श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
व्याख्या—‘द्वारविमी पुरुषो लोके क्षरश्चाक्षर एव च’ —यहाँ ‘लोके’ पदको सम्पूर्ण संसारका वाचक समझना चाहिये। इसी अध्यायके सातवें श्लोकमें ‘जीवलोकै’ पद भी इसी अर्थमें आया है।
इस जगत्में दो विभाग जाननेमें आते हैं—शरीरादि नाशवान् पदार्थ (जड) और अविनाशी जीवात्मा (चेतन)। जैसे, विचार करनेसे स्पष्ट प्रतीत होता है कि एक तो प्रत्यक्ष दीखनेवाला शरीर है और एक उसमें रहनेवाला जीवात्मा है। जीवात्माके रहनेसे ही प्राण कार्य करते हैं और शरीरका संचालन होता है। जीवात्माके साथ प्राणोंके निकलते ही शरीरका संचालन बंद हो जाता है और शरीर सड़ने लगता है। लोग उस शरीरको जला देते हैं। कारण कि महत्त्व नाशवान् शरीरका नहीं, प्रत्युत उसमें रहनेवाले अविनाशी जीवात्माका है।
पंचमहाभूतों—(आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी-) से बने हुए शरीरादि जितने पदार्थ हैं, वे सभी जड और नाशवान् हैं। प्राणियोंके (प्रत्यक्ष देखनेमें आनेवाले) स्थूलशरीर स्थूल समष्टि-जगत्के साथ एक हैं; दस इंद्रियाँ, पाँच प्राण, मन और बुद्धि—इन सत्रह तत्त्वोंसे युक्त सूक्ष्मशरीर सूक्ष्म समष्टि-जगत्के साथ एक हैं और कारण-शरीर (स्वभाव, कर्मसंस्कार, अज्ञान) कारण समष्टि-जगत्—(मूल प्रकृति-) के साथ एक हैं। ये सब क्षरणशील
(नाशवान्) होनेके कारण ‘क्षर’ नामसे कहे गये हैं।
वास्तवमें ‘व्यष्टि’ नामसे कोई वस्तु है ही नहीं; केवल समष्टि-संसारके थोड़े अंशकी वस्तुको अपनी माननेके कारण उसको व्यष्टि कह देते हैं। संसारके साथ शरीर आदि वस्तुओंकी भिन्नता केवल (राग-ममता आदिके कारण) मानी हुई है, वास्तवमें है नहीं। मात्र पदार्थ और क्रियाएँ प्रकृतिकी ही हैं। इसलिये स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीरकी समस्त क्रियाएँ क्रमशः स्थूल, सूक्ष्म और कारण समष्टि-संसारके हितके लिये ही करनी हैं, अपने लिये नहीं।
जिस तत्त्वका कभी विनाश नहीं होता और जो सदा निर्विकार रहता है, उस जीवात्माका वाचक यहाँ ‘अक्षरः’ पद है। प्रकृति जड है और जीवात्मा (चेतन परमात्माका अंश होनेसे) चेतन है।
इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने जिसका छेदन करनेके लिये कहा था, उस संसारको यहाँ ‘क्षरः’ पदसे और सातवें श्लोकमें भगवान्ने जिसको अपना अंश बताया था, उस जीवात्माको यहाँ ‘अक्षरः’ पदसे कहा गया है।
यहाँ आये क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम—ये तीनों ही शब्द गीतामें तीनों लिंगोंमें आये हैं। इससे यह समझना चाहिये कि प्रकृति, जीवात्मा और परमात्मा न तो स्त्री हैं, न पुरुष हैं और न नपुंसक ही हैं। वास्तवमें लिंग भी शब्दकी
१-पदार्थों और क्रियाओंको संसारका मानना ‘कर्मयोग’, प्रकृतिका मानना ‘ज्ञानयोग’ और भगवान्का मानना ‘भक्तियोग’ है। इनको चाहे जिसका मानें, पर ये अपने नहीं हैं—यह तो मानना ही पड़ेगा।
२-गीतामें क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम—इन तीनोंका एक साथ वर्णन भिन्न-भिन्न नामोंसे इस प्रकार हुआ है।
| अध्याय-श्लोक | क्षर | अक्षर | पुरुषोत्तम |
|---|---|---|---|
| ७।४—६ | अपरा प्रकृति | परा प्रकृति | अहम् |
| ८।३-४ | अधिभूतः कर्म | अध्यात्मः अधिदैव | ब्रह्मः, अधियज्ञ |
| १३।१-२ | क्षेत्र | क्षेत्रज्ञ | माम् |
| १४।३-४ | महद्ब्रह्मः, योनि | गर्भः, बीज | अहम्, पिता |
३-गीतामें क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तमका वर्णन तीनों लिंगोंमें मिलता है। उदाहरणार्थ—
(१) क्षर—क्षरः (१५।१६)—पुँल्लिंग अपरा (७।५)—स्त्रीलिंग महद्ब्रह्म (१४।३-४)—नपुंसकलिंग
(२) अक्षर—जीवभूतः (१५।७)—पुँल्लिंग जीवभूताम् (७।५)—स्त्रीलिंग अध्यात्मम् (८।३)—नपुंसकलिंग
(३) पुरुषोत्तम—भर्ता (१।१८)—पुँल्लिंग गतिः (१।१८)—स्त्रीलिंग शरणम् (१।१८)—नपुंसकलिंग