भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

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अध्याय ७

बुहत्पंचवर्गी बल साधन को ग्रह मेत्री

ग्रहों का बल जानने के लिए वृहत्पंचवर्गी वळ साधन करना पड़ता है । ५ प्रकार

से यह बल साधन होता है और ग्रहों की मैत्री के अनुसार वल गिना जाता है ।

इस कारण इसक्रे निमित्त पहिले मंत्री साधन करते हैं ।

ग्रह मंत्री

मैत्री ३ प्रकार की होती है। वर्तमान ग्रह परिस्थिति के अनुसार तात्कालिक

मैत्री होती है। स्थिर मैत्री को नैसर्गिक मंत्री कहते हैं । तात्कालिक और नैसगिक

मैत्री मिल कर पंचधा मैत्री बनती है । कोई केवल तात्कालिक मैत्री पर से ग्रह वल

साधन करते हैं ।

(२) तात्कालिक मैत्री विचार

ताजिक शास्त्राचायं हिज्जाल के मत से

ग्रह अपने भाव से दृष्टि

३-५-९-११ भाव को मित्र दृष्टि से देखता है

२-६-८-१२ भाव को सम दृष्टि से देखता है

१-४-७-१० भाव को शत्रु दृष्टि से देखता है

नीलकठी मत से तात्कालिक मैत्री

मैत्री भाव पर दृष्टि मंत्री

मित्र ५-९ भाव पर प्रत्यक्ष स्नेहा दृष्टि तात्कालिक अधि मित्र

६-११ भाव पर गुप्त स्नेहा ,, क मित्र

शत्रु ४-१० भाव पर गुप्त वेरा ,, Dt

१-७ भाव पर प्रत्यक्ष वैरा ,, „ अधि शत्रु

सम २,६,८,१२ भाव पर दृष्टि नहीं है। न सम

नैसगिक ( स्थिर ) मंत्री ताजिक में

ग्रह सूर्यं चन्द्र मंगल वुध गुरु शुक्र शनि मित्र चन्द्र सूर्यं सूर्य शुक्र सूर्यं वुध बुध मंगल मंगल चन्द्र शनि चन्द्र शनि शुक्र गुरु गुरु गुरु मंगल शत्रु बुध बुध बुध सूर्य वुध सूर्यं सूर्य शुक्र शुक्र शुक्र चन्द्र शुक्र चन्द्र चन्द्र मंगल मंगल मंगल शनि शनि रानि गुरु गुरु गुरु