भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

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२२९३८ :: सचित्र'ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

दृष्टि स्थान कला दृष्टि तत्काल में अधिमित्र

“१ प्रत्यक्ष स्नेहा ९-५ ` ४५ ४५

:२ गुप्त स्नेहा ३ ४०' } मित्र

  • ११ १०

-२ गुप्त बैरा ४-१० १५" शत्रु

५४ प्रत्यक्ष बैरा ७ ६०" अघिशत्रु

५ अत्यन्त बैरा . १

२-६८-१२ स्थान दृष्टि शून्य हैं ।

लग्न से ६ भाव तक दक्षिण भाग, ७ से १२ तक वाम भाग । दक्षिण की अपेक्षा

-बाम दृष्टि बलवान होती है। दशम से चतुर्थे पर दृष्टि बली है । चतुर्थं से दशम पर

दृष्टि निर्बल है ।

यहाँ मन्दी ग्रह के अधिक अंशों में से शीघ्र ग्रह के कम अंश को घटाना । यदि

, अन्तर दीप्तांश के भीतर हो तो इत्यशाल योग होता है । यहाँ वर्तमान ग्रह स्पष्ट से

-ग्रह के अंश और उनकी गति लेना ।

:इत्यश्ञाल योग का उपयोग . १ ह

किसी भाव के फल के विचार करने के लिए उस भाव का स्वामी और लग्नेश

“के साथ इःयशाल योग है या नहीं इसका विचार करना होता है । कार्येश और लग्नेश

-इन दोनों में एक लाभेश अवश्य होना चाहिए तब इत्यशाल योग का प्रभाव होता है।

लग्नेश का द्वितीयेश, तृतीयेश आदि सब भाव में स्वामियों के साथ इत्यशारू

“योग हो सकता है। जंसे राज सम्बन्धी कार्य का विचार करना है राज्य का विचार “दशम भाव में होता है । £

९०2५ मन्म ` मान लो दशम भाव में सिह राशि है।

जिसका स्वामी सूर्यं कार्येश हुआ। मान लो

यह सूर्य नवम भाव में है जिसके अंश १५ हैं।

इसके आगे लग्न में लग्नेश मंगल २५ अंश

पर है। यहाँ शीघ्री ग्रह सूयं के अल्प अंश

हैं । इसके आगे मन्दी ग्रह मंगल अधिक अंश

छ में है । दोनों की नवम पंचम दृष्टि है। सूर्यं का दीप्तांश १५ है यहाँ दोनों की दृष्टि दीप्तांश के भीतर है (२५-१५)-१० क्योंकि केवळ यहाँ १०० का अन्तर है जो दीप्तांश के भीतर है । यहाँ लग्नेश की

*दृष्टि कार्येश पर होने से इस मुत्यसिल योग के प्रभाव के फलस्वरूप राज्य प्राप्त -होगा अर्थात्‌ उस कायं में सफलता प्राप्त होगी ।

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