भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

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२४० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

इस इत्यशाल योग में ५-९ और ३-११ सम्बन्धी इत्यशाल में दोनों स्नेहा दृष्टि

होने से उस सम्बन्धी अच्छा फल होगा। शत्रु दृष्टि होने से उस भाव सम्वन्धी फल

नष्ट कर देते हैं । इस प्रकार दृष्टि स्थान आदि के विचार से योग का शुभ या अशुभः

फल होता है । वक के

छग्नेशा और कार्येश के मित्र ग्रह भी उन्हीं के सदृश फल देते है । यदि लग्नेश

आदि के साथ कोई ग्रह हो वह जिस भाव में हो वह अपने भावेश और शुभ ग्रहों सेः

दृष्ट हो तो इत्यशाल योग बलवान हो जाता है और उस फल को वढ़ा देत्ता है ॥

स्नेह दृष्टि में तो योग फल को अधिक बढ़ा देता है। यदि इत्यशाल करने वाला मंद

ग्रह वक़ी हो तो वह फल अधिक बढ़ जाता है।

इसी प्रकार शत्रु राशि अनिष्ट स्थान, पाप ग्रह दृष्टि से इत्थशाल योग का फल

अशुभ भी हो जाता है । जैसे लग्नेश कार्येश दोनों शत्रु या नीच राशि में या शत्रु के

हद्दा, नवांश आदि में या दुष्ट स्थान में हों और पाप ग्रह से युक्त दृष्ट हों तो इत्य--

ज्ञाळ योग उत्पन्न हुआ अनिष्ट फल तत्काल ही होगा । उसके आगे पीछे शुभ होगा ।'

यदि ऐसा योग होने वाळा हो. तो उक्त फल भी आगे होगा ऐसा समझना । अर्थात्‌

  • जब सर्वोच्च आदि राशि में पाप युक्त या दृष्ट होने वाला हो तव.उसका फल होगा ।

इन योगों में अनिष्ट फल होने में शुभ और अशुभ दोनों अपने-अपने समय के अनुसार:

होता है जैसा ऊपर बताया है । यदि लग्नेश कार्येश दोनों भित्र के घर में वतमान हैं

और कुछ दिन बाद शत्रु के घर में जावेंगे तो उसका अनिष्ट फल आगे होगा । यदि:

ये दोनों मित्र घर से शत्रु घर में चले जावं तो शुभ फल हो चुका अशुभ, फक व मान

है ऐसा समझना । यदि शूभ फल निकलता हो तो शुभ ही फल होगा ।

इत्थ झाल योग का फल कब होगा ?

(१) लग्नेश और कार्येश दोनों उच्च ग्रह, मित्र राशि) स्व त्रिराशीश, स्वः

नवांश आदि अच्छे स्थान में.हों और शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हों तो इत्यशाल काः

शुभ फल तत्काल होगा और वह शुभ फल इंसी समय हो रहा है । ,

(२) जो ऐसे शुभ स्थान में आने वाला हो और शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट होने:

वाळा हो तो उसका फल आगे उस समय आने पर होगा । -

(३ ) यदि ऐसे शुभ स्थान से अन्य त्यान में गये थोडा भी समय हो गया हो

तो पूर्वोक्त फल हो चुका ऐसा समझना ।

अर्थात्‌ ऐसा योग वतंमान में हो तो फल शीघ्र होगा । ऐसा योग होने वाला हो

तो भविष्य में फल होगा । ऐसा योग हो चुका है तो वह फल बीत चुका है ऐसा

जानना । र

'फरू का समय जानना

इत्यशाल योग करने वाले लग्नेश और कार्ये के अंशों का मंतर करके जो शेष

रहे उसे १२ से गुणा करना। जो गुणन फल प्राप्त हो उतने दिन में इत्यशाल योगः

का फल होगा । * क्र डट १ पद

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