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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1002

श्लोक १७]

  • साधक-संजीवनी *

१००९

दृष्टिसे है, तत्त्वसे कोई लिंग नहीं है।

क्षर और अक्षर—दोनोंसे उत्तम 'पुरुषोत्तम' नामकी सिद्धिके लिये यहाँ भगवान्ने क्षर और अक्षर—दोनोंको 'पुरुष' नामसे कहा है।

'क्षरः सर्वाणि भूतानि'—इसी अध्यायके आरम्भमें जिस संसारवृक्षका स्वरूप बताकर उसका छेदन करनेकी प्रेरणा की गयी थी, उसी संसारवृक्षको यहाँ 'क्षर' नामसे कहा गया है।

यहाँ 'भूतानि' पद प्राणियोंके स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरोंका ही वाचक समझना चाहिये। कारण कि यहाँ भूतोंको नाशवान् बताया गया है। प्राणियोंके शरीर ही नाशवान् होते हैं, प्राणी स्वयं नहीं। अतः यहाँ 'भूतानि' पद जड़ शरीरोंके लिये ही आया है।

'कूटस्थोऽक्षर उच्यते'—इसी अध्यायके सातवें श्लोकमें भगवान्ने जिसको अपना सनातन अंश बताया है, उसी जीवात्माको यहाँ 'अक्षर' नामसे कहा गया है।

जीवात्मा चाहे जितने शरीर धारण करे, चाहे जितने

परिशिष्ट भाव—पहले छठे श्लोकमें और फिर बारहवेंसे पन्द्रहवें श्लोकतक भगवान्ने 'अलौकिक तत्त्वका वर्णन किया कि स्वतन्त्र सत्ता अलौकिककी ही है, लौकिककी नहीं, लौकिककी सत्ता अलौकिकसे ही है। अलौकिकसे ही लौकिक प्रकाशित होता है। लौकिकमें जो प्रभाव देखनेमें आता है, वह सब अलौकिकका ही है। अब सोलहवें श्लोकमें भगवान् 'लोक' शब्दसे 'लौकिक तत्त्व' का वर्णन करते हैं।

जगत् (क्षर) तथा जीव (अक्षर)—दोनों 'लौकिक' हैं—'द्वारिमी पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च' और भगवान् इन दोनोंसे विलक्षण अर्थात् 'अलौकिक' हैं—'उत्तमः पुरुषस्तव्यः' (गीता १५।१७)। कर्मयोग और ज्ञानयोग—ये दो योगमार्ग भी 'लौकिक' हैं—'लोकेऽस्मिन्निविधा निष्ठा ..... ' (गीता ३।३)। क्षरको लेकर कर्मयोग और अक्षरको लेकर ज्ञानयोग चलता है; परन्तु भक्तियोग 'अलौकिक' है, जो भगवान्को लेकर चलता है। सातवें अध्यायमें वर्णित 'अपरा प्रकृति' को यहाँ 'क्षर' नामसे और 'परा' प्रकृति' को यहाँ 'अक्षर' नामसे कहा गया है।

उत्तमः पुरुषस्तव्यः परमात्मेत्युदाहृतः।

यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ १७ ॥

उत्तमः= उत्तमयः= जोईश्वरः= ईश्वर
पुरुषः= पुरुषपरमात्मा= 'परमात्मा'—लोकत्रयम्= तीनों लोकोंमें
तु= तोइति= इस नामसेआविश्य= प्रविष्ट होकर (सबका)
अन्यः= अन्य (विलक्षण)उदाहृतः= कहा गया है। (वही)बिभर्ति= भरण-पोषण करता है।
ही है,अव्ययः= अविनाशी

व्याख्या—'उत्तमः पुरुषस्तव्यः'—पूर्वश्लोकमें क्षर और भगवान् यह बताते हैं कि उन दोनोंसे उत्तम पुरुष तो अन्य अक्षर दो प्रकारके पुरुषोंका वर्णन करनेके बाद अब ही है*।

  • (१) द्वे अक्षरे ब्रह्मपरे त्वनन्ते विद्याविद्ये निहिते यत्र गृहे।

क्षरं त्वविद्या ह्यमृतं तु विद्या विद्याविद्ये ईशते यस्तु सोऽन्यः ॥ (श्वेताश्वतरोपनिषद् ५।१)