भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

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पृष्ठ 236

:९२६८::-सचित्रे ज्योतिषः दिक्षा, चतुथं वर्षफल खण्ड

(३) बुध गुरु अस्तंगत हों तो उपरोक्त तीनों फल हों । ये फल निवंलता के

क्रम से हैं. जैसे प्रथम साधारण बलं में शस्त्राघात, हीन बल में विपत्ति और अति

हीन बल में मृत्यु । ? ;

(२) मृत्यु--वर्ष लग्नेश और अष्टमेश ये दोनों ४, 5, १२ स्थान में हों और:

मुन्था युक्त हों तो अपने धातु के कोप से मृत्यु करते हैं ।

(३) छुष्ठ खोज आदि या मृत्यु--जन्म लग्नेश जन्म तथा वर्ष में निवंछ हो और

वर्षे में अष्टमेदा सप्तम स्थान में हो सूर्य से दृष्ट हो तो मृत्यु व कुष्ठ, खुजली रोग

और आपत्ति देता है ।

मतान्तर-वर्ष में लग्नेश निर्वल हो अष्टमेश लग्न में हो ओर सूर्यं से दृष्ट हो

तो उपरोक्त फल होता है ।

(४) विपत्ति या मृत्यु--वर्षेश के साथ क्रूर ग्रह का मूसरीफ हो और जन्म

लग्नेश क्रूर ग्रह हो (क्षीण चन्द्र को व पाप युक्त बुध को भी क्रूर गिनना) और

चन्द्रमा आदि शुभ ग्रह कम्बूल योग भी करे तो विपत्ति या मृत्यू होवे ।

ऐसे ही जन्म लग्नेश वर्ष लग्नेश मुन्थेश आदि पंचाधिकारियों से भी यही योग

होता है जैसे वर्षेश के अनुसार. मुन्येश आदि क्रूर मूशरफी और सभी शुभ ग्रहों काः

कंबूल योग' होने पर विचारना ।

  • ग) मुत्यु तुल्य कष्ट सवना मानसिक चिता--मुन्येश और लग्नेश अस्तंगतः

हो इन पर शनि की दृष्टि हो तो स्त्री पुत्रादि सवेनाश या मृत्यु तुल्य कष्ट मानसिक

चिता और शरीर पीड़ा आदि से भय होवे ।

मतान्तर--मुन्थेश या वर्षे लग्नेदा अस्त हो शनि से कुत दृष्टि से दृष्ट हो तो

उपरोक्त फल हो । ल

(६) व्यथा, रोग कलह धन हानि-क्रूर ग्रह बलवान होकर ३-६-१ १ स्थानों

में हों और शुभ ग्रह निर्बल होकर ६-५-१२ स्थानों में हों तो मानसिक व्यथा रोंग

भय कलह धन हानि और विपत्ति होवे ।

मतान्तर- क्रूर ग्रह अधिक वळी और शुम ग्रह वलहीन होकर ६-३-१२ भाव

में हों तो उपरोक्त फळ हो ।

(७) सुख नहीं--शुक्र नीच में हो और गुरु शत्रु के नवांश में हो तो उस वर्ष में

बिलकुल सुख न मिले । न ।

(=) मृत्यु- वर्ष लग्नेश अष्टम हो. अष्टमेश लग्न में हो तो मृत्यु हो।

मतान्तर--वर्ष लग्नेश अंष्टंम हो या अष्टम लग्न में हो तों उपरोक्त फल हो ।

(९) धन नष्ट—वर्ष में ९ और २ भाव का स्वामी निर्वेल हो और पाप ग्रह

लग्न में हो तो बहुत दिनों का संचित धन नष्ट हो जावे ।

(१०) वियोग, व्यथा, रोग, मृत्यु--चन्द्र नीच का हो और शुभ ग्रह अस्तंगत हों

स्वजनों से वियोग शरीर पीड़ा वा मृत्यु या मानसी व्यथा व रोग का भय शीघ्र हो ।

(११) कष्ट महारोग--जन्म लग्न या जन्म राशि से वर्ष लग्न अष्टम हो तोः

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