भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

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कडा rN

२६६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थं वर्षफल खण्ड

कुल में दोष लगना, अग्नि भय उष्णता से रोग। धन हानि, अनुचित कार्य करे,

भ्रमण, दाँत और पर में पीड़ा ।

केतु त्रिकोण या ३-६-११ भाव में हो शुभ राशि में सर्वोच्च या स्वगृह में हो

तो राजा से प्रीति मनोनुकूल देश ग्राम का आधिपत्य वाहन और पुत्र से सुख, मित्रों

से सुख हो।

२-८-१२ भाव में केतु हो या पाप युक्त या दुष्ट हो तो बन्धु और स्थान का

नाश, चिता, बन्धन, नीच का संग और रोग भय हो ।

राहु—दशा आरम्भ में धन हानि, मध्य में कुछ सुख, अपने देश में धन लाभ,

अन्त में कष्ट और चिन्ता ।

केतु--दशा आरम्भ में राज योग, मध्य में भय अन्त में दुर गमन रोग भय ।

अन्तर्दशा विचार

(१) शुभ ग्रह की महादशा में शुभ का अन्तर हो तो मनोरथ सिद्ध हो, स्त्री

पुत्र आदि से सुख, चित्त में सन्तोष, मित्रता बढ़े ।

ह ie शुभ की महादशा में पाप का अन्तर-आपत्ति, दुःख बन्धन मोह आदि 1 है।

(३) क्रूर ग्रह की दशा में शुभ का अन्तर-व्यसन, कष्ट आलस्य आदि होता है। (४) पाप में पाप का अन्तर-विरोध मिथ्या कलंक भय.क्रोध चिन्ता, घवड़ाहट, रोग लोगो से झगड़ा आदि होता है।

वर्षे में या जन्म में जो ग्रह उच्च का या मित्र ग्रही या स्वग्रही हो या मित्र की हदूदा नवांश आदि में हो या शुभ ग्रह से युक्त या दुष्ट हो उसकी दशा शुभ होती है। जो शत्रुयुही या नीच का या अस्त हो या ६-८-१२ घर का स्वामी हो या चन्द्र क्षीण हो उसकी दशा अशुभ होती है । ज्योतिष शिक्षा भाग ३ फलित खंड में अन्तर्दशा का फळ विस्तार से दिया है। यहाँ इस कारण संक्षिप्त में दिया है ।

योगिनी दशा विचार

(१) मंगला--(स्वामी चन्द्र) गौ ब्राह्मण देव में भक्ति, सद्धं, लोगों से प्रीत ऐश्वर्य प्राप्ति, यश वाहन सुख उत्तम, मंगल वस्त्र भूषण स्त्री प्राप्त हो । (२) पिंगला--(स्वामी सूर्य) हृदय रोग, शोक, अनेक रोग, चिन्ता, धन का व्यय, सज्जनों के प्रेम का नाश, सन्मान का नाश, व्याधियों से दुःख । र (३) धान्या--(स्वामी गुरु) धन का आगम, भोग मान वृद्धि, ज्ञान की वृद्धि, तीथं, देव सिद्ध जनों की सेवा में प्रीत, सुख प्राप्ति मित्र बन्धु व स्त्री लाभ । _ (४) भ्रामरी-¬ (स्वामी मंगळ) व्याकुल होकर घूमता फिरे, राजवंश में भी हो तो 'राजपाट छोड़कर कंगालों की तरह मारा २ फिरे, जन्म भूमि का हरण । (५) भद्रिका- (स्वामी बुध) गुरु ब्राह्मण और देव में भक्ति, घर में मंगल, मित्र