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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

:९२६८::-सचित्रे ज्योतिषः दिक्षा, चतुथं वर्षफल खण्ड

(३) बुध गुरु अस्तंगत हों तो उपरोक्त तीनों फल हों । ये फल निवंलता के

क्रम से हैं. जैसे प्रथम साधारण बलं में शस्त्राघात, हीन बल में विपत्ति और अति

हीन बल में मृत्यु । ? ;

(२) मृत्यु--वर्ष लग्नेश और अष्टमेश ये दोनों ४, 5, १२ स्थान में हों और:

मुन्था युक्त हों तो अपने धातु के कोप से मृत्यु करते हैं ।

(३) छुष्ठ खोज आदि या मृत्यु--जन्म लग्नेश जन्म तथा वर्ष में निवंछ हो और

वर्षे में अष्टमेदा सप्तम स्थान में हो सूर्य से दृष्ट हो तो मृत्यु व कुष्ठ, खुजली रोग

और आपत्ति देता है ।

मतान्तर-वर्ष में लग्नेश निर्वल हो अष्टमेश लग्न में हो ओर सूर्यं से दृष्ट हो

तो उपरोक्त फल होता है ।

(४) विपत्ति या मृत्यु--वर्षेश के साथ क्रूर ग्रह का मूसरीफ हो और जन्म

लग्नेश क्रूर ग्रह हो (क्षीण चन्द्र को व पाप युक्त बुध को भी क्रूर गिनना) और

चन्द्रमा आदि शुभ ग्रह कम्बूल योग भी करे तो विपत्ति या मृत्यू होवे ।

ऐसे ही जन्म लग्नेश वर्ष लग्नेश मुन्थेश आदि पंचाधिकारियों से भी यही योग

होता है जैसे वर्षेश के अनुसार. मुन्येश आदि क्रूर मूशरफी और सभी शुभ ग्रहों काः

कंबूल योग' होने पर विचारना ।

  • ग) मुत्यु तुल्य कष्ट सवना मानसिक चिता--मुन्येश और लग्नेश अस्तंगतः

हो इन पर शनि की दृष्टि हो तो स्त्री पुत्रादि सवेनाश या मृत्यु तुल्य कष्ट मानसिक

चिता और शरीर पीड़ा आदि से भय होवे ।

मतान्तर--मुन्थेश या वर्षे लग्नेदा अस्त हो शनि से कुत दृष्टि से दृष्ट हो तो

उपरोक्त फल हो । ल

(६) व्यथा, रोग कलह धन हानि-क्रूर ग्रह बलवान होकर ३-६-१ १ स्थानों

में हों और शुभ ग्रह निर्बल होकर ६-५-१२ स्थानों में हों तो मानसिक व्यथा रोंग

भय कलह धन हानि और विपत्ति होवे ।

मतान्तर- क्रूर ग्रह अधिक वळी और शुम ग्रह वलहीन होकर ६-३-१२ भाव

में हों तो उपरोक्त फळ हो ।

(७) सुख नहीं--शुक्र नीच में हो और गुरु शत्रु के नवांश में हो तो उस वर्ष में

बिलकुल सुख न मिले । न ।

(=) मृत्यु- वर्ष लग्नेश अष्टम हो. अष्टमेश लग्न में हो तो मृत्यु हो।

मतान्तर--वर्ष लग्नेश अंष्टंम हो या अष्टम लग्न में हो तों उपरोक्त फल हो ।

(९) धन नष्ट—वर्ष में ९ और २ भाव का स्वामी निर्वेल हो और पाप ग्रह

लग्न में हो तो बहुत दिनों का संचित धन नष्ट हो जावे ।

(१०) वियोग, व्यथा, रोग, मृत्यु--चन्द्र नीच का हो और शुभ ग्रह अस्तंगत हों

स्वजनों से वियोग शरीर पीड़ा वा मृत्यु या मानसी व्यथा व रोग का भय शीघ्र हो ।

(११) कष्ट महारोग--जन्म लग्न या जन्म राशि से वर्ष लग्न अष्टम हो तोः

SR

वर्ष में अरिष्ट विचार : २२९:

महारोग आदि का भय होवे। ऐसे ही अष्टम लग्न पर पाप ग्रह का योग या दृष्टि

हो तो मृत्यु होव । डा

(१२) व्यथा मृत्यु--जन्म में जो ग्रह अष्टम है वही वर्ष में लग्न का हो तो रोग

और मानसी व्यथा हो । यदि चन्द्र और लग्नेश दोनों नष्ट बल हों तो मृत्यु हो ।

(१३) व्यथा मृत्यु--जन्म लग्नेश और वपं लग्नेश भी पाप युक्त होकर अष्टम

स्थान में हो तो रोग और मानसी व्यथा हो और अस्तंगत तथा शुभ दृष्टि रहित भी

हो तो मृत्यु हो ।

(१४) मृत्यु कष्ट--लग्नेश वर्षेश और मुन्था तीनों ४, ६, ८, १२ स्थानों में से

कहीं साथ हो तो मृत्यु तुल्य कष्ट हो यदि इन पर पाप ग्रहों की भुत दृष्टि भी हो

तो अवश्य मृत्यु हो ।

(१५) धन नाश विकलता--शनि के साथ चन्द्र बारहवाँ हो और शुक्र छटा हो

'तो घन नाश हो और शनि शुक्र के साथ किसी पाप ग्रह का ईशराफ योग हो तो

चित्त विकल रहे । इन पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो धननाश और विकलता दोनों

फल हों ।

(१६) त्रिदोप रोग, निरोग--चन्द्रमा अस्तंगत होकर ४, ६, ७, १२ स्थान में

हो तो त्रिदोष विकार से सन्निपात आदि रोग होवें । जो इस पर शनि की दृष्टि हो

तो वह निरोग हो जायगा ।

(१७) मरण सुख--पाप ग्रह से युक्त वर्ष लग्न का हुद्देश और वर्ष लग्नेश ये

यदि ७, ८, १२ घर में हों तो अपनी दशा में मृत्यु देते हँ । इन पर शुभ ग्रह की

दृष्टि हो तो रोग भोग कर परिणाम में सुख होता है ।

(१८) रोग वन्धन--वर्ष लग्न से मार्गी ग्रह बारहवाँ हो ओर वक्री ग्रह द्वितीय

स्थान में हो तो इस कर्तरी नामक योग से रोग होता है।

ऐसे ही जन्म लग्नेश या वर्ष लग्नेश या वर्षेश से कर्तेरी योग हो तो बन्धन हो ।

सप्तम स्थान पर भी कर्तरी योग होने से रोग व दुष्ट उपद्रवों से बन्धन होता है ।

(१९) कार्य नाश--लग्न का त्रिराशि पति नीच राशि में पाप दुष्ट हो तो

इच्छित कार्य का नाश होता है।

(२०) रोग विपत्ति--मुन्थेश तथा वर्षेश छठवाँ या अष्टम हो अस्तंगत हो तो

रोगों से विपत्ति होवे।

(२१) मृत्यु जय-चन्द्रमा वर्ष लग्न से १, ७, ६, ८, १२ वें स्थान में पाप दुष्ट

हो और शुभ दुप्ट न हो तो अरिष्ट या मृत्यु हो । दृष्टि वश से यह फल होगा--

उक्त चन्द्र पर मंगल की दुष्टि--अग्नि या शस्त्र भय। शनि, राहु, केतु से दृष्ट

झो तो शत्रु भय, वात रोग । सूर्य से दृष्ट--दरिद्रता । यदि शुभ ग्रह की विशेष कर

शुरु की दृष्टि भी हो तो उक्त पीड़ा दूर होकर कल्याण देता है ।

(२२) मनोदुःख, मरण--मुन्था पाप ग्रह युक्त हो उस पर शनि की दृष्टि होकर

४, ६, ८, १२ स्थान में हो तो मानसी व्यथा तथा शरीर में रोग हो यही मुन्था जन्म

२२० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा; चतुर्थ वर्षफल खण्ड

लर्न से ४, ७, ६, ८, १२ स्थान में हो तथा वर्ष में अष्टम हो या पाप ग्रह से युक्तः

या दुष्ट भी हो तो मृत्यु हो । र

-(२३) त्रिदोंष--चन्द्रमा सूयं के साथ ६-८-१२ भाव में होतो त्रिदोष से अरिष्ट हो ।

(२४) अरिष्ट--बुध ककं में या लग्न से छठे आठवें या चौथे चन्द्रमा से युक्‍त

हो तो आरम्भ से अरिष्ट करता है । ;

