सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 245, कुल 280 में से
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“ताजिक के १६ योगः: २३७"
फलछ-इसका फल मनिष्टकर्ता है ।
(३) मुन्यशिल-मिलाप-मिला हुआ योग-मुत्यसिल-मुत्यशील-भूय शील> -
इत्तिसाळ हासिल करना-प्राप्त करना ।
इस योग में यह देखना कि ग्रह शीघ्र गामी है या मन्द गामी है ओर ग्रह के
कितने अंद हैं ।
शीक्री ग्रह-दो ग्रहों में से जिस की गति अधिक हो वह शीघ्र गति वाला ग्रह है।
मन्दी ग्रह-दो ग्रहों में से जिस की गति अल्प हो (मन्द हो) वह मन्द गति: वाला ग्रह है।
यहाँ वर्तमान में गोचर के अनुसार पंचांग में जो ग्रह की गति दी हो वह
गति लेना ।
द गति वाला ग्रह बहुत अंश होकर आगे हो और शीघ्र गति वाला ग्रह अल्प `
अंश हों के पीछे हो और दोनों ग्रहों की दृष्टि दीप्तांश के भीतर हो तो मुन्यशिल
योग होता है । इसमें शीघ्री ग्रह अपना तेज (सामर्थ) मन्दी ग्रह को दे देता हैं ।
घन भागस्वहुत अंश । मन्द भाग-अल्प भंश । भाग-अंश । घन-बहुत । अल्प-कम |:
ग्रहों की गतिरएक राशि में चलने का समय ।
यहाँ शी प्रीस्चन्द्र, सूयं, बुध, शुक्र, मंगल है।
मन्दी ग्रह-गुरु, शनि हैं। इनमें भी शनि से गुरु शीघ्री हे गुरु से मंगल शीघी
है। मंगल से सुर्य बुध शुक्र शीघ्री हँ । इन सब से चन्द्रमा शीघ्री है ।
एक राशि कों पार करने के लिए जिसे अधिक समय लगता है वह मन्द गति
वाला ग्रह मन्द ग्रह या मन्दी ग्रह है । जिसे थोड़ा समय लगता है वह शीघ्र गति
वाला ग्रह, शीध ग्रह, या शीघ्री ग्रह है।
इस प्रकार परस्पर दृष्टि करने वाले दो ग्रह हों, इन में एक की गति मन्द और
दुसरे की गति शीघ्र हो । यह पंचांग से देख लेना चाहिए । इन दो ग्रहों में से उनके
अंशों का विचार करना यदि शीघ्री ग्रह के अल्प अंश हैं और मन्दी ग्रह के अधिक
अंश हैं और शीघ्री ग्रह से मन्दी ग्रह आगे हो और दोनों की दृष्टि दीप्तांश के भीतर
हो तो मुन्यशिळ योग हो जाता है। इसमें शीघ्री ग्रह मद्र ग्रह को -अपना.तेज दे
देता है।
ग्रहों के दीप्तांश
यहाँ शीघ्री ग्रह के आगे या पीछे विचारना और शीज्री ग्रह के अंश के भीतर
दीप्तांश लेना अर्थात जो ऊपर बताये दीप्तांश के अंश दिये हैं उनसे दोनों हों के
अशो का अन्तर विचारना । दोनों ग्रहों के अंशों का अन्तर इन से अधिक नहीं”
होना चाहिए ।
दृष्टि का विचार यहाँ नीचे बताई दृष्टि लेना । गणित द्वारा साधन की हुई दृष्टि की वहाँ:
आवश्यकता नहीं है ।