भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

पृष्ठ 247, कुल 280 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 247

ताजिक के १६ योग. : २३९

अन्य उदाहरण--

यहाँ सप्तम भाव सम्बन्धी विचार करना है। यहाँ सप्तमेश गुरु कार्येश हुआ बुध लग्नेश हुआ बुध की गति शीघ्र है। अल्प अंश १४ पर है। बुध के आगे मन्द ग्रह गुरु २०° पर है बुघ के दीप्तांश ७ के भीतर (२०-१४)=६ दोनों की दृष्टि है । एक दुसरे पर सप्तम दृष्टि है यहाँ इरथशाळ योग हों गया ।

अन्य उदाहरण--

यहाँ धन सम्बन्धी विचार का कार्येश

सूयं अंश पर है। लग्नेश चन्द्र शीघ्री

ग्रह २८ अंश पर है। मन्द ग्रह सूर्यं आगे है। दोनों की नवम पंचम दृष्टि चन्द्र के

दीप्तांश १२ अंश के भीतर हैं । (१ ०-२६)

=१०+-३०=४०-२८-१२° अन्तर इससे शीधी ग्रह के दीप्तांश के भीतर सूर्य है तो

-इत्थशाल योग हो गया । या इस प्रकार समझो चन्द्र २८° पर है २ अंश आगे बढ़ते

'पर राशि पूरी होगी । सूयं के १००--२९-१२ अंश अन्तर हुआ ।

दृष्टि भेद के विचार से इत्थशाल योग का पृथक्‌-पृथक्‌ फल होता है । इत्थशार

योग में यदि दोनों की परस्पर शुभ दृष्टि हो तो विशेष फल होगा । अशुभ दृष्टि का

अशुभ फल होता है। लग्नेश और कार्येश का जैसा इत्यशाल योग हो वैसा शुभ या अशुभ फल होता है। जैसे--

छग्नेश षष्ठेश से रोग वृद्धि । लग्नेश अष्टमेश से रोग वुद्धि मृत्यु आदि । लग्नेश

ख से व्यय वृद्धि। इस प्रकार अशुभ स्थानों से यह योग होने से अशुभ फल "होता है।

के कप कार्येश, लग्नेश का मित्र तथा कार्येश का मित्रै ये चारों जिस राशि में

हों वह अपने स्वामी या शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो इत्यशाल योग बलवान होता है ।

यदि स्नेह आदि शुभ दृष्टि हो तो और भी विशेष शुभ फल होता है। परन्तु थे शत्रु

घर में, पापग्रह से दृष्ट या युक्त हों तो शुभ फल घट जाता है।

जिस भाव सम्बन्धी कार्य हो उस भाव के स्वामी को कार्येश कहते हैं। जैसे--

भाइयों के निमित्त तृतीयेश । संतान-पंचमेश । राज कार्य-दशमेश । स्त्री के सम्बन्ध

'से---सप्तमेश इत्यादि । इस प्रकार कार्येश और लग्नेश से इत्थशाल योग है या नहीं

यह विचारना पड़ता है । दोनों का इत्यशालरू योग होने से कार्य सिद्ध होता है।