(२५) अरिष्ट--लग्नेश और मुन्थेश अष्टम में हो तो अरिष्ट होता है ।

लग्नेश व मुन्येश चन्द्र व लग्न से अष्टम स्थान का स्वामी हो यदि वह

६-८-१२ में हो तो अरिष्ट हो। -

(२६) शस्त्र पीड़ा-छग्नेश ८ स्थान में हो और मंगल से दृष्ट हो और उसके

भाव में स्थित या अस्तंगत बुध व शुक्र हो तो अनेक आपत्ति या शस्त्र से पीड़ा हो ।

कष्ट हों ।

(२५) मृत्यु तुल्य कष्ट-जन्म लग्न से वषं लग्न अष्टम हो और पापयुक्त या' दृष्ट हो तो उस वर्ष में मृत्यु तुल्य कष्ट हो ।

(२९) भय कष्ट-वर्षेद ६-८ स्थान में हो तो महाभय और कष्ट हो ।

(३०) अरिष्ट-पाप ग्रह २-६-८-१२ घर में हो तो अरिष्ट हो । ;

` (३१) युद्ध में अरिष्ट--लग्नेश ६-१२ में हो और चन्द्र सप्तम हो तो युद्ध में

अरिष्ट हो । :

(३२) अकस्मात्‌ कष्ट--मुन्थेश अस्त हो और शत्रुक्षेत्री हो तो अकस्मातुः कष्ट हो ।

(३३) वियोग, कष्ट--चन्द्र नीच का हो बुध शुक्र अस्त हो तो वियोग, कष्ट,-

शरीर में महापीड़ा हो ।

(३४) रोग, शत्रुता--क्रूर ग्रह वक्री हो, अस्त हो या क्रूर ग्रह के वर्ग में लग्नेशः

हो तो रोग हो और शत्रुता हो। अरिष्ट भंग योग 2 (१) अरिष्ट नाश, सुख, धन-वर्ष लग्नेश बलबान हो शुभ ग्रह से युक्त दृष्ट हों तथा केन्द्र और कोण में हो तो अरिष्ट नाश कर सुख और धन देता है।

(२) अरिष्ट, नाश सुख--गुरु केन्द्र या त्रिकोण में शुभ ग्रह से दृष्ट हो पाप ग्रह

की दृष्टि इस पर न हो तो लग्न, चन्द्रमा और मुन्था जन्य अरिष्ट का नाश कर सुख,

देता है। _

` (३) सुख यक्ष धन--चतुथं भाव चतुर्थश्च से युक्त हो और शुभ ग्रह से युक्त : दुष्ट हो तो यश और धन देता है । गुरु छर्न या तृतीय में और जन्म लग्नेश चतुर्थे : में. हो तो सुख पूवंक घन देता है ।

. (४) यश धन-गुरु युक्त सप्तमेदा लग्न में हो शुभ ग्रह या मित्र से युक्त दृष्ट हो”

(२७) हानि कष्ट-छऱ्नेश पापग्रह युक्त हो तो धन की हानि, मरण तुल्य

mine

वर्षे में अरिष्ट विचार : २३१:

पाप दृष्टि न हो तो अरिष्ट नाश धन यद्य सुख देता है और अपनी दशा में राजा की कृपा भी' प्रदान करेगा ।

(५) यश धन--नवमेश और धन भावेश बलवान होकर लग्न में हों पाप ग्रह चे गी हों तो अरिष्ट नाश कर वाहन वस्त्र रत्न से पुर्ण राज्य मिलता है यहां ता है। `

(६) अरिष्ट नाश सुख-पाप ग्रह २-६-११ में हो शुभ ग्रह केन्द्र त्रिकोण में हों तो रत्न वस्त्र सुवणं यश और सुख मिले अरिष्ट नाश होकर शरीर पुष्ट हो । (७) अरिष्ट नाश सुख-मुन्थेश या लग्नेश या अन्म लग्नेदा पुर्ण बली होकर केन्द्र त्रिकोण या ११ या २ स्थानों में कहीं हो तो सुख, धन सुवणं वस्त्र देते हैं। यदि

तीनों ऐसे हों तो विशेष करके उक्त छाभ देते हैं। :

(८) धन छाभ-उच्चका शनि या शुक्र या गुरु हों शुम ग्रह से इत्थशाली हों तो श्रेष्ठ यवन से धन लाभ हो। यवन से ग्रह अनुसार जाति का विचार करना । शनि और शुक्र कृत योग हो तो स्त्री से, गुरु कृत योग हो तो ब्राह्मण से । यदि तीनों उक्त ग्रह उच्च में होकर शुभ इत्थशाली हों तो यवन राजा से बहुत धन मिले गर दूसरों से थोड़ा मिले ।

बलवान मंगल घन स्थान में हो तो यश धन और नेत्र मिले अचानक सुख भी मिले । > ब ३

(९) कल्याण, मंगल-सुर्य गुरु शुक्र परस्पर इत्थशाल करें.तो राज्य यश सुख

और घन मिले तथा सूर्यं वा मंगल मुन्था से उपचय में हों तो अति कल्याण और

मंगल देते हैं। ५

(१०) सुख कीति-बुध शुक्र चंद्र अपनी हुदा में हों और पाप ग्रह ३-११ स्थान

में हों तो वह अपने बाहुबल से सुवणं सुख और कीति देता है।

(११) राज्य यश आदि-बुघ शुक्र का मुशरिफ योग हो और गुरु तृतीय स्थान में हो तो राज्य यश सुवणं रत्न आदि मिळे ।

(१२) वाहन भूमि सुख-मंगल वर्षेश होकर मित्र स्थानी हो और ऐसे ग्रह से

मुत्थशिली हो जो स्वगृही आदि अधिकार पाया हो तथा चन्द्र से कम्बूली भी हो तो

वाहन सुवणं वस्त्र भूमि का लाभ और अधिक सुख होता है । :

विचार-जन्म और वर्षं में योग करने वाले ग्रहों का बलाबल विचार कर योग

या योगभंग का विचार करना अर्थात्‌ योगकर्ता ग्रह पूणं बली हो और उच्च आदिं

पद पाया हो तो शुभ फल प्राप्त होगा नि्वेळ आदि होने से हानि होगी ।

वर्षे में मुन्थेश आदि ग्रह पाप युक्त दृष्ट अस्तंगत नीच गत आदि हो तथा शुभ

ग्रह वल रहित हो तो राज योग होने पर भी योग भंग होगा और हानि होगी ।

` मुन्थेश केन्द्र में हो लग्नेश दशम में बलवान हो दशमेश सप्तम में हो तो मुन्या का किया सम्पूर्ण अरिष्ट दूर हो ।

लग्नेश लग्न में या केन्द्र त्रिकोणं में हो मुन्येश बली हो ओर तो अरिष्ट दुर

होकर सुख, अथं लाभ हो ।

२३२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वषं फल खण्ड

: लग्नेश या. वर्षेश केन्द्र त्रिकोण में हो, मुन्थेश बली हो तो अरिष्ट नाश होकर

सुख और अथं लाभ हो ।

लाभेश लग्न में हो. वर्षेश शुभ ग्रह युक्त लाभ में हो या दोनों दक्षम भाव में हों

तो अरिष्ट दूर हो। :

लग्नेश गुर लर्न में हो बलवान लाभेश से दुष्ट हो तो सब अरिष्ट दूर हो ।

` वर्ष में पाप ग्रह लग्न में न हों वा चन्द्र चतुर्थ व लाभ में सोम्य ग्रह युक्त हो

या बली चन्द्र शुभ ग्रह युक्त लग्न या केन्द्र में हो या गुरु या शुक्र सौम्य ग्रह युक्त

