सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 253, कुल 280 में से
संदर्भ में पढ़ेंताजिक के १६ योग : २४५
'किसी भाव में हों और उन की परस्पर दृष्टि न हो परन्तु दोनों के अ शा दीप्तांश के भीतर होना चाहिए । दोनों की परस्पर दृष्टि न होने से यह योग नहीं होता परन्तु रा के वीच एक ऐसा ग्रह हो जो दोनों से मंद गति वाला हो और उन दोनों ग्रहों को देखता हो और दृष्टि में दीप्तांश के भीतर हो तो वह मध्यस्थ ग्रह लग्नेश कार्येश से तेज लेकर मंदी ग्रह को दे देता है ।
यहाँ राज्य प्राप्ति प्रश्न में लग्नेश सूये
१५० पर सप्तम में है और दहामेश कार्येहा
शुक्र १७° पर अष्टम में है। इन दोनों के `
अशा तो दीप्तांश के भीतर हैं परन्तु परस्पर
दृष्टि का अभाव है । ऐसी स्थिति में इन
दोनों से मंद गति वाला ग्रह दोनों के वीच
दशम भाव में गुरु १७? पर है । गुरु की दृष्टि सूर्य ओर शुक्र दोनों पर है और दृष्टि
दीप्तांश के भीतर है । इस से यह मध्यस्थ ग्रह शीघ्री ग्रह शुक्र का तेज लेकर मंदी
अह सूर्यं को दे दिया।
इवलिए मध्यस्थ द्वारा यह कार्य होगा । यहाँ गुरु ग्रह मध्यस्थ है तो गुर के
अनुरूप मध्यस्थ पुरोहित मंत्री आदि के द्वारा यह कार्य सम्पादन होगा । यह योग
‘विचारणीय काय को मध्यस्थ द्वारा सिद्ध करता है ।
नं० ५ नक्त योग में मध्यस्थ ग्रह दोनों से शीघ्री था । यहाँ दोनों की अपेक्षा
मंदी ग्रह यहाँ गोचर में शुक्र शीधी ग्रह और सूर्य मंदी ग्रह है ।
यमया योग में मध्यस्थ ग्रह लग्नेश और कार्यंश दोनों से मंद होता है। इस
कारण इन दोनों से अश में कुछ अधिक होता है । इतना अधिक हो कि लग्नेश या
“कार्यश में दीप्तांश के भीतर दृष्टि कर सके ।
(७) सणङ योग =ममनुआ=मना
इसमें शीघी ग्रह अल्प अश पर हो उसके आगे मदी ग्रह अधिक अंश पर हो
और दोनों की परस्पर दृष्टि दीप्तांश के भीतर हो परन्तु इनके वीच में शीधी ग्रह
के समीप शीघ्री ग्रह के कुछ अशो से आगे या पीछे (कुछ अंश से कम या अधिक)
श्नि या मंगल हो और उम्र शनि या मंगल की ४, ७ या एकक्षे (एक स्थान) की
दृष्टि उप्त शीघ्री ग्रह पर हो और मंदी ग्रह को वह किसी भी दृष्टि से देखता हो तो
यह मंगल या शनि शीघ्र ग्रह का तेज हर लेता है और मंद ग्रह को तेज नहीं
देता है ।
इप प्रकार इस्यश्ाळ योग से जो कां होने वाळा था वह कार्य शनि या मंगळ
.बरीच में पड़कर मना कर देता है अर्थात् कार्य होने नहीं देता । कार्य का नाश कर
देता है । इससे मंगळ या दाति मणऊयोग का कर्ता हुआ ।