सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 250, कुल 280 में से
संदर्भ में पढ़ें२४२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुथं वर्षफल खण्ड
०_३”-५” दोनों में केवल ५५ विकला का अन्तर है । इससे यह पूर्ण मुन्यसिल' ५-२ -१० योग हुआ। यहाँ शीघ्री ग्रह केवल ५५“ से मंदी ग्रह से न्युन है ।
०-० -५५
जव विकला मात्र न्युन हो या आधी विकला से न्यून हों तव यह वीस बिश्वा
वाला मुन्थसिल होता है । जव विकला तक समानता हो तो पूर्ण मुन्यसिल श्रेष्ठ
होता है ।
(३) राश्यंत राइयादिस्थ दतंमान मुन्थसिल
शीघ्री ग्रह जब राशि के अन्त में होता
है। जैसे २९? पर हो अर्थात वह आगे
वाली राशि में जाने वाला हो जिससे आगे
जाने वाली राशि में पहुँच कर मंद ग्रह से
दृष्ट होकर दृष्टि दीप्तांश के भीतर हो जावे।
मंद ग्रह के थोड़े अंश हों तव यह योग होता
है। शीघ्री ग्रह जव राशि के अन्त में होता
है । तव आगे जाने वाली राशि में वह मंदी ग्रह से अल्प अंश में हो जाता है ।
जैसे धन भाव में मंगल २९ अंश पर है भौर लाभ भाव में शनि ६ अंश पर है।
मंगळ शीघ्री ग्रह है शनि मंदी ग्रह है । शीघ्री के आगे मंदी ग्रह शनि है। यहाँ दोनों
की दृष्टि दीप्तांश के भीतर नहीं है परन्तु जत्र मंगल आगे राशि में जायगा तब वह
तीसरे भाव में पहुंच जायगा तव उस आगे की राशि १९-२० आदि बंश में मंगल
शीघ्री ग्रह अल्प अंश में हो जाता है और मंदी ग्रह अधिक अंश में हो जाता हैं। दोनों
की दृष्टि तव दीप्तांश के भीतर हो जाती है ।
यह वर्तमान इत्यशाल योग का ही भेद है परन्तु दृष्टि रहित इत्यशाल होता है
दीप्तांश के भीतर दृष्टि नहीं है ।
इसमें शीघ्री ग्रह राशि के अन्त में ३०० के समीप हो और मंद ग्रह आगे हों तो
शीघ्री ग्रह आगे की राशि में जाने पर मंद ग्रह जब शीत्री ग्रह के दीप्तांश के भीतर
हो जावे तव शीघ्री ग्रह अपना सामर्थ मंद ग्रह को दे देता है यह अदृष्ट मुन्यसिल है ।
यहाँ धन लाभ प्रश्न में छाभेश गुरु ,
मंदी ग्रह ३० पर है। लग्नेश शुक्र शीघ्री
ग्रह २९० पर दशम में हैँ । शुक्र लाभ भाव
में जाने पर दोनों की दृष्टि दीप्तांश के भीतर
हो जायगी उस समय कार्य सफल होंगा ।