हो तो सव अरिष्ट दुर हो ।

: वर्ष में लग्न और दशम का स्वामी एक हो तो सब अरिष्ट दूर हो सुख अर्थ

लाभ वा राजा और मित्रों से यश मिले ।

: लग्न में गुरु मीन का हो पाप युक्त दुष्ट न हो तो सब अरिष्ट दूर हो ।

  • गुरु चन्द्रमा से सप्तम में हो या उससे युक्त हो तो अरिष्ट नाश हो सुख और

अर्थं लाभहो। `

गुरु से नवम चन्द्र हो चन्द्र से पंचम गुरु हो. तो शत्रु और रोग का नाश हो सब

अरिष्ट दूर हो ।

मुन्था से सूर्य या मंगल पंचम स्थान में हो तो आरोग्य हो अरिष्ट नाश हो ।

बुध, गुरु, शुक्र इनमें से कोई एक ग्रह भी केन्द्र में शुभ ग्रह से युक्त हो नीच का

न हो भौर न शत्रु ग्रह के साथ हो तो सब अरिष्ट दूर हो ।

राहु शुभ युक्त या दृष्ट तीसरे या ११ वें स्थान में हो तो लग्न या मुन्था के

अरिष्ट को नाश करता है ।

मुन्था के साथ सूर्य या मंगल हो तो आरोग्यता देता है अरिष्ट नाश करता है ।

. जन्म लग्न स्वामी गुरु युक्त केन्द्र में हो और लाभेश से युक्त या दृष्ट हो तो

सब अरिष्ट नाश हो ।

वर्ष लग्नेश्च बली होकर केन्द्र में हो या.वर्ष और ठग्न का स्वामी उच्च में हो

सोम्य ग्रह केन्द्र या लाभ में हो तो सुख हो सव अरिष्ट दूर हों ।

मंगल युक्‍त चन्द्र उच्च का केन्द्र त्रिकोण या तीसरे घर में हो तो धन लाभ हो

अरिष्ट नाश हो ।

लग्नेश और लाभेश स्वगरही हों या केन्द्र त्रिकोण या लाभ में बलिष्ट हों तो

संब अरिष्ट दूर हों ।

एक ही गुरु, बुध, चन्द्र, शुक्र केन्द्र में शुभ ग्रह युक्त हो नीच का या अस्त न हो

तो सम्पूर्ण अरिष्ट दूर करता है।

अरिष्टं नाश-जिस वर्ष में लरनेश दशमेश एक हो तो सब अरिष्ट दूर हों राज्य

से लाभ और मित्रों से यश प्राप्त हो ।

बलवान गुरु केन्द्र में हो उस पर सौम्य ग्रह की दृष्टि हो तो धन धान्य का लाभ

हो ग्न का किया अरिष्ट दूर हो। _

५ EF

वषं में अरिष्ट विचार : २३३

(१) लग्नेश स्वग्रुही होकर लग्न में हो उसका जों उच्च स्थान हो उसका स्वामी

अपने उच्च में बैठकर देखता हो तो राज्य लाभ हो ।

(२) शुभ ग्रह अपने उच्च का हो और लग्न में हो और सव शुभ ग्रहं बलवान

'होकर लाभ या त्रिकोण में हों तो अचानक राज्य लाभ हो यदि ये ग्रह स्वग्रही आदि

हों तो थोड़ी उन्नति होती है ।

(३) लग्नेश स्वगृही लग्न में हो या मंगल उच्च का हो तो राज्य लाभ हो ।

(४) मंगल वलवान धन स्थान में हो तो अचानक अधिक शोयं बढ़े ।

(५) जव मुन्येश लग्नेश या जन्म लग्नेश वली होकर केन्द्र त्रिकोण लाभ या धन

"स्थान में हो तो वस्त्र सुवर्ण और सुख का लाभ हो ।

(६) नवमेश वलवान हो और धनेद शुभ ग्रहों से युक्त हो पाप ग्रहों की दृष्टि न

'हो तो सुवणे और सुख का लाभ हो धमे में रुचि हो धन धारण से युक्त लोगों से प्रीत

'हो लक्ष्मी का भोग करे ।

(७) यदि गुरु केन्द्र लाभ या ३-४-९ स्थान में हो या जन्म लग्नेश स्वगृही हो "तो राज्य लाभ हो ।

(८) जब चन्द्र बुध गुरु शुक्र उच्च में या स्वगृही हों लग्न से केन्द्र लाभ या

तृतीय में हों अपने मित्र से युक्त या दृष्ट हों और वलवान हों तो शत्रु का नाश हो

वाहन रत्न वस्त्र देश का लाभ स्त्री पुत्र से अनेक प्रकार से सुख मिले ।

(९) जब चतुर्थेश थे स्थान में वलवान हो या बलवान शुभ ग्रहों से युक्त या

'दृष्ट हो तो राज्य लाभ दो ।

(१०) केन्द्र में सब शुभ ग्रह हों पाप ग्रह २-६-११ घर में हों और बलवान हों

मतो राज्य लाभ हो ।

(११) जव वृष लग्न में शुक्र, बुध और चन्द्र हों तथा गुर केन्द्र में हो तो राज्य

ऱहाभ हो ।

(१२) मीन लग्न में गुरु या शुक्र हो लाभ में मंगल हो तो राज्य लाभ हो ।

(१३) केन्द्र में बलवान चन्द्र शुभ ग्रहों से युक्त पाप ग्रह से रहित हो अथवा

अकेला हो तो राज्य लाभ हो। परन्तु यदि नीच का अथवा बलहीन चन्द्र हो तो

“राज्य लाभ नहीं होगा ।

(१४) जब चन्द्रमा और लग्नेश दशम घर में हों शुभ ग्रहों से दुष्ट हों तथा शुभ

ग्रह अपने उच्च आदि स्थानों में हों तो निश्‍चय राज्य लाभ हो।

(१५) लग्नेश शुभ ग्रह हो चन्द्र तथा लग्नेश दञ्चम हों ओर बलवान हों ओर

श्शुभ ग्रह से दृष्ट हों तो राज्य लाभ हो ।

(१६) ककं लग्न में गुरु हो दशम में चन्द्र हो इनका इत्यशाल योग हो सूर्ये स्व-

'शुही हो तो राजयोग होता है ।

(१७) दशम में उच्च का सूर्ये हो कर्क लग्न में गुरु हो धन में चन्द्र हो तो राज

योग हो ।

२३४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थं वर्षफल खण्ड

(१८) गुर अपना उच्च का हो त्रिराशि पति स्वगृही हो तथा दोनों में परस्पर दृष्टि संबंध हो तो लक्ष्मी तथा पुत्र की प्राप्ति हो।

(१९) मंगल स्वग्रही या उच्च का हो शुभ ग्रह या मित्र से दुष्ट हो तो वाहनः रत्न सुवर्ण आदि से युक्त लक्ष्मी प्राप्त हो । (२०) जब भाग्येश बलवानु हो उच्च का हो गुरु चन्द्र सूर्य से दृष्ट हो तोः भाग्योदय होता है राजा की प्रसन्नता हो, धन-धान्य का लाभ हो । १ (२१) सप्तमेश बलवान होकर लग्न में ही गुरु से युक्‍त या दृष्ट हो तो राज- योग हो । र

(२२) दशमेश शुभ ग्रह हो हर्षवळ पाया हो या अंपने उच्च आदि में हो शुभ ग्रह से दृष्ट हो, उदित हो, धन त्रिकोण या केन्द्र में हो तथा लग्न में शुभ ग्रह हो तो" राज्य लाभ हो.

