सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 251, कुल 280 में से
संदर्भ में पढ़ेंताजिक के १६ योग : २४३
(४) भविष्य मुन्थसिल
शीघ्री ग्रह न्यून अंश पर और मंद ग्रह
उसके आगे अधिक अंश पर हो। दोनों की
दृष्टि नवम पंचम आदि हो परन्तु दृष्टि
दीप्तांश के भीतर न हो । मंदी ग्रह के अंश
दीप्तांश से कुछ अधिक हों । जव शीघी
ग्रह अपनी तेज चाल से आगे बढ़ेगा तव
—— न शीघ्री के अंश अधिक हो जाने से मंदी ग्रह शीघ्री के दाप्तांश के भीतर हो जायगा । यहाँ भविष्य में मुन्यसि होगा । तव इस का फल होगा । इस कारण इसे भविष्य मुंथसिर कहते हैं । जैसे यहां शीघ्री ग्रह ६ अंश पर है । इसके आगे मंदी ग्रह १५० पर है । दोनों की परस्पर दृष्टि दीप्तांश के भीतर नहीं है (१५-६)-९०। यहाँ ९ अंश का अन्तर है । शीघी ग्रह मंगल का दीप्तांश ८ है। उससे १ अंश अधिक मंदी ग्रह वढ़ गया है। शीघी ग्रह जब आगे बढ़ेगा तव मंदी ग्रह उसके दीप्तांश के भीतर हो जायगा तव फल होगा । मान लो शीघी ग्रह मंगल आगे बढ़ कर ७० पर हो गया या और आगे वढ़ गया तव मंदी ग्रह का अन्तर दीप्तांश ६ के भीतर हो जायगा ।
यह् मुन्थसिल आगे होने को है इस कारण यहाँ भविष्य मुन्थसिळ हो गया । इममें
शीघी ग्रह अपना सामर्थ्यं तव मंदी ग्रह को दे देगा । इस प्रकार लग्नेश कार्यश का
१. वर्तमान मुंथसि हो तो उस भाव सम्वन्धी फछ उसी समय वर्तमान है ऐसा समझना ।
२. पूर्ण मुंथसिल हो तो पूर्ण सुख या पूर्ण फल कहना ।
३. भविष्य मुन्थसिल हो तो आगे सुख होगा या आगे फल होगा जव कि दोनों की दृष्टि दीप्तांश के भीतर हो जायगी ।
जिस भाव सम्वन्धी कार्य है उस भाव का स्वामो (कार्येश) और लग्नेश का
इत्यशाल होने पर उस कार्य की सिद्धि होती है ।
(४) इसराफ-मुशरिफ-फिजूलछ खर्ची
इसराफ योग--यह् नं० ३ इत्यशाल के योग से विपरीत है । इसे मुशरिफ योग भी कहते हैं । -
शीघ्री ग्रह अल्प अंश पर मंद ग्रह के
पीछे हो और मंद ग्रह के अधिक यंश हों
और आगे हो दोनों की दृष्टि दीप्तांश के
भीतर हो तो यह इत्यशाल योग होता है ।
परन्तु इसमें यदि शीघी ग्रह मंद ग्रह के अंश
से भी अंश में आगे बढ़ जावे तो यह इसराफ योग हो जाता है।