सहमेश का बल विचार : २२३

जो सहम वपं लग्न से या अपने स्थान से अष्टमेश से युक्त वा दृष्ट हो और याप ग्रह से युक्त वा दृष्ट हो या पूर्वोक्त अष्टमेश से वा पाप ग्रह से सहमेश इत्यद्षाली' हो तो पूर्वोक्त शुभ फल प्रद लक्षण युक्त भी हो तो भी निवळ समझा जायगा । फल -देने की सामर्थ उसमें नहीं होती । जन्म में प्रथम इसी बल को देख लेना ।

जन्म में सहमों का वलाबल विचार कर वर्ष में भी वल देखना जिसका बल 'अंधिक हो फल देने में समर्थ हो उन्हें ही वर्ष में स्थापना करना । जो फल देने में “समर्थ न हो उसे छोड़ देना ।

सहम फल विचार

(१) पुण्य सहम--पुण्य सहम वलवान हो शुभ ग्रह व स्वस्वामी से युक्त दृष्ट 'हो तो धर्म प्राप्ति और धन का लाभ होता है। इसके विपरीत हो अर्थात्‌ बल रहित हो और पाप युक्त दृष्ट हो तो विपरीत फल हो अर्थात्‌ धन और धमं की हानि होगी ।

पुण्य सहम वर्ष लग्न से ६-८-१२ स्थानों में हो तो धमं भाग्य और यश का “हरण हो । और शुभ ग्रह स्वस्वामी से युक्त दृष्ट हो तो वर्ष के अन्त में सुख धर्म आदि संभव होता है. |

जो पाप आदि युक्त दृष्ट से अशुभ फळ कहा है वह वर्ष के पूर्वाद्ध में होता है । :स्वस्वामी का शुभ युक्त दुष्ट सहम वर्ष के उत्तराद्धं में अर्थात्‌ प्रवेश से ६ मास पश्चात्‌ सोख्य आदि फल देता है । पुण्य आदि सहम पाप युक्त और . शुभ दृष्ट हो तो वर्ष के पूर्वाद्धं में अशुभ उत्तराद्धं में शुभ फल देते हैं। जो शुभ युक्त और पाप दृष्ट हो तो पूर्वाद्धं में शुभ फल उत्तराद्धे में अशुभ फल देते हँ । जो पाप युक्‍त और पाप दृष्ट भी हों तो पूरे वर्ष अशुभ फल होता है । जो शुभ युक्‍त और शुभ दृष्ट भी

'हो तो पूरे वर्ष शुभ ही फल होगा । कर Tn

जिस वर्ष में पुण्य सहम पूर्वोक्त विधि से शुभ हो तो वह समस्त ही शुभ होता “है और सहम अनिष्ट भी हो तो अनिष्ट फल सहसा नहीं दे सकते । जिसमें पुण्य

सहम अशुभ है वह वर्ष अशुभ ही व्यतीत होता है। और सहम शुभ भी हों तो शुभ

"फल नहीं देते । इस कारण जन्म और वर्ष में पुण्य सहम का अवश्य विचार करना ।

जन्म में पुण्य सहम लग्न से ६-८-१२ वाँ हो और वर्ष में पाप युक्त हो और

'सहमेश अस्तगत हो तो धन-धर्म और सुख का नाश करता है।

उक्त प्रकार से सम्पूर्णं सहम जन्म और वर्षे में विचारना चाहिए ।

रोग, शत्रु, काल, मृत्यु सहम पुण्य सहम बलवान होने से धन आदि का लाभ

होता है, परन्तु, रोग, शत्रु, कलि और मृत्यु सहमों का फल विपरीत होता है। ये

अनिष्ट सहम हैं। इनके बलवान होने से अनिष्ट फल अधिक होता है। ये सहम

'निर्बेल हों तो अनिष्ट फल कम होगा तब वर्ष आदि में शुभ फल हो।

कार्यं सिद्धि सहम--शुभ ग्रहों से युक्त दृष्ट हो या शुभ ग्रह से मुन्थशिळकारी

हो तो संग्राम में जय हो शुभ युत दृष्ट और शुभ मुंथशिली भी हो तो विशेषकर जय