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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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श्लोक १६ ]

  • साधक-संजीवनी *

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ही नहीं सकती। वह यह बात समझ ही नहीं सकता कि रूपयोंके बिना भी अच्छी तरह काम चल सकता है।

जिस प्रकार व्यापारीको (एकमात्र धनप्राप्तिका उद्देश्य रहनेपर) माल लेने, माल देने आदि व्यापार-सम्बन्धी प्रत्येक क्रियामें धन ही दीखता है, इसी प्रकार परमात्मत्त्वके जिज्ञासुको (एकमात्र परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रहनेपर) प्रत्येक वस्तु, क्रिया आदिमें तत्वरूपसे परमात्मा ही दीखते हैं। उसको ऐसा अनुभव हो जाता है कि परमात्माके सिवाय दूसरा कोई तत्त्व है ही नहीं, हो सकता ही नहीं।

मार्मिक बात

अर्जुनने चौदहवें अध्यायमें गुणातीत होनेका उपाय पूछा था। गुणोंके संगसे ही जीव संसारमें फँसता है। अतः गुणोंका संग मिटानेके लिये भगवान्ने यहाँ अपने प्रभावका वर्णन किया है। छोटे प्रभावको मिटानेके लिये बड़े

परिशिष्ट भाव— इस अध्यायके पहले श्लोकमें भगवान्ने जो बात कही थी, उसका उपसंहार इस श्लोकमें करते हैं।

पहलेके तीन श्लोकोंमें भगवान्ने प्रभाव और क्रियारूपसे अपनी विभूतियोंका वर्णन किया है, पर प्रस्तुत श्लोकमें स्वयं अपना वर्णन करते हैं। तात्पर्य है कि इस श्लोकमें स्वयं भगवान्का वर्णन है, आदित्यगत, चन्द्रगत, अग्निगत अथवा वैश्वानरगत भगवान्का वर्णन नहीं। मूलमें एक ही तत्त्व है, केवल वर्णनमें फर्क है।

पहले 'ममैवांशो जीवलोकै' पदोंसे यह सिद्ध हुआ कि भगवान् 'अपने' हैं और यहाँ 'सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः' पदोंसे यह सिद्ध होता है कि भगवान् 'अपनेमें' हैं। भगवान्को 'अपना' स्वीकार करनेसे उनमें स्वाभाविक प्रेम होगा और 'अपनेमें' स्वीकार करनेसे उनको पानेके लिये दूसरी जगह जानेकी जरूरत नहीं रहेगी।

'अपोहनम्' पदका अर्थ है—'अपगत ओहनम्' अर्थात् संशयका निवारण। 'वेदान्त' का अर्थ है—वेदोंका अन्त अर्थात् निष्कर्ष, निचोड़—'उभयोरपि दृष्टोऽन्तः' (गीता २।१६)

भगवान् कहते हैं कि वेद अनेक हैं, पर उन सबमें जाननेयोग्य मैं एक ही हूँ और उन सबको जाननेवाला भी मैं ही हूँ। तात्पर्य है कि सब कुछ मैं ही हूँ।

सम्बन्ध— भगवान्ने इसी अध्यायके पहले श्लोकसे पंद्रहवें श्लोकतक (तीन प्रकरणोंमें) क्रमशः संसार, जीवात्मा और परमात्माका विस्तारसे वर्णन किया। अब उस विषयका उपसंहार करते हुए आगेके दो श्लोकोंमें उन तीनोंका क्रमशः क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम नामसे स्पष्ट वर्णन करते हैं।

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।

क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १६ ॥

लोके= इस संसारमेंद्वौ= दो प्रकारकेक्षरः= क्षर
क्षरः= क्षर (नाशवान्)एव= ही= और
= औरपुरुषौ= पुरुष हैं।कूटस्थः= जीवात्मा
अक्षरः= अक्षर (अविनाशी)—सर्वाणि= सम्पूर्णअक्षरः= अक्षर
द्वौ= येभूतानि= प्राणियोंके शरीरउच्यते= कहा जाता है।
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