भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

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२४४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

इत्थशाल योग में जो कार्य होने को था वह विपरीत कर देता है । अर्थात्‌ उसः

कार्य का नाश कर देने वाला है या उसकी सिद्धि नहीं होती । कष्ट देता है ।

यहाँ लग्नेश मंदी ग्रह २० अंश पर लग्न में है स्त्री भाव सम्बन्धी कार्य था,

कार्येश बुध शीघ्री ग्रह २२ अंश पर है । यहाँ मंद ग्रह गुरु के अंश से शीक्षी ग्रह वुध

से १ अंश बढ़ गया है। क्योंकि मंद. ग्रह के अंश से शीघ्री ग्रह के अल्प अंश होनाः

था । इसके विपरीत होने से अर्थात्‌ शीघ्री ग्रह के अंश मंद ग्रह के अंशो से बढ़ जाने

से यह इशराफ योग हो गया ।

हिज्जाल आचार्य के मत से इसमें इतना विचार है कि यह योग पाप ग्रहों का

हो तो कार्ये विपरीत करता है अर्थात्‌ शुभ के बदले अशुभ करता है। शीघ्री और

मंदी दोनों पाप ग्रह हों तो कार्यं का अवश्य नाश होता है? शुभ ग्रहों का योग हो तो

कार्य विपरीत तो नहीं करेगा किन्तु शुभ फल को जो इत्थशाल से होने वाला था न

होने देगा इसमें भी मत है कि शीघ्री और मंदी दोनों ग्रह शुभ हों तो कार्य सिद्ध

होगा परन्तु कठिनाई से सिद्ध होगा ।

(५) नक्त योग-नकछर्नकदी ।

जहाँ शीघ्री ग्रह के अंश अल्प हों और मदी ग्रह के अंश उससे अधिक हों । और

इत्थशाल योग में जेसा होना था दोनों की परस्पर दृष्टि नहीं हो । इन दोनों ग्रहों के

बीच एक ऐसे ग्रह से जो इन दोनों से गति में शीघ्र हो और लग्नेश और कार्येश

दोनों को देखता हो तो वह अल्प अंश वाले ग्रह (शीघ्री ग्रह) का तेज लेकर अधिक

अंश वाले ग्रह (मंदी ग्रह) को दे देता है। इस योग में अन्य के द्वारा कार्य सिद्ध होता है!

यहाँ लग्नेश बुध के कम अदा १२

हूँ । कायंश गुरु अधिक अश १४ पर है।

दोनों एक दूसरे से ६-८ भाव में होने से

परस्पर दृष्टि नहीं है । परन्तु नवम भाव

में इन दोंनों से शीघ्री चन्द्र १० अश

पर है उसकी चोथी दृष्टि लग्नेश वुध पर

इस प्रकार यह थीघ्री चन्द्र दोनों को देखते हुए शीघ्री ग्रह बुध का तेज लेकर मंदी

ग्रह गुरुको दे दिया। इस प्रश्‍न में तीसरे आदमी की मध्यस्थता से कार्य पूरा

होगा । यहाँ मध्यस्थ ग्रह की दृष्टि लग्नेश और कार्य श के दीप्तांश के भीतर ही होना

आवश्यक है । यहाँ चन्द्र लग्नेश कार्येश से शीघ्र गति वाला होने से और कायश के

अंशों से अल्प होने से यह कार्येश के अडा को पहुंच सकता है। (६) यमया योग-जमिअः-जमाऊसंयोजक । इसमें लग्नेश कार्या में एक शीघ्र गति वाला हो एक मंद ग्रति वाला हो ये