भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 280 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 255

ताजिक के १६ योग : २४७

शुक्र को भी देखता है और मंगल के वीप्तांश मणऊ योग होने से कार्य की हानि होगी ।

तीसरा उदाहरण-यहाँ शनि व लग्नेज् मीन लग्न में हैं। लग्नेश गुरु मंदी ग्रह है जो १४० पर है । सप्तम भाव सम्बन्धी कार्य होने से कार्येश बुध हुआ जो १४० पर है । मणऊ कर्ता ग्रह यहाँ शनि १५० पर मीन राशि में लग्न में है। यहाँ शनि १० अधिक होने पर भी मणऊ योग हो गया । यह शनि कार्येश बुध को सप्तम दृष्टि से भी देखता है और शनि के दीप्तांश के भीतर लग्नेश कार्येश दोनों हैं । इससे यह मणऊ योग हो गया । जिससे कार्य नहीं होगा ।

मणऊ योग का एक और भेद है ।

जव लग्नेश कार्येश का इत्थशाल हो । इन दोनों के बीच शनि और मँगल दोनों मणऊ कर्ता हों या लग्नेश कार्येश में से किसी

के साथ शनि और मंगल दोनों होकर मणऊ योग कर्ता हों। यहाँ शनि और मंगल के अंश लग्नेश कार्योश के दीप्तांश के भीतर हों

चाहे लग्नेश कार्येश के आगे या पीछे या

इनमें से किसी एक के साथ शनि और

मंगल दोनों हों चाहे मंगल और शनिके भंश लग्नेश कार्येश के अंश के भीतर हो या कुछ ही आगे हों परन्तु उनके दीप्तांश के

भीतर ही मंगल और शनि के अंश हों ।

क्योंकि यह मंगल तीसरी दृष्टि से कार्योश के भीतर लग्नेश कार्येश् दोनों हैं । यहां

उदाहरण-यहाँ राज प्राप्ति प्रश्न में लग्नेश शुक्र दशम भाव में कक के १८० पर्‌ "

है और राज्येश ( कार्येश ) चन्द्र अष्टम भाव में वृष के १३० पर है। जिसके साथ

शनि १३ अंश पर और मंगल १९० पर दोनों कार्येश के साथ हैं और लग्नेश कार्येश

के दीप्तांश के भीतर हैं यहाँ इत्थशाल योग का नाशक मणऊ योग हो गया । केवळ |

शनि या मंगल से ही यह मणऊ योग हो जाता है। परन्तु यहाँ ढोनों शनि और

मंगल कार्य नाहक मणऊ योग के कर्ता हैं ।

(८) कम्बूल योग

कम्वूल=स्वीकार

लग्नेश कार्येश का पूवे बताये अनुसार इत्यशाळ योग हो और इन दोनों में से

किसी के साथ या दोनों के साथ चन्द्र भी इत्थशाल करे तो यह योग हो जाता है।

(