(२३) जब शनि बलवान्‌ हो या अपने उंच्च का हो या शुक्र बलवान्‌ हो तो” म्लेच्छ जन के द्वारा राज्य तथा लक्ष्मी प्राप्त हो। (२४) जव निराशीश मंगल स्वगृही या अपने उच्च का होकर लग्न त्रिकोण याः लाभ में हो तो अति सुख प्राप्त होता है । gr (२५) शनि वर्षेश होकर लाभ में हो सूर्य दशम हो चन्द्र से इत्यशाल करे तोः राज योग होता है ।

(२६) राजवंश में उत्पन्न लोगों को उपरोक्त योगों में राज्य लाभ हो सकता है: अन्य को प्रतिष्ठा और धन प्राप्त होगा ।

(२७) जन्म में जिनके स्वगृही या उच्च के उदयी ग्रह हों शत्रु स्थान छोड्करः अन्य स्थान में हों यदि वर्ष में भी वैसे ही पढेँ तो सव मनोरथ सिद्ध हों.! राजयोग भंग

(१) जब नीच के पाप ग्रह हों या अस्तंगत हों तो राजयोग भंग हो । ; (२) जिस वर्ष में ग्रह नीच के हों या शत्रु गृही हों पाप युक्त हों उस वर्षे में राज्य अर्थात्‌ कर्म जीविका की हानि होती है अल्प सुख भी नहीं मिळता । (३) पाप ग्रह अशुभ षड़वगं में हों और शुभ ग्रह बलहीन हों तो कष्ट हो और: राज्य की हानि हो । भाड़ (४) जन्म समय में नीच अस्त आदि जैसा ग्रह हो वैसा ही वर्ष में पड़े तो शुभ फल का नाश होता है । ड्या

(४) दितीयेश बलहीन होकर लग्न में हो उसपर शुभ गुरु की दृष्टि न हो पाप ग्रह से युक्त हो तो संचित द्रव्य का नाश हो । 55 5४ यूह (६) वषेश मुन्येद आदि ग्रह पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट हों, अस्तंगत या नीच￾गत हों सौम्य प्रह बलहीन हों तो राजयोग भंग हो धन और सुख का नाश हो । (७) दादक्ष स्थान में चन्द्र हो या चन्द्र के साथ शनि हो शुक्र छठे घर में हो तोः अचानक चित्त में विकलता हो धन आदि सब पदार्थों की हानि हो । प

किक के 4६ दोष: २३४:

(द) गुरु या शुक्र अस्तंगत दो या नीच थे ही था बाद बडी थि आक्राति हवो तोः घन एवं राज सुख का नाश हो ।

(९) जब शुभ ग्रह आश्रय दीन द्वा दथा पाप ग्र केसर थे दडट्टीन या वकी हों: तो धन का नाश होता है । (१०) जन्म का द्वादशेदा यदि वर्ष में दशय स्थान में पढ़ें और अपने स्वामी से या शुभ ग्रह से युक्त दृष्ट न हो ददामेश शत्रु या घाप ग्रह दे युक्त द्रो तो धन का

नाश हो।

(११) जब पंचाधिकारियों में से कोई भी ग्रह केन्द्र त्रिकोण या छाभ में बली |

होकर न बैठा हो. शेष ग्रह पाप ग्रहों के साथ हों या उनसे दृष्ट द्रां या बळहीन हों तो:

धन या सुख का नाश हो ।

अध्याय २६

ताजिक के १६ योग

इन योगों के नाम फारसी भाषा में दैवज्ञ पं० नीलकंठ ने अपनी पुस्तक नीलकंठी;

में दिये हैं। इनका विचार वर्ष और प्रश्न में होता है। ये बहुत महत्व के योग हैं !

इनमें मुंथशिल योग का बहुत उपयोग हुआ है उसे अच्छी प्रकार से. समझ लेना: चाहिये ।

इत योगों के नाम

(१) इक्कवाल = इकवाल अर्थात्‌ प्रताप-भाग्योदय शुभफल

(२) इंदुवार=इदवार. अर्थात्‌ पीठ फेरना=भारयहीनता<दुर्भाग्य । अशुभ फळ |»

नं १ का उल्टा ।

(३) मुथशिल = मुंधसिंळ = इत्यद्याल = इतिसाल आप्त करना-संयोग-शुभ ।

इसके भेद :--

१ वर्तमान मुथसिल

२ पूर्ण 3

३ राश्यंत रादयादि ,, ४भविष्य कर?)

(४) ईशराफ = इशराफ = मुशरिफ = अपव्यय-खर्च करना-अशुभ ।

(५) नक्‍त<नक्तमुर्नकद-रोकड अशुभ दुसरों की सहायता से कायं सिद्ध करे

(६) यमयारजामिआरसंयोजकरशुभ । 0

(७) मणऊ-ममनुआ-निर्षधिक-मना । अशुभ ।

(८) कम्वूल = कम्बूलम्कुबूछ मकबूल स्वीकृतऱ्स्वीकार । शुभ । इसके १६:

"२३६ ::सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थं वर्षफल खण्ड

*१ उत्तमोत्तम- कबूल ` ९ सम उत्तम कंबूल

“२ उत्तम मध्यम त १० सम मध्यम हर

३ उत्तम सम RE 1 ११ सम समाख्य मध्यम त)

"४ उत्तम अधम 0) १२ समाधम i

५ मध्यम उत्तम पं १३ अंधम उत्तम 0१

“६ मध्यम मध्यम 7) १४ अधम मध्यम ठ

५७ मध्यम सम Ee १५ अधम सम i

८ मध्यम अधम 1 १६ अधमाधम ` त

(९) गोरी कुबूल-गर कंबूल=्गेर कम्बूलम-गेर मकबूल-अस्वीकृत । अशुभ ।

(१०) खल्छासरच्खलासस्छूटा हुआ । अशुभ ।

(११) रहइ-निकम्मा-त्यक्त । अशुभ ।

(१२) दुफालि कुत्य-दुःफालि कुत्य, दुस्वार कुब्त्रत । कठिन प्राष्य-कठिनता से

मळ पाने वाला-सामान्य ।

(१३) दुत्यातपदबीर-दुत्थ दब्बीर- दुशवार तदवीर । दुष्प्राप्य । मध्यम

(१४) तंवीर-तम्बीर-तदवीर-उपाय । शुभ

` .(११) कुत्य-कुब्वत या कवी=वलिष्ठ=्वली शुभ

  • (१६) दुरफ=्दुरितोवा=रफअ= मिठानास्त्रना काम विगाइनाम्दुरित=भशुभ

*(१) इक्कवाल योग-अताप बढ़ाने वाला ।

सब ग्रह केन्द्र (१-४७-१० घर)

और पणफर (२-५-८-११ घर) में हों

आपोक्लिम (३-६-९-१२ घर) में कोई

ग्रह न हो तो इक्कवाल योग होता है।

जैसा यहाँ बताया है ।

फल-राजप सुख कुल अनुमान से होता है। जिसके वषं में अरिष्ट हो इस

इकवाल योग के होने से भंग हो जाता है।

५(२) इन्दुवार योग

यहाँ नं० १ के विपरीत है । सब ग्रह

: आपोक्लिम (३-६-९-१२ घर) में हों

“केन्द्र पणफर में कोई ग्रह न हों तो इन्दुवार

-योग होता है।

¢

“ताजिक के १६ योगः: २३७"

फलछ-इसका फल मनिष्टकर्ता है ।

(३) मुन्यशिल-मिलाप-मिला हुआ योग-मुत्यसिल-मुत्यशील-भूय शील> -

इत्तिसाळ हासिल करना-प्राप्त करना ।

इस योग में यह देखना कि ग्रह शीघ्र गामी है या मन्द गामी है ओर ग्रह के

कितने अंद हैं ।

शीक्री ग्रह-दो ग्रहों में से जिस की गति अधिक हो वह शीघ्र गति वाला ग्रह है।

मन्दी ग्रह-दो ग्रहों में से जिस की गति अल्प हो (मन्द हो) वह मन्द गति: वाला ग्रह है।

यहाँ वर्तमान में गोचर के अनुसार पंचांग में जो ग्रह की गति दी हो वह

गति लेना ।

द गति वाला ग्रह बहुत अंश होकर आगे हो और शीघ्र गति वाला ग्रह अल्प `

अंश हों के पीछे हो और दोनों ग्रहों की दृष्टि दीप्तांश के भीतर हो तो मुन्यशिल

योग होता है । इसमें शीघ्री ग्रह अपना तेज (सामर्थ) मन्दी ग्रह को दे देता हैं ।

घन भागस्वहुत अंश । मन्द भाग-अल्प भंश । भाग-अंश । घन-बहुत । अल्प-कम |:

