श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 1007, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें१००६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
उत्तम' जान लेता है, तब उसकी बुद्धि (श्रद्धा) भगवान्में लग जाती है*। फिर उसकी प्रत्येक वृत्ति और क्रियासे स्वतः भगवान्का भजन होता है। इस प्रकार सब प्रकारसे भगवान्का भजन करना ही 'अव्यभिचारिणी भक्ति' है। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि सांसारिक पदार्थोंसे जबतक मनुष्य रागपूर्वक अपना सम्बन्ध मानता है, तबतक वह सब प्रकारसे भगवान्का भजन नहीं कर सकता। कारण कि जहाँ राग होता है, वृत्ति स्वतः वहीं जाती है।
'मैं भगवान्का हूँ और भगवान् ही मेरे हैं'—इस वास्तविकताको दृढ़तापूर्वक मान लेनेसे स्वतः सब प्रकारसे भगवान्का भजन होता है। फिर भक्तकी मात्र क्रियाएँ (सोना, जागना, बोलना, चलना, खाना-पीना
आदि) भगवान्की प्रसन्नताके लिये ही होती हैं, अपने लिये नहीं।
ज्ञानमार्गमें 'जानना' और भक्तिमार्गमें 'मानना' मुख्य होता है। जिस बातमें किंचिन्मात्र भी सन्देह न हो, उसे दृढ़तापूर्वक 'मानना' ही भक्तिमार्गमें 'जानना' है। भगवान्को सर्वोपरि मान लेनेके बाद भक्त सब प्रकारसे भगवान्का ही भजन करता है (गीता—दसवें अध्यायका आठवाँ श्लोक)।
भगवान्को 'पुरुषोत्तम' (सर्वोपरि) माननेसे भी मनुष्य 'सर्ववित्' हो जाता है, फिर सब प्रकारसे भगवान्का भजन करते हुए भगवान्को 'पुरुषोत्तम' जान जाय—इसमें तो कहना ही क्या है!
परिशिष्ट भाव—'यो मामेवमसम्भूदो जानाति पुरुषोत्तमम्'—'जो भगवान्को जानता है, वही वास्तवमें 'असम्भूद' है (गीता—दसवें अध्यायका तीसरा श्लोक)। परन्तु जो भगवान्को नहीं जानता, वह 'मूढ़' है—'अवजानन्ति मां मूढाः' (गीता ९।११)।
'स सर्वविदुर्भवति मां सर्वभावेन भारत'—क्षर और अक्षर दोनों ही समग्र भगवान्के अंग हैं; अतः इनको जाननेवाला मनुष्य सर्ववित् (सर्वज्ञ) नहीं होता। जो क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम पुरुषोत्तमको जानता है, वही मनुष्य 'सर्ववित्' अर्थात् समग्रको जाननेवाला है। ऐसा सर्ववित् भक्त सब प्रकारसे भगवान्में ही लगा रहता है—'सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते' (गीता ६।३१); क्योंकि उसकी दृष्टिमें एक भगवान्के सिवाय दूसरा कोई होता ही नहीं।
गीतामें 'सर्ववित्' शब्द केवल भक्तके लिये ही आया है। भक्त समग्रको अर्थात् लौकिक और अलौकिक दोनोंको जानता है, इसलिये वह सर्ववित् होता है। लौकिकके अन्तर्गत अलौकिक नहीं आ सकता, पर अलौकिकके अन्तर्गत लौकिक भी आ जाता है। अतः निर्गुण तत्त्व (अक्षर) को जाननेवाला ब्रह्मज्ञानी सर्ववित् नहीं होता, प्रत्युत समग्र भगवान्को जाननेवाला भक्त सर्ववित् होता है।
सम्बन्ध—'अरुन्धती-दर्शन-न्याय'-(स्थूलसे क्रमशः सूक्ष्मकी ओर जाने-) के अनुसार भगवान्ने इस अध्यायमें पहले 'क्षर' और फिर 'अक्षर' का विवेचन करनेके बाद अन्तमें 'पुरुषोत्तम' का वर्णन किया—अपने पुरुषोत्तमत्वको सिद्ध किया। ऐसा वर्णन करनेका तात्पर्य और प्रयोजन क्या है—इसको भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।
इति गृह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।
एतदबुद्ध्वा बुद्धिमानस्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥ २० ॥
| अनघ | = हे निष्पाप | मया | = मेरे द्वारा | बुद्धिमान् | = ज्ञानवान् |
|---|---|---|---|---|---|
| अर्जुन! | उक्तम् | = कहा गया है। | (ज्ञात-ज्ञातव्य) | ||
| इति | = इस प्रकार | भारत | = हे भरतवंशी | च | = (तथा प्राप्त-प्राप्तव्य) |
| इदम् | = यह | अर्जुन! | और | ||
| गृह्यतमम् | = अत्यन्त गोपनीय | एतत् | = इसको | कृतकृत्यः | = कृतकृत्य |
| शास्त्रम् | = शास्त्र | बुद्ध्वा | = जानकर (मनुष्य) | स्यात् | = हो जाता है। |
- किसी विशेष महत्त्वपूर्ण बातपर मन रागपूर्वक तथा बुद्धि श्रद्धापूर्वक लगती है।