सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 237, कुल 280 में से
संदर्भ में पढ़ेंवर्ष में अरिष्ट विचार : २२९:
महारोग आदि का भय होवे। ऐसे ही अष्टम लग्न पर पाप ग्रह का योग या दृष्टि
हो तो मृत्यु होव । डा
(१२) व्यथा मृत्यु--जन्म में जो ग्रह अष्टम है वही वर्ष में लग्न का हो तो रोग
और मानसी व्यथा हो । यदि चन्द्र और लग्नेश दोनों नष्ट बल हों तो मृत्यु हो ।
(१३) व्यथा मृत्यु--जन्म लग्नेश और वपं लग्नेश भी पाप युक्त होकर अष्टम
स्थान में हो तो रोग और मानसी व्यथा हो और अस्तंगत तथा शुभ दृष्टि रहित भी
हो तो मृत्यु हो ।
(१४) मृत्यु कष्ट--लग्नेश वर्षेश और मुन्था तीनों ४, ६, ८, १२ स्थानों में से
कहीं साथ हो तो मृत्यु तुल्य कष्ट हो यदि इन पर पाप ग्रहों की भुत दृष्टि भी हो
तो अवश्य मृत्यु हो ।
(१५) धन नाश विकलता--शनि के साथ चन्द्र बारहवाँ हो और शुक्र छटा हो
'तो घन नाश हो और शनि शुक्र के साथ किसी पाप ग्रह का ईशराफ योग हो तो
चित्त विकल रहे । इन पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो धननाश और विकलता दोनों
फल हों ।
(१६) त्रिदोप रोग, निरोग--चन्द्रमा अस्तंगत होकर ४, ६, ७, १२ स्थान में
हो तो त्रिदोष विकार से सन्निपात आदि रोग होवें । जो इस पर शनि की दृष्टि हो
तो वह निरोग हो जायगा ।
(१७) मरण सुख--पाप ग्रह से युक्त वर्ष लग्न का हुद्देश और वर्ष लग्नेश ये
यदि ७, ८, १२ घर में हों तो अपनी दशा में मृत्यु देते हँ । इन पर शुभ ग्रह की
दृष्टि हो तो रोग भोग कर परिणाम में सुख होता है ।
(१८) रोग वन्धन--वर्ष लग्न से मार्गी ग्रह बारहवाँ हो ओर वक्री ग्रह द्वितीय
स्थान में हो तो इस कर्तरी नामक योग से रोग होता है।
ऐसे ही जन्म लग्नेश या वर्ष लग्नेश या वर्षेश से कर्तेरी योग हो तो बन्धन हो ।
सप्तम स्थान पर भी कर्तरी योग होने से रोग व दुष्ट उपद्रवों से बन्धन होता है ।
(१९) कार्य नाश--लग्न का त्रिराशि पति नीच राशि में पाप दुष्ट हो तो
इच्छित कार्य का नाश होता है।
(२०) रोग विपत्ति--मुन्थेश तथा वर्षेश छठवाँ या अष्टम हो अस्तंगत हो तो
रोगों से विपत्ति होवे।
(२१) मृत्यु जय-चन्द्रमा वर्ष लग्न से १, ७, ६, ८, १२ वें स्थान में पाप दुष्ट
हो और शुभ दुप्ट न हो तो अरिष्ट या मृत्यु हो । दृष्टि वश से यह फल होगा--
उक्त चन्द्र पर मंगल की दुष्टि--अग्नि या शस्त्र भय। शनि, राहु, केतु से दृष्ट
झो तो शत्रु भय, वात रोग । सूर्य से दृष्ट--दरिद्रता । यदि शुभ ग्रह की विशेष कर
शुरु की दृष्टि भी हो तो उक्त पीड़ा दूर होकर कल्याण देता है ।
(२२) मनोदुःख, मरण--मुन्था पाप ग्रह युक्त हो उस पर शनि की दृष्टि होकर
४, ६, ८, १२ स्थान में हो तो मानसी व्यथा तथा शरीर में रोग हो यही मुन्था जन्म