ग्रहों की गतिरएक राशि में चलने का समय ।

यहाँ शी प्रीस्चन्द्र, सूयं, बुध, शुक्र, मंगल है।

मन्दी ग्रह-गुरु, शनि हैं। इनमें भी शनि से गुरु शीघ्री हे गुरु से मंगल शीघी

है। मंगल से सुर्य बुध शुक्र शीघ्री हँ । इन सब से चन्द्रमा शीघ्री है ।

एक राशि कों पार करने के लिए जिसे अधिक समय लगता है वह मन्द गति

वाला ग्रह मन्द ग्रह या मन्दी ग्रह है । जिसे थोड़ा समय लगता है वह शीघ्र गति

वाला ग्रह, शीध ग्रह, या शीघ्री ग्रह है।

इस प्रकार परस्पर दृष्टि करने वाले दो ग्रह हों, इन में एक की गति मन्द और

दुसरे की गति शीघ्र हो । यह पंचांग से देख लेना चाहिए । इन दो ग्रहों में से उनके

अंशों का विचार करना यदि शीघ्री ग्रह के अल्प अंश हैं और मन्दी ग्रह के अधिक

अंश हैं और शीघ्री ग्रह से मन्दी ग्रह आगे हो और दोनों की दृष्टि दीप्तांश के भीतर

हो तो मुन्यशिळ योग हो जाता है। इसमें शीघ्री ग्रह मद्र ग्रह को -अपना.तेज दे

देता है।

ग्रहों के दीप्तांश

यहाँ शीघ्री ग्रह के आगे या पीछे विचारना और शीज्री ग्रह के अंश के भीतर

दीप्तांश लेना अर्थात जो ऊपर बताये दीप्तांश के अंश दिये हैं उनसे दोनों हों के

अशो का अन्तर विचारना । दोनों ग्रहों के अंशों का अन्तर इन से अधिक नहीं”

होना चाहिए ।

दृष्टि का विचार यहाँ नीचे बताई दृष्टि लेना । गणित द्वारा साधन की हुई दृष्टि की वहाँ:

आवश्यकता नहीं है ।

२२९३८ :: सचित्र'ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

दृष्टि स्थान कला दृष्टि तत्काल में अधिमित्र

“१ प्रत्यक्ष स्नेहा ९-५ ` ४५ ४५

:२ गुप्त स्नेहा ३ ४०' } मित्र

  • ११ १०

-२ गुप्त बैरा ४-१० १५" शत्रु

५४ प्रत्यक्ष बैरा ७ ६०" अघिशत्रु

५ अत्यन्त बैरा . १

२-६८-१२ स्थान दृष्टि शून्य हैं ।

लग्न से ६ भाव तक दक्षिण भाग, ७ से १२ तक वाम भाग । दक्षिण की अपेक्षा

-बाम दृष्टि बलवान होती है। दशम से चतुर्थे पर दृष्टि बली है । चतुर्थं से दशम पर

दृष्टि निर्बल है ।

यहाँ मन्दी ग्रह के अधिक अंशों में से शीघ्र ग्रह के कम अंश को घटाना । यदि

, अन्तर दीप्तांश के भीतर हो तो इत्यशाल योग होता है । यहाँ वर्तमान ग्रह स्पष्ट से

-ग्रह के अंश और उनकी गति लेना ।

:इत्यश्ञाल योग का उपयोग . १ ह

किसी भाव के फल के विचार करने के लिए उस भाव का स्वामी और लग्नेश

“के साथ इःयशाल योग है या नहीं इसका विचार करना होता है । कार्येश और लग्नेश

-इन दोनों में एक लाभेश अवश्य होना चाहिए तब इत्यशाल योग का प्रभाव होता है।

लग्नेश का द्वितीयेश, तृतीयेश आदि सब भाव में स्वामियों के साथ इत्यशारू

“योग हो सकता है। जंसे राज सम्बन्धी कार्य का विचार करना है राज्य का विचार “दशम भाव में होता है । £

९०2५ मन्म ` मान लो दशम भाव में सिह राशि है।

जिसका स्वामी सूर्यं कार्येश हुआ। मान लो

यह सूर्य नवम भाव में है जिसके अंश १५ हैं।

इसके आगे लग्न में लग्नेश मंगल २५ अंश

पर है। यहाँ शीघ्री ग्रह सूयं के अल्प अंश

हैं । इसके आगे मन्दी ग्रह मंगल अधिक अंश

छ में है । दोनों की नवम पंचम दृष्टि है। सूर्यं का दीप्तांश १५ है यहाँ दोनों की दृष्टि दीप्तांश के भीतर है (२५-१५)-१० क्योंकि केवळ यहाँ १०० का अन्तर है जो दीप्तांश के भीतर है । यहाँ लग्नेश की

*दृष्टि कार्येश पर होने से इस मुत्यसिल योग के प्रभाव के फलस्वरूप राज्य प्राप्त -होगा अर्थात्‌ उस कायं में सफलता प्राप्त होगी ।

NIE SLY DN

ताजिक के १६ योग. : २३९

अन्य उदाहरण--

यहाँ सप्तम भाव सम्बन्धी विचार करना है। यहाँ सप्तमेश गुरु कार्येश हुआ बुध लग्नेश हुआ बुध की गति शीघ्र है। अल्प अंश १४ पर है। बुध के आगे मन्द ग्रह गुरु २०° पर है बुघ के दीप्तांश ७ के भीतर (२०-१४)=६ दोनों की दृष्टि है । एक दुसरे पर सप्तम दृष्टि है यहाँ इरथशाळ योग हों गया ।

अन्य उदाहरण--

यहाँ धन सम्बन्धी विचार का कार्येश

सूयं अंश पर है। लग्नेश चन्द्र शीघ्री

ग्रह २८ अंश पर है। मन्द ग्रह सूर्यं आगे है। दोनों की नवम पंचम दृष्टि चन्द्र के

दीप्तांश १२ अंश के भीतर हैं । (१ ०-२६)

=१०+-३०=४०-२८-१२° अन्तर इससे शीधी ग्रह के दीप्तांश के भीतर सूर्य है तो

-इत्थशाल योग हो गया । या इस प्रकार समझो चन्द्र २८° पर है २ अंश आगे बढ़ते

'पर राशि पूरी होगी । सूयं के १००--२९-१२ अंश अन्तर हुआ ।

दृष्टि भेद के विचार से इत्थशाल योग का पृथक्‌-पृथक्‌ फल होता है । इत्थशार

योग में यदि दोनों की परस्पर शुभ दृष्टि हो तो विशेष फल होगा । अशुभ दृष्टि का

अशुभ फल होता है। लग्नेश और कार्येश का जैसा इत्यशाल योग हो वैसा शुभ या अशुभ फल होता है। जैसे--

छग्नेश षष्ठेश से रोग वृद्धि । लग्नेश अष्टमेश से रोग वुद्धि मृत्यु आदि । लग्नेश

ख से व्यय वृद्धि। इस प्रकार अशुभ स्थानों से यह योग होने से अशुभ फल "होता है।

के कप कार्येश, लग्नेश का मित्र तथा कार्येश का मित्रै ये चारों जिस राशि में

हों वह अपने स्वामी या शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो इत्यशाल योग बलवान होता है ।

यदि स्नेह आदि शुभ दृष्टि हो तो और भी विशेष शुभ फल होता है। परन्तु थे शत्रु

घर में, पापग्रह से दृष्ट या युक्त हों तो शुभ फल घट जाता है।

जिस भाव सम्बन्धी कार्य हो उस भाव के स्वामी को कार्येश कहते हैं। जैसे--

भाइयों के निमित्त तृतीयेश । संतान-पंचमेश । राज कार्य-दशमेश । स्त्री के सम्बन्ध

'से---सप्तमेश इत्यादि । इस प्रकार कार्येश और लग्नेश से इत्थशाल योग है या नहीं

यह विचारना पड़ता है । दोनों का इत्यशालरू योग होने से कार्य सिद्ध होता है।

२४० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

इस इत्यशाल योग में ५-९ और ३-११ सम्बन्धी इत्यशाल में दोनों स्नेहा दृष्टि

होने से उस सम्बन्धी अच्छा फल होगा। शत्रु दृष्टि होने से उस भाव सम्वन्धी फल

नष्ट कर देते हैं । इस प्रकार दृष्टि स्थान आदि के विचार से योग का शुभ या अशुभः

फल होता है । वक के

छग्नेशा और कार्येश के मित्र ग्रह भी उन्हीं के सदृश फल देते है । यदि लग्नेश

आदि के साथ कोई ग्रह हो वह जिस भाव में हो वह अपने भावेश और शुभ ग्रहों सेः

दृष्ट हो तो इत्यशाल योग बलवान हो जाता है और उस फल को वढ़ा देत्ता है ॥

स्नेह दृष्टि में तो योग फल को अधिक बढ़ा देता है। यदि इत्यशाल करने वाला मंद

ग्रह वक़ी हो तो वह फल अधिक बढ़ जाता है।

इसी प्रकार शत्रु राशि अनिष्ट स्थान, पाप ग्रह दृष्टि से इत्थशाल योग का फल

अशुभ भी हो जाता है । जैसे लग्नेश कार्येश दोनों शत्रु या नीच राशि में या शत्रु के

हद्दा, नवांश आदि में या दुष्ट स्थान में हों और पाप ग्रह से युक्त दृष्ट हों तो इत्य--

