भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

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२४६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षेफल खण्ड

यह योग पाँचवाँ नक्त योग सरीखा है । इसमें शनि या मंगल योग को त्रिगाइते

वाला है । इसमें इत्यशाल के अतिरिक्त ये वाते होंगी ।

(१) दोनों शीघ्री मंदी ग्रह के वीच शनि या मंगल में से कोई हो ॥ टु

(२) यह शनि या मंगल शीघ्री ग्रह की १, ४ या ७ स्थान की वैर दृष्टि से

देखता हो । परन्तु मंद ग्रह को किसी प्रकार की दृष्टि से न न देखता हो । व

(३) शनि या मंगल शीघ्री ग्रह के अंश के कुछ आगे या पीछे हो परन्तु मंद ग्रह

शनि या मंगल के दीप्तांश के भीतर हो तब यह योग होता है ।

एक स्थान दृष्टि चतुर्थ स्थान एवं सप्तम स्थान दृष्टि के विचार से शनि के ३

योग और मंगल के भी ३ योग बनते हैं । इत प्रकार इसके ६ योग हुए । इन प्रत्येक

के २ भेद शीघ्री ग्रह के आगे या पीछे के विचार से हो जाते हैं। इस प्रकार १२

भेद हो जाते हैं । क FE

उदाहरण--यहाँ स्त्री लाभ प्रश्‍न में लग्नेश ०.0 ss Ee बुध ओर कार्येश (सप्तमेश) गुरु है । बुध शीघ्र

ग्रह १४ अंश पर है इसके आगे मंदी ग्रह गुर १९

अंश पर है। दोनों की दृष्टि दीप्तांश के भीतर

है। इससे इत्थशाल योग हो गया। कार्य हो

जाना था परन्तु दोनों के बीच मंगल पड़ जाने से

कार्य में बाधा इस कारण पड़ गई कि यह मंगल शीघ्री ग्रह के अंशों के समीप १५°

पर है और शौत्री ग्रह को चतुर्थं शत्रु दृष्टि से देखता है और यहु मंगल दशम्‌ दृष्टि

से कार्येश गुर को भी देखता है और दोनों मंगळ के दीप्तांश के भीतर हूं । इससे

यह मंगल कार्यं जो होना था उसमें विघ्न कर देता है अर्थात्‌ कार्य में मना कर

देता है या कार्य का नाश कर देता है । यहाँ शीघी ग्रह बुध का तेज मंगल ने हरण

कर लिया जिससे बुध निस्तेज हो गया अर्थात्‌ उसमें फल देने की सामर्थ नहीं रही ।

यहाँ बुध से १° अधिक होकर मंगल आगे स्थित है। शौत्रगामी बुध से १° कम

अर्थात्‌ १३° भी होता तो भी यह योग हो जाता । परन्तु मंगळ या शनि के दीप्तांश

के भीतर लग्नेश और कार्येश हो ।

ES

मंगळ के स्थान में शनि यहाँ हो तो भी मणऊ योग हो जावेगा ।

ब इसरा उदाहरण--यहाँ लग्न प्रश्न

45.५९ में लग्नेश चंद्र लाभ भाव में वृष के १३”

पर है और छाभेश शुक्र लग्न में कर्क के

१८० पर है। इनका इत्थशाल योग हो

गया जिससे धन लाभ होना था परन्तु

मंगल वृष के १९° पर लग्नेश के साथ

एक भाव में होने से मणऊ योग हो गया।