श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 1006, कुल 1299 में से
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- साधक-संजीवनी *
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मुक्तिमें तो अक्षर (स्वरूप)में स्थिति होती है, पर भक्तिमें अक्षरसे भी उत्तम पुरुषोत्तमकी प्राप्ति होती है। स्वरूप अंश है, पुरुषोत्तम अंशी है।
सम्बन्ध—चौदहवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें भगवान्ने जिस अव्यभिचारिणी भक्तिकी बात कही थी और जिसको प्राप्त करानेके लिये इस पन्द्रहवें अध्यायमें संसार, जीव और परमात्माका विस्तृत विवेचन किया गया, उसका अब आगेके श्लोकमें उपसंहार करते हैं।
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।
स सर्वविद्धजति मां सर्वभावेन भारत ॥ ११ ॥
भारत | = हे भारतवंशी अर्जुन! | माम् | = मुझे | सर्वभावेन | = सब प्रकारसे ---|---|---|---|---|--- एवम् | = इस प्रकार | पुरुषोत्तमम् | = पुरुषोत्तम | माम् | = मेरा ही यः | = जो | जानाति | = जानता है, | भजति | = भजन करता है। असम्मूढः | = मोहरहित मनुष्य | सः | = वह | | | | सर्ववित् | = सर्वज्ञ | |
व्याख्या—‘यो मामेवमसम्मूढः’ —जीवात्मा परमात्माका सनातन अंश है। अतः अपने अंशी परमात्माके वास्तविक सम्बन्ध-(जो सदासे ही है-) का अनुभव करना ही उसका असम्मूढ (मोहसे रहित) होना है।
संसार या परमात्माको तत्त्वसे जाननेमें मोह (मूढ़ता) ही बाधक है। किसी वस्तुकी वास्तविकताका ज्ञान तभी हो सकता है, जब उस वस्तुसे राग या द्वेषपूर्वक माना गया कोई सम्बन्ध न हो। नाशवान् पदार्थसे राग-द्वेषपूर्वक सम्बन्ध मानना ही मोह है।
संसारको तत्त्वसे जानते ही परमात्मासे अपनी अभिन्नताका अनुभव हो जाता है और परमात्माको तत्त्वसे जानते ही संसारसे अपनी भिन्नताका अनुभव हो जाता है। तात्पर्य है कि संसारको तत्त्वसे जाननेसे संसारसे माने हुए सम्बन्धका विच्छेद हो जाता है और परमात्माको तत्त्वसे जाननेसे परमात्मासे वास्तविक सम्बन्धका अनुभव हो जाता है।
संसारसे अपना सम्बन्ध मानना ही भक्तिमें व्यभिचार-दोष है। इस व्यभिचार-दोषसे सर्वथा रहित होनेमें ही उपर्युक्त पदोंका भाव समझना चाहिये।
‘जानाति पुरुषोत्तमम्’ —जिसकी मूढ़ता सर्वथा नष्ट हो गयी है, वही मनुष्य भगवान्को ‘पुरुषोत्तम’ जानता है। क्षरसे सर्वथा अतीत पुरुषोत्तम-(परमपुरुष परमात्मा-) को ही सर्वोपरि मानकर उनके सम्मुख हो जाना, केवल
उन्हींको अपना मान लेना ही भगवान्को यथार्थरूपसे ‘पुरुषोत्तम’ जानना है।
संसारमें जो कुछ भी प्रभाव देखने-सुननेमें आता है, वह सब एक भगवान्-(पुरुषोत्तम-) का ही है—ऐसा मान लेनेसे संसारका खिंचाव सर्वथा मिट जाता है। यदि संसारका थोड़ा-सा भी खिंचाव रहता है, तो यही समझना चाहिये कि अभी भगवान्को दृढ़तासे माना ही नहीं।
‘स सर्वविद्धजति मां सर्वभावेन भारत’ —जो भगवान्को ‘पुरुषोत्तम’ जान लेता है और इस विषयमें जिसके अन्तःकरणमें कोई विकल्प, भ्रम या संशय नहीं रहता, उस मनुष्यके लिये जाननेयोग्य कोई तत्त्व शेष नहीं रहता। इसलिये भगवान् उसको ‘सर्ववित्’ कहते हैं*।
भगवान्को जाननेवाला व्यक्ति कितना ही कम पढ़ा-लिखा क्यों न हो, वह सब कुछ जाननेवाला है; क्योंकि उसने जाननेयोग्य तत्त्वको जान लिया। उसको और कुछ भी जानना शेष नहीं है।
जो मनुष्य भगवान्को ‘पुरुषोत्तम’ जान लेता है, उस ‘सर्ववित्’ मनुष्यकी पहचान यह है कि वह सब प्रकारसे स्वतः भगवान्का ही भजन करता है।
जब मनुष्य भगवान्को ‘क्षरसे अतीत’ जान लेता है, तब उसका मन (राग) क्षर-(संसार-) से हटकर भगवान्में लग जाता है और जब वह भगवान्को ‘अक्षरसे
- तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥ (प्रश्नोपनिषद् ४।११)
‘हे सोम्य! उस अविनाशी परमात्माको जो कोई जान लेता है, वह सर्वज्ञ है। वह सर्वरूप परमेश्वरमें प्रविष्ट हो जाता है।’