ज्ञाळ योग उत्पन्न हुआ अनिष्ट फल तत्काल ही होगा । उसके आगे पीछे शुभ होगा ।'

यदि ऐसा योग होने वाळा हो. तो उक्त फल भी आगे होगा ऐसा समझना । अर्थात्‌

  • जब सर्वोच्च आदि राशि में पाप युक्त या दृष्ट होने वाला हो तव.उसका फल होगा ।

इन योगों में अनिष्ट फल होने में शुभ और अशुभ दोनों अपने-अपने समय के अनुसार:

होता है जैसा ऊपर बताया है । यदि लग्नेश कार्येश दोनों भित्र के घर में वतमान हैं

और कुछ दिन बाद शत्रु के घर में जावेंगे तो उसका अनिष्ट फल आगे होगा । यदि:

ये दोनों मित्र घर से शत्रु घर में चले जावं तो शुभ फल हो चुका अशुभ, फक व मान

है ऐसा समझना । यदि शूभ फल निकलता हो तो शुभ ही फल होगा ।

इत्थ झाल योग का फल कब होगा ?

(१) लग्नेश और कार्येश दोनों उच्च ग्रह, मित्र राशि) स्व त्रिराशीश, स्वः

नवांश आदि अच्छे स्थान में.हों और शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हों तो इत्यशाल काः

शुभ फल तत्काल होगा और वह शुभ फल इंसी समय हो रहा है । ,

(२) जो ऐसे शुभ स्थान में आने वाला हो और शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट होने:

वाळा हो तो उसका फल आगे उस समय आने पर होगा । -

(३ ) यदि ऐसे शुभ स्थान से अन्य त्यान में गये थोडा भी समय हो गया हो

तो पूर्वोक्त फल हो चुका ऐसा समझना ।

अर्थात्‌ ऐसा योग वतंमान में हो तो फल शीघ्र होगा । ऐसा योग होने वाला हो

तो भविष्य में फल होगा । ऐसा योग हो चुका है तो वह फल बीत चुका है ऐसा

जानना । र

'फरू का समय जानना

इत्यशाल योग करने वाले लग्नेश और कार्ये के अंशों का मंतर करके जो शेष

रहे उसे १२ से गुणा करना। जो गुणन फल प्राप्त हो उतने दिन में इत्यशाल योगः

का फल होगा । * क्र डट १ पद

  1. _ » ४६2. DR SE

ताजिक के १६ योग : २४१

इत्थक्षाल पुणं हुआ या नहीं !

शीश्री ग्रह के अंशादि में उसी शी क्री ग्रह के दीप्तांश जोड़ना जो योग आवे उस री के भीतर मंद ग्रह के अंश हैं तो समझो इत्यञ्ञाल योग होता है । यदि उस योग से मंदीग्रह के अधिक अंश हैं तो यह योग नहीं होगा इसमें भविष्य इत्यशाल योग का अपवाद है जिसे आगे समझाया है ।

इत्थशाल योग के भेद

इत्थशाल योग के ४ भेद हैं। (१ ) वर्तमान इत्थशाल या मुन्थसिल (२) पूर्ण मुथसिल ( ३ ) राइयंत' राश्यादिस्थ वर्तमान मुंथसिल ( ४ ) भविष्य मुंथसिल ।

( १ ) वर्तमान मुन्यसिल शीघ्री ग्रह न्यून अंश पर पीछे हो मंदी ग्रह अधिक अंश पर शीघ्री से आगे हो।

दोनों की नवम पंचम आदि दृष्टि हो और

शीघ्री के दीप्तांश के भीतर यह दृष्टि हो तो

पृष्ठ गत शीत्री' ग्रह अपना तेज ( शक्ति )

मंद गति वाले ग्रह को दे देता है। तब

यह वर्तमान मुंथप्तिक् हुआ। इसका फळ

पूर्ण मुंयसिल से कुछ कम होता है

यहाँ लग्नेश सूर्ये शीघ्री के अल्प अंश २० पर है । इतके आगे मंदी ग्रह गुद के

अधिक अंश २६ हैं । दोनों की नवम पंचम दृष्टि है। और सूर्थ के दीप्तांश के भीतर

मंदी ग्रह है ( २६-२० )=६ केवल ६? अन्तर है। इमते यह्‌ योग हो गया । यहां

सन्तान भाव का कार्येश गुरु से रूम्नेश का मुन्धतिल है ।

( २ ) पूर्ण मुच्यसिल योग

यह वर्तमान इत्यशाल सरीखा ही है। केवल अन्तर इतना ही है कि शीघ्र ग्रह

के अंश मन्द ग्रह के अंश से केवल कला विकला मात्र से कम हों । इतका फळ पूर्ण

होता है ।

शीघ्री और मंदी ग्रह का अन्तर आधा

अंश ( ३० कला ) तक भी हो तो भी पूर्ण

न्थसिछ योग हो जाता है ।

यहाँ स्त्री लाभ प्रश्‍न में लग्नेश चन्द्र

शीघ्र यामी ५-२-१०” पर है। इसके

आगे सप्तमेश शनि पंचम में ५९-.३”-५”

पर है। दोनों की सप्तम दृष्टि है। यहाँ

२४२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुथं वर्षफल खण्ड

०_३”-५” दोनों में केवल ५५ विकला का अन्तर है । इससे यह पूर्ण मुन्यसिल' ५-२ -१० योग हुआ। यहाँ शीघ्री ग्रह केवल ५५“ से मंदी ग्रह से न्युन है ।

०-० -५५

जव विकला मात्र न्युन हो या आधी विकला से न्यून हों तव यह वीस बिश्वा

वाला मुन्थसिल होता है । जव विकला तक समानता हो तो पूर्ण मुन्यसिल श्रेष्ठ

होता है ।

(३) राश्यंत राइयादिस्थ दतंमान मुन्थसिल

शीघ्री ग्रह जब राशि के अन्त में होता

है। जैसे २९? पर हो अर्थात वह आगे

वाली राशि में जाने वाला हो जिससे आगे

जाने वाली राशि में पहुँच कर मंद ग्रह से

दृष्ट होकर दृष्टि दीप्तांश के भीतर हो जावे।

मंद ग्रह के थोड़े अंश हों तव यह योग होता

है। शीघ्री ग्रह जव राशि के अन्त में होता

है । तव आगे जाने वाली राशि में वह मंदी ग्रह से अल्प अंश में हो जाता है ।

जैसे धन भाव में मंगल २९ अंश पर है भौर लाभ भाव में शनि ६ अंश पर है।

मंगळ शीघ्री ग्रह है शनि मंदी ग्रह है । शीघ्री के आगे मंदी ग्रह शनि है। यहाँ दोनों

की दृष्टि दीप्तांश के भीतर नहीं है परन्तु जत्र मंगल आगे राशि में जायगा तब वह

तीसरे भाव में पहुंच जायगा तव उस आगे की राशि १९-२० आदि बंश में मंगल

शीघ्री ग्रह अल्प अंश में हो जाता है और मंदी ग्रह अधिक अंश में हो जाता हैं। दोनों

की दृष्टि तव दीप्तांश के भीतर हो जाती है ।

यह वर्तमान इत्यशाल योग का ही भेद है परन्तु दृष्टि रहित इत्यशाल होता है

दीप्तांश के भीतर दृष्टि नहीं है ।

इसमें शीघ्री ग्रह राशि के अन्त में ३०० के समीप हो और मंद ग्रह आगे हों तो

शीघ्री ग्रह आगे की राशि में जाने पर मंद ग्रह जब शीत्री ग्रह के दीप्तांश के भीतर

हो जावे तव शीघ्री ग्रह अपना सामर्थ मंद ग्रह को दे देता है यह अदृष्ट मुन्यसिल है ।

