श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
विभूतियोंका वर्णन किया है।
उपर्युक्त चारों अध्यायोंमें भिन्न-भिन्न रूपमें विभूतियोंका वर्णन करनेका तात्पर्य यह है कि साधकको 'वासुदेवः सर्वम्' (गीता ७।१९) 'सब कुछ वासुदेव ही है' इस तत्त्वका अनुभव हो जाय। इसीलिये अपनी विभूतियोंका वर्णन करते समय भगवान्ने अपनी सर्वव्यापकताको ही विशेषरूपसे सिद्ध किया है; जैसे—
'मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति' (७।७)
'मेरेसे बढ़कर इस जगत्का दूसरा कोई भी महान् कारण नहीं है।'
'सदसच्चाहमर्जुन' (९।१९)
'सत् और असत्—सब कुछ मैं ही हूँ।'
'अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते' (१०।८)
'मैं ही सबकी उत्पत्तिका कारण हूँ और मेरेसे ही सब जगत् चैष्टा करता है।'
'न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्।'
(१०।३९)
'चर और अचर कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है, जो मेरेसे रहित हो अर्थात् चराचर सब प्राणी मेरे ही स्वरूप हैं।'
इसी प्रकार इस पन्द्रहवें अध्यायमें भी अपनी विभूतियोंके वर्णनका उपसंहार करते हुए भगवान् कहते हैं—
'सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टः' (१५।१५)
'मैं सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें सम्यक् प्रकारसे स्थित हूँ।'
तात्पर्य यह हुआ कि सम्पूर्ण प्राणी, पदार्थ परमात्माकी सत्तासे ही सत्तावान् हो रहे हैं। परमात्मासे अलग किसीकी भी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है।
प्रकाशके अभाव-(अन्धकार-)-में कोई वस्तु दिखायी नहीं देती। आँखोंसे किसी वस्तुको देखनेपर पहले प्रकाश दीखता है, उसके बाद वस्तु दीखती है अर्थात् हरेक वस्तु प्रकाशके अन्तर्गत ही दीखती है; किन्तु हमारी दृष्टि प्रकाशपर न जाकर प्रकाशित होनेवाली वस्तुपर जाती है। इसी प्रकार यावन्मात्र वस्तु, क्रिया, भाव आदिका ज्ञान एक विलक्षण और अलुप्त प्रकाश—ज्ञानके अन्तर्गत होता है,
जो सबका प्रकाशक और आधार है। प्रत्येक वस्तुसे पहले ज्ञान (स्वयंप्रकाश परमात्मतत्त्व) रहता है। अतः संसारमें परमात्माको व्याप्त कहनेपर भी वस्तुतः संसार बादमें है और उसका अधिष्ठान परमात्मतत्त्व पहले है अर्थात् पहले परमात्मतत्त्व दीखता है, बादमें संसार। परन्तु संसारमें राग होनेके कारण मनुष्यकी दृष्टि उसके प्रकाशक-(परमात्म-तत्त्व-)-पर नहीं जाती।
परमात्माकी सत्ताके बिना संसारकी कोई सत्ता नहीं है। परन्तु परमात्मसत्ताकी तरफ दृष्टि न रहने तथा सांसारिक प्राणी-पदार्थोंमें राग या सुखासक्ति रहनेके कारण उन प्राणी-पदार्थोंकी पृथक् (स्वतन्त्र) सत्ता प्रतीत होने लगती है और परमात्माकी वास्तविक सत्ता (जो तत्त्वसे है) नहीं दीखती। यदि संसारमें राग या सुखासक्तिका सर्वथा अभाव हो जाय, तो तत्त्वसे एक परमात्मसत्ता ही दीखने या अनुभवमें आने लगती है। अतः विभूतियोंके वर्णनका तात्पर्य यही है कि किसी भी प्राणी-पदार्थकी तरफ दृष्टि जानेपर साधकको एकमात्र भगवान्की स्मृति होनी चाहिये अर्थात् उसे प्रत्येक प्राणी-पदार्थमें भगवान्की ही देखना चाहिये (गीता—दसवें अध्यायका इकतालिसवें श्लोक)।
वर्तमानमें समाजकी दशा बड़ी विचित्र है। प्रायः सब लोगोंके अन्तःकरणमें रुप्योंका बहुत ज्यादा महत्त्व हो गया है। रुपये खुद काममें नहीं आते, प्रत्युत उनसे खरीदी गयी वस्तुएँ ही काममें आती हैं; परन्तु लोगोंने रुप्योंके उपयोगको खास महत्त्व न देकर उनकी संख्याकी वृद्धिको ही ज्यादा महत्त्व दे दिया! इसलिये मनुष्यके पास जितने अधिक रुपये होते हैं, वह समाजमें अपनेको उतना ही अधिक बड़ा मान लेता है। इस प्रकार रुप्योंको ही महत्त्व देनेवाला व्यक्ति परमात्माके महत्त्वको समझ ही नहीं सकता। फिर परमात्मप्राप्तिके बिना रहा न जाय—ऐसी लगन उस मनुष्यके भीतर उत्पन्न हो ही कैसे सकती है? जिसके भीतर यह बात बैठी हुई है कि रुप्योंके बिना रहा ही नहीं जा सकता अथवा रुप्योंके बिना काम ही नहीं चल सकता, उसकी परमात्मामें एक निश्चयवाली बुद्धि हो
१-इस अध्यायमें वर्णित तेरह विभूतियाँ इस प्रकार हैं—
(१) सूर्यमें स्थित तेज, (२) चन्द्रमें स्थित तेज, (३) अग्निमें स्थित तेज, (४) पृथ्वीकी धारण-शक्ति, (५) चन्द्रकी पोषण-शक्ति, (६) वैश्वानर, (७) हृदयस्थित अन्तर्यामी, (८) स्मृति, (९) ज्ञान, (१०) अपोहन, (११) वेदोद्धार जाननेयोग्य, (१२) वेदान्तका कर्ता और (१३) वेदोंको जाननेवाला।
२-वस्तुतः रुप्योंकी संख्याके आधारपर अपनेको छोट या बड़ा मानना पतनका चिह्न है। रुप्योंकी संख्या केवल अभिमान बढ़ानेके सिवाय और कुछ काम नहीं आती। अभिमान आसुरी सम्पत्तिका मूल है। जितने भी दुर्गुण-दुराचार, पाप हैं, सब अभिमानरूपी वृक्षकी छायामें रहते हैं।