भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 280 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 50

अध्याय ८

ग्रहों की दुष्टि विचार

ताजिक में भिन्न प्रकार से प्रहों की दृष्टि का विचार होता है । साधारण प्रकार

से प्रहों की ताजिक में इस प्रकार दृष्टि होती है--

दृष्टि प्रकार दृष्टि भेद किस दृष्टि फल

भावपर वल

मित्र दृष्टि [ प्रत्यक्ष स्नेहा ५-९ ४५'कला कार्यसिद्धि, मिलाप बलवान दृष्टि

गुप्त स्नेहा { ३ ४० कार्य सिद्ध करे } मित्र दृष्टि ११ १० स्नेह बढ नी :

शत्रु दृष्टि गुप्त वैरा ४-१० १५6 काये नाश,संग्राम दुजरिया,मित्र

करावे व घातकारी,शोक

संतोष दायक

अति शत्रु प्रत्यक्ष बरा ७ ६०! रत „ विवाह, विग्रह

दृष्टि कारी

७ १ एक साथ

२, ६, ८, १२ भाव पर दृष्टि नहीं होती-० दृष्टि । शत्रु दृष्टि से ३-११ दृष्टि-

बली है । ३-११ से ५-९ दृष्टि अति वली है ।

दृष्टि बल

दृष्टि पूर्ण त्रिपाद यंश षष्ठ्यंश पदैल (पाव)

कला बल ६०" ४५” ४०? १०? १ शं

दृष्टि में दक्षिण वाम विचार

लग्न से षष्ठ स्थान तक=पूर्वाद्ध >दक्षिण भाग

सप्तम से व्यय ,, ,, त्पराद्ध वाम भाग

वाम भाग में जो ग्रह हो उसकी दृष्टि वाम दृष्टि कहलाती है जैसे कोई ग्रह

चतुर्थ स्थान में हो और दूसरा ग्रह दशम स्थान में हो तो चतुर्थ स्थान वाले ग्रह की

दृष्टि दशम स्थान वाले ग्रह के ऊपर वलहीन होगी क्‍योंकि वह दक्षिण दृष्टि है।

पराद्ध (वाम भाग) में स्थित ग्रह की दृष्टि पूर्वार्द्ध में स्थित ग्रह पर हो तो वह्‌ दृष्टि

अधिक बलवान्‌ होती है । जैसे दशम में कोई ग्रह हो वह वाम भाग में होने से चतुर्थ

पर (दक्षिण भाग पर) दृष्टि हो तो वह वाम दृष्टि वलबानु होती है।

मतांतर--कोई कहते हैं ३-४-५ वाम दृष्टि है, ९-१०-११ दक्षिण दृष्टि है । भचक़ पदिचमाभिमुख होने से सव ग्रह पूर्वाभिमुख हो जाते हैं ।

जो भाग उदित नह हुआ वह दक्षिण भाग है। जो भाग उदित हुआ है वह

वाम भाग है । चक्र के आदि में ग्रहों की वाम दृष्टि होती है। अंत में दक्षिण दृष्टि

होती है । इन दोनों में से दक्षिण दृष्टि अति बल्वान होती है ।

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४ · पृष्ठ 50, कुल 280 में से · BharatKosha