यहाँ धन लाभ प्रश्‍न में छाभेश गुरु ,

मंदी ग्रह ३० पर है। लग्नेश शुक्र शीघ्री

ग्रह २९० पर दशम में हैँ । शुक्र लाभ भाव

में जाने पर दोनों की दृष्टि दीप्तांश के भीतर

हो जायगी उस समय कार्य सफल होंगा ।

ताजिक के १६ योग : २४३

(४) भविष्य मुन्थसिल

शीघ्री ग्रह न्यून अंश पर और मंद ग्रह

उसके आगे अधिक अंश पर हो। दोनों की

दृष्टि नवम पंचम आदि हो परन्तु दृष्टि

दीप्तांश के भीतर न हो । मंदी ग्रह के अंश

दीप्तांश से कुछ अधिक हों । जव शीघी

ग्रह अपनी तेज चाल से आगे बढ़ेगा तव

—— न शीघ्री के अंश अधिक हो जाने से मंदी ग्रह शीघ्री के दाप्तांश के भीतर हो जायगा । यहाँ भविष्य में मुन्यसि होगा । तव इस का फल होगा । इस कारण इसे भविष्य मुंथसिर कहते हैं । जैसे यहां शीघ्री ग्रह ६ अंश पर है । इसके आगे मंदी ग्रह १५० पर है । दोनों की परस्पर दृष्टि दीप्तांश के भीतर नहीं है (१५-६)-९०। यहाँ ९ अंश का अन्तर है । शीघी ग्रह मंगल का दीप्तांश ८ है। उससे १ अंश अधिक मंदी ग्रह वढ़ गया है। शीघी ग्रह जब आगे बढ़ेगा तव मंदी ग्रह उसके दीप्तांश के भीतर हो जायगा तव फल होगा । मान लो शीघी ग्रह मंगल आगे बढ़ कर ७० पर हो गया या और आगे वढ़ गया तव मंदी ग्रह का अन्तर दीप्तांश ६ के भीतर हो जायगा ।

यह्‌ मुन्थसिल आगे होने को है इस कारण यहाँ भविष्य मुन्थसिळ हो गया । इममें

शीघी ग्रह अपना सामर्थ्यं तव मंदी ग्रह को दे देगा । इस प्रकार लग्नेश कार्यश का

१. वर्तमान मुंथसि हो तो उस भाव सम्वन्धी फछ उसी समय वर्तमान है ऐसा समझना ।

२. पूर्ण मुंथसिल हो तो पूर्ण सुख या पूर्ण फल कहना ।

३. भविष्य मुन्थसिल हो तो आगे सुख होगा या आगे फल होगा जव कि दोनों की दृष्टि दीप्तांश के भीतर हो जायगी ।

जिस भाव सम्वन्धी कार्य है उस भाव का स्वामो (कार्येश) और लग्नेश का

इत्यशाल होने पर उस कार्य की सिद्धि होती है ।

(४) इसराफ-मुशरिफ-फिजूलछ खर्ची

इसराफ योग--यह्‌ नं० ३ इत्यशाल के योग से विपरीत है । इसे मुशरिफ योग भी कहते हैं । -

शीघ्री ग्रह अल्प अंश पर मंद ग्रह के

पीछे हो और मंद ग्रह के अधिक यंश हों

और आगे हो दोनों की दृष्टि दीप्तांश के

भीतर हो तो यह इत्यशाल योग होता है ।

परन्तु इसमें यदि शीघी ग्रह मंद ग्रह के अंश

से भी अंश में आगे बढ़ जावे तो यह इसराफ योग हो जाता है।

२४४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

इत्थशाल योग में जो कार्य होने को था वह विपरीत कर देता है । अर्थात्‌ उसः

कार्य का नाश कर देने वाला है या उसकी सिद्धि नहीं होती । कष्ट देता है ।

यहाँ लग्नेश मंदी ग्रह २० अंश पर लग्न में है स्त्री भाव सम्बन्धी कार्य था,

कार्येश बुध शीघ्री ग्रह २२ अंश पर है । यहाँ मंद ग्रह गुरु के अंश से शीक्षी ग्रह वुध

से १ अंश बढ़ गया है। क्योंकि मंद. ग्रह के अंश से शीघ्री ग्रह के अल्प अंश होनाः

था । इसके विपरीत होने से अर्थात्‌ शीघ्री ग्रह के अंश मंद ग्रह के अंशो से बढ़ जाने

से यह इशराफ योग हो गया ।

हिज्जाल आचार्य के मत से इसमें इतना विचार है कि यह योग पाप ग्रहों का

हो तो कार्ये विपरीत करता है अर्थात्‌ शुभ के बदले अशुभ करता है। शीघ्री और

मंदी दोनों पाप ग्रह हों तो कार्यं का अवश्य नाश होता है? शुभ ग्रहों का योग हो तो

कार्य विपरीत तो नहीं करेगा किन्तु शुभ फल को जो इत्थशाल से होने वाला था न

होने देगा इसमें भी मत है कि शीघ्री और मंदी दोनों ग्रह शुभ हों तो कार्य सिद्ध

होगा परन्तु कठिनाई से सिद्ध होगा ।

(५) नक्त योग-नकछर्नकदी ।

जहाँ शीघ्री ग्रह के अंश अल्प हों और मदी ग्रह के अंश उससे अधिक हों । और

इत्थशाल योग में जेसा होना था दोनों की परस्पर दृष्टि नहीं हो । इन दोनों ग्रहों के

बीच एक ऐसे ग्रह से जो इन दोनों से गति में शीघ्र हो और लग्नेश और कार्येश

दोनों को देखता हो तो वह अल्प अंश वाले ग्रह (शीघ्री ग्रह) का तेज लेकर अधिक

अंश वाले ग्रह (मंदी ग्रह) को दे देता है। इस योग में अन्य के द्वारा कार्य सिद्ध होता है!

यहाँ लग्नेश बुध के कम अदा १२

हूँ । कायंश गुरु अधिक अश १४ पर है।

दोनों एक दूसरे से ६-८ भाव में होने से

परस्पर दृष्टि नहीं है । परन्तु नवम भाव

में इन दोंनों से शीघ्री चन्द्र १० अश

पर है उसकी चोथी दृष्टि लग्नेश वुध पर

इस प्रकार यह थीघ्री चन्द्र दोनों को देखते हुए शीघ्री ग्रह बुध का तेज लेकर मंदी

ग्रह गुरुको दे दिया। इस प्रश्‍न में तीसरे आदमी की मध्यस्थता से कार्य पूरा

होगा । यहाँ मध्यस्थ ग्रह की दृष्टि लग्नेश और कार्य श के दीप्तांश के भीतर ही होना

आवश्यक है । यहाँ चन्द्र लग्नेश कार्येश से शीघ्र गति वाला होने से और कायश के

अंशों से अल्प होने से यह कार्येश के अडा को पहुंच सकता है। (६) यमया योग-जमिअः-जमाऊसंयोजक । इसमें लग्नेश कार्या में एक शीघ्र गति वाला हो एक मंद ग्रति वाला हो ये

ताजिक के १६ योग : २४५

'किसी भाव में हों और उन की परस्पर दृष्टि न हो परन्तु दोनों के अ शा दीप्तांश के भीतर होना चाहिए । दोनों की परस्पर दृष्टि न होने से यह योग नहीं होता परन्तु रा के वीच एक ऐसा ग्रह हो जो दोनों से मंद गति वाला हो और उन दोनों ग्रहों को देखता हो और दृष्टि में दीप्तांश के भीतर हो तो वह मध्यस्थ ग्रह लग्नेश कार्येश से तेज लेकर मंदी ग्रह को दे देता है ।

