सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 239, कुल 280 में से
संदर्भ में पढ़ेंवर्षे में अरिष्ट विचार : २३१:
पाप दृष्टि न हो तो अरिष्ट नाश धन यद्य सुख देता है और अपनी दशा में राजा की कृपा भी' प्रदान करेगा ।
(५) यश धन--नवमेश और धन भावेश बलवान होकर लग्न में हों पाप ग्रह चे गी हों तो अरिष्ट नाश कर वाहन वस्त्र रत्न से पुर्ण राज्य मिलता है यहां ता है। `
(६) अरिष्ट नाश सुख-पाप ग्रह २-६-११ में हो शुभ ग्रह केन्द्र त्रिकोण में हों तो रत्न वस्त्र सुवणं यश और सुख मिले अरिष्ट नाश होकर शरीर पुष्ट हो । (७) अरिष्ट नाश सुख-मुन्थेश या लग्नेश या अन्म लग्नेदा पुर्ण बली होकर केन्द्र त्रिकोण या ११ या २ स्थानों में कहीं हो तो सुख, धन सुवणं वस्त्र देते हैं। यदि
तीनों ऐसे हों तो विशेष करके उक्त छाभ देते हैं। :
(८) धन छाभ-उच्चका शनि या शुक्र या गुरु हों शुम ग्रह से इत्थशाली हों तो श्रेष्ठ यवन से धन लाभ हो। यवन से ग्रह अनुसार जाति का विचार करना । शनि और शुक्र कृत योग हो तो स्त्री से, गुरु कृत योग हो तो ब्राह्मण से । यदि तीनों उक्त ग्रह उच्च में होकर शुभ इत्थशाली हों तो यवन राजा से बहुत धन मिले गर दूसरों से थोड़ा मिले ।
बलवान मंगल घन स्थान में हो तो यश धन और नेत्र मिले अचानक सुख भी मिले । > ब ३
(९) कल्याण, मंगल-सुर्य गुरु शुक्र परस्पर इत्थशाल करें.तो राज्य यश सुख
और घन मिले तथा सूर्यं वा मंगल मुन्था से उपचय में हों तो अति कल्याण और
मंगल देते हैं। ५
(१०) सुख कीति-बुध शुक्र चंद्र अपनी हुदा में हों और पाप ग्रह ३-११ स्थान
में हों तो वह अपने बाहुबल से सुवणं सुख और कीति देता है।
(११) राज्य यश आदि-बुघ शुक्र का मुशरिफ योग हो और गुरु तृतीय स्थान में हो तो राज्य यश सुवणं रत्न आदि मिळे ।
(१२) वाहन भूमि सुख-मंगल वर्षेश होकर मित्र स्थानी हो और ऐसे ग्रह से
मुत्थशिली हो जो स्वगृही आदि अधिकार पाया हो तथा चन्द्र से कम्बूली भी हो तो
वाहन सुवणं वस्त्र भूमि का लाभ और अधिक सुख होता है । :
विचार-जन्म और वर्षं में योग करने वाले ग्रहों का बलाबल विचार कर योग
या योगभंग का विचार करना अर्थात् योगकर्ता ग्रह पूणं बली हो और उच्च आदिं
पद पाया हो तो शुभ फल प्राप्त होगा नि्वेळ आदि होने से हानि होगी ।
वर्षे में मुन्थेश आदि ग्रह पाप युक्त दृष्ट अस्तंगत नीच गत आदि हो तथा शुभ
ग्रह वल रहित हो तो राज योग होने पर भी योग भंग होगा और हानि होगी ।
` मुन्थेश केन्द्र में हो लग्नेश दशम में बलवान हो दशमेश सप्तम में हो तो मुन्या का किया सम्पूर्ण अरिष्ट दूर हो ।
लग्नेश लग्न में या केन्द्र त्रिकोणं में हो मुन्येश बली हो ओर तो अरिष्ट दुर
होकर सुख, अथं लाभ हो ।