यहाँ राज्य प्राप्ति प्रश्न में लग्नेश सूये

१५० पर सप्तम में है और दहामेश कार्येहा

शुक्र १७° पर अष्टम में है। इन दोनों के `

अशा तो दीप्तांश के भीतर हैं परन्तु परस्पर

दृष्टि का अभाव है । ऐसी स्थिति में इन

दोनों से मंद गति वाला ग्रह दोनों के वीच

दशम भाव में गुरु १७? पर है । गुरु की दृष्टि सूर्य ओर शुक्र दोनों पर है और दृष्टि

दीप्तांश के भीतर है । इस से यह मध्यस्थ ग्रह शीघ्री ग्रह शुक्र का तेज लेकर मंदी

अह सूर्यं को दे दिया।

इवलिए मध्यस्थ द्वारा यह कार्य होगा । यहाँ गुरु ग्रह मध्यस्थ है तो गुर के

अनुरूप मध्यस्थ पुरोहित मंत्री आदि के द्वारा यह कार्य सम्पादन होगा । यह योग

‘विचारणीय काय को मध्यस्थ द्वारा सिद्ध करता है ।

नं० ५ नक्त योग में मध्यस्थ ग्रह दोनों से शीघ्री था । यहाँ दोनों की अपेक्षा

मंदी ग्रह यहाँ गोचर में शुक्र शीधी ग्रह और सूर्य मंदी ग्रह है ।

यमया योग में मध्यस्थ ग्रह लग्नेश और कार्यंश दोनों से मंद होता है। इस

कारण इन दोनों से अश में कुछ अधिक होता है । इतना अधिक हो कि लग्नेश या

“कार्यश में दीप्तांश के भीतर दृष्टि कर सके ।

(७) सणङ योग =ममनुआ=मना

इसमें शीघी ग्रह अल्प अश पर हो उसके आगे मदी ग्रह अधिक अंश पर हो

और दोनों की परस्पर दृष्टि दीप्तांश के भीतर हो परन्तु इनके वीच में शीधी ग्रह

के समीप शीघ्री ग्रह के कुछ अशो से आगे या पीछे (कुछ अंश से कम या अधिक)

श्नि या मंगल हो और उम्र शनि या मंगल की ४, ७ या एकक्षे (एक स्थान) की

दृष्टि उप्त शीघ्री ग्रह पर हो और मंदी ग्रह को वह किसी भी दृष्टि से देखता हो तो

यह मंगल या शनि शीघ्र ग्रह का तेज हर लेता है और मंद ग्रह को तेज नहीं

देता है ।

इप प्रकार इस्यश्ाळ योग से जो कां होने वाळा था वह कार्य शनि या मंगळ

.बरीच में पड़कर मना कर देता है अर्थात्‌ कार्य होने नहीं देता । कार्य का नाश कर

देता है । इससे मंगळ या दाति मणऊयोग का कर्ता हुआ ।

२४६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षेफल खण्ड

यह योग पाँचवाँ नक्त योग सरीखा है । इसमें शनि या मंगल योग को त्रिगाइते

वाला है । इसमें इत्यशाल के अतिरिक्त ये वाते होंगी ।

(१) दोनों शीघ्री मंदी ग्रह के वीच शनि या मंगल में से कोई हो ॥ टु

(२) यह शनि या मंगल शीघ्री ग्रह की १, ४ या ७ स्थान की वैर दृष्टि से

देखता हो । परन्तु मंद ग्रह को किसी प्रकार की दृष्टि से न न देखता हो । व

(३) शनि या मंगल शीघ्री ग्रह के अंश के कुछ आगे या पीछे हो परन्तु मंद ग्रह

शनि या मंगल के दीप्तांश के भीतर हो तब यह योग होता है ।

एक स्थान दृष्टि चतुर्थ स्थान एवं सप्तम स्थान दृष्टि के विचार से शनि के ३

योग और मंगल के भी ३ योग बनते हैं । इत प्रकार इसके ६ योग हुए । इन प्रत्येक

के २ भेद शीघ्री ग्रह के आगे या पीछे के विचार से हो जाते हैं। इस प्रकार १२

भेद हो जाते हैं । क FE

उदाहरण--यहाँ स्त्री लाभ प्रश्‍न में लग्नेश ०.0 ss Ee बुध ओर कार्येश (सप्तमेश) गुरु है । बुध शीघ्र

ग्रह १४ अंश पर है इसके आगे मंदी ग्रह गुर १९

अंश पर है। दोनों की दृष्टि दीप्तांश के भीतर

है। इससे इत्थशाल योग हो गया। कार्य हो

जाना था परन्तु दोनों के बीच मंगल पड़ जाने से

कार्य में बाधा इस कारण पड़ गई कि यह मंगल शीघ्री ग्रह के अंशों के समीप १५°

पर है और शौत्री ग्रह को चतुर्थं शत्रु दृष्टि से देखता है और यहु मंगल दशम्‌ दृष्टि

से कार्येश गुर को भी देखता है और दोनों मंगळ के दीप्तांश के भीतर हूं । इससे

यह मंगल कार्यं जो होना था उसमें विघ्न कर देता है अर्थात्‌ कार्य में मना कर

देता है या कार्य का नाश कर देता है । यहाँ शीघी ग्रह बुध का तेज मंगल ने हरण

कर लिया जिससे बुध निस्तेज हो गया अर्थात्‌ उसमें फल देने की सामर्थ नहीं रही ।

यहाँ बुध से १° अधिक होकर मंगल आगे स्थित है। शौत्रगामी बुध से १° कम

अर्थात्‌ १३° भी होता तो भी यह योग हो जाता । परन्तु मंगळ या शनि के दीप्तांश

के भीतर लग्नेश और कार्येश हो ।

ES

मंगळ के स्थान में शनि यहाँ हो तो भी मणऊ योग हो जावेगा ।

ब इसरा उदाहरण--यहाँ लग्न प्रश्न

45.५९ में लग्नेश चंद्र लाभ भाव में वृष के १३”

पर है और छाभेश शुक्र लग्न में कर्क के

१८० पर है। इनका इत्थशाल योग हो

गया जिससे धन लाभ होना था परन्तु

मंगल वृष के १९° पर लग्नेश के साथ

एक भाव में होने से मणऊ योग हो गया।

ताजिक के १६ योग : २४७

शुक्र को भी देखता है और मंगल के वीप्तांश मणऊ योग होने से कार्य की हानि होगी ।

तीसरा उदाहरण-यहाँ शनि व लग्नेज् मीन लग्न में हैं। लग्नेश गुरु मंदी ग्रह है जो १४० पर है । सप्तम भाव सम्बन्धी कार्य होने से कार्येश बुध हुआ जो १४० पर है । मणऊ कर्ता ग्रह यहाँ शनि १५० पर मीन राशि में लग्न में है। यहाँ शनि १० अधिक होने पर भी मणऊ योग हो गया । यह शनि कार्येश बुध को सप्तम दृष्टि से भी देखता है और शनि के दीप्तांश के भीतर लग्नेश कार्येश दोनों हैं । इससे यह मणऊ योग हो गया । जिससे कार्य नहीं होगा ।

मणऊ योग का एक और भेद है ।

जव लग्नेश कार्येश का इत्थशाल हो । इन दोनों के बीच शनि और मँगल दोनों मणऊ कर्ता हों या लग्नेश कार्येश में से किसी

के साथ शनि और मंगल दोनों होकर मणऊ योग कर्ता हों। यहाँ शनि और मंगल के अंश लग्नेश कार्योश के दीप्तांश के भीतर हों

चाहे लग्नेश कार्येश के आगे या पीछे या

इनमें से किसी एक के साथ शनि और

मंगल दोनों हों चाहे मंगल और शनिके भंश लग्नेश कार्येश के अंश के भीतर हो या कुछ ही आगे हों परन्तु उनके दीप्तांश के

भीतर ही मंगल और शनि के अंश हों ।

क्योंकि यह मंगल तीसरी दृष्टि से कार्योश के भीतर लग्नेश कार्येश् दोनों हैं । यहां

उदाहरण-यहाँ राज प्राप्ति प्रश्न में लग्नेश शुक्र दशम भाव में कक के १८० पर्‌ "

है और राज्येश ( कार्येश ) चन्द्र अष्टम भाव में वृष के १३० पर है। जिसके साथ

शनि १३ अंश पर और मंगल १९० पर दोनों कार्येश के साथ हैं और लग्नेश कार्येश

के दीप्तांश के भीतर हैं यहाँ इत्थशाल योग का नाशक मणऊ योग हो गया । केवळ |

शनि या मंगल से ही यह मणऊ योग हो जाता है। परन्तु यहाँ ढोनों शनि और

मंगल कार्य नाहक मणऊ योग के कर्ता हैं ।

(८) कम्बूल योग

कम्वूल=स्वीकार

लग्नेश कार्येश का पूवे बताये अनुसार इत्यशाळ योग हो और इन दोनों में से

किसी के साथ या दोनों के साथ चन्द्र भी इत्थशाल करे तो यह योग हो